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लंगोट के कच्चे होते मर्द

10 अक्टूबर, 2018 

आज नवरात्रि के आरंभ के दिन इस विषय पर लिखना इत्तेफाक भी है और भगवान की मर्जी भी, कि शायद 9 दिन कन्या को पूजने वाले स्त्री-पुरुष शायद बाकी दिन भी औरत की वाकई इज्जत कर सकेंगे। इन 9 दिनों में यदि कहीं बलात्कार की घटना नहीं सुनाई देता है, निश्चित रूप से यह सिद्ध हो जाएगा कि हम पाखंड में जीते हैं, और यदि ऐसी कोई दुर्घटना सुनाई देती है, तो स्वयं सिद्ध है कि इंसान जानवर से बदतर है।
सबसे पहले आते हैं "मी टू" कैंपेन पर। इसके तहत जिस तरह से बड़े बड़े नामों का खुलासा हो रहा है, उससे तो साफ ही लग रहा है कि नाम बड़ा होने से इंसान बड़ा नहीं हो जाता है। स्त्री के प्रति पुरुष की कमजोरी (चाहे पुरुष जिस पद पर रहे, चाहे जितना पैसे वाला हो, चाहे जिस उम्र का हो) पुरुष को कितना हिंसक,कितना नीचे गिरा सकती है।


स्त्री को काम देने के बदले उनका यौन शोषण करना, पुरुष के पुरुषत्व पर कलंक ही तो है। लेकिन पद,प्रतिष्ठा और पैसे की ऊंचाईयों पर बैठे ऐसे पुरुषों के ऊपर इल्जाम लगाना, कीचड़ में ईंट फेकनें के बराबर है, जिसके छींटे इल्जाम लगाने वाले के ऊपर भी गिरना तय है। ऐसी महिलाओं के ऊपर ऐसे कमेंट भी आ रहे हैं, कि वे इतने दिन खामोश क्यों रहीं? लेकिन स्त्री का यह कहना कि "मेरा बलात्कार हुआ है या यौन शोषण हुआ है",उतना ही आसान है जितना पुरुष का यह कहना कि "मैंने किसी का बलात्कार किया है"। 


मैं उन महिलाओं से भी पूछना चाहूंगी कि यह जानते हुए भी कि कोई पुरुष आपको कोई रोल देने के बदले आपसे कोई नाजायज मांग रखता है, तो क्या यह महिलाओं को तय करना नहीं है कि उन्हें ऐसे रोल की जरूरत नहीं है? वह क्यों काम पाने के लिए किसी पुरुष के आगे समर्पण कर जाती हैं?


कई बड़ी अभिनेत्रियों ने भी अपने शोषणकर्ता या नाजायज मांग रखने वालों का नाम नहीं लिया है। वजह साफ है, उन्हें डर है कि इसके बाद उन्हें फिल्म इंडस्ट्री से निकाला जा सकता है, या काम मिलना बंद हो सकता है। अभी तो फिल्मी दुनिया में ऐसे बहुत से चेहरे होंगे जो मन ही मन कांप रहे होंगे कि कहीं कोई उनका नाम ना ले दे।


इसी के साथ मैं जिक्र करना चाहूंगी निशांत अग्रवाल का, जो ब्रह्मोस मिसाइल की तकनीकी की जासूसी के मामले में पकड़े गए हैं। वहां भी जासूसी के पीछे कारण हनी ट्रैप ही रहा। मतलब पुरुष आज इतना नपुंसक और कमजोर हो गया है, कि स्त्री के लिए अपने देश से गद्दारी भी करने के लिए तैयार हो जाता है।


और साथ ही रोज होने वाले रेप का जिक्र करना तो सूरज को दिया दिखाने के बराबर है। जिस तरह ढाई महीने से लेकर 70 साल तक के वृद्धा का रेप सुनाई देता है,इंसानियत से घृणा हो जाती है। हम वाकई में अतिआधुनिक युग में जी रहे हैं।


समस्या का कोई समाधान या निदान मैं नहीं बता रही,क्योंकि इसका निदान इंसान के पास ही है। बस इतना है कि वह कब अपनी आत्मा की आवाज सुनता है?


9 दिन स्त्री को देवी मान पूजने वाले पुरुषों को नवरात्रि की विशेष शुभकामनाएं..... 


कभी खाली बैठियेगा तो जरूर सोचियेगा....
..... नूपुर श्रीवास्तव 


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