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मोर्चे वालो से सावधान मुसलमानों, वरना यह मासूम तुम्हे कभी माफ़ नहीं करेगा

जैसे ही जकात-ओ-खैरात का महीना करीब है यह पता लगा बस वैसे ही इब्लिसो ने मुसलमानों को अभी से गुमराह करना शुरू किया. कई ऐसे गिरोह भारत के बाजार में सक्रीय हो गए है यह सोचकर के रमजान में हर मालदार मुसलमान अपने जकात का पैसा गरीबो में बांटता है. यह सोचकर मुसलमानों के मसाईल लेकर चन्दा मांगने की योजना बनाकर और कुछ दाढ़ी-टोपी वालो को साथ में लेकर आपो गुमराह करेंगे. अगर ऐसा कोई आपके पास ए और कहे की हम जेल में बंद मुसलमानों को छुडाते है, हम मुसलमानों पर हो रहे जुल्म के खिलाफ लड़ते है. तब उनसे फिलहाल दो ही सवाल करना.
1. रोहित वेमुला के लिए तो आपने हजारो कार्यक्रम किये लेकिन जिन्होंने रोहित को खुदखुशी करने पर मजबूर किया उनके ही गिरोह ने अबतक 10 बेगुनाहों को पिट-पिट कर बेरहमी से मार डाला उनके लिए कितने आन्दोलन किये ?
2. कितने मुसलानो को जेल से छुडाया उसकी लिस्ट, और अबतक मुसलमानों के लिए किये हुए कामो का ब्योरा मांगिये.



वरना यह मासूम तुम्हे माफ़ नहीं करेगा.
एक पाँच छे. साल का मासूम सा बच्चा अपनी छोटी बहन को लेकर मस्जिद के एक तरफ कोने में बैठा हाथ उठा कर अल्लाह से न जाने क्या मांग रहा था।
कपड़े में मेल लगा हुआ था मगर निहायत साफ, उसके नन्हे नन्हे से गाल आँसूओं से भीग चुके थे। बहुत लोग उसकी तरफ मुतवज़ो थे और वह बिल्कुल अनजान अपने अल्लाह से बातों में लगा हुआ था।जैसे ही वह उठा एक अजनबी ने बढ़ के उसका नन्हा सा हाथ पकड़ा और पूछा-
"क्या मांगा अल्लाह से"
उसने कहा-
"मेरे पापा मर गए हैं उनके लिए जन्नत, मेरी माँ रोती रहती है उनके लिए सब्र, मेरी बहन माँ से कपडे और सामान मांगती है उसके लिए पैसे"।

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"तुम स्कूल जाते हो"
अजनबी ने सवाल किया।
"हां जाता हूं" उसने कहा।
"किस क्लास में पढ़ते हो ?" अजनबी ने पूछा
"नहीं अंकल पढ़ने नहीं जाता, मां चने बना देती है वह स्कूल के बच्चों को बेचता हूँ, बहुत सारे बच्चे मुझसे चने खरीदते हैं, हमारा यही काम धंधा है" बच्चे का एक एक लफ्ज़ मेरी रूह में उतर रहा था ।
"तुम्हारा कोई रिश्तेदार"
न चाहते हुए भी अजनबी बच्चे से पूछ बैठा। "पता नहीं, माँ कहती है गरीब का कोई रिश्तेदार नहीं होता, माँ झूठ नहीं बोलती, पर अंकल, मुझे लगता है मेरी माँ कभी कभी झूठ बोलती है, जब हम खाना खाते हैं हमें देखती रहती है, जब कहता हूँ माँ तुम भी खाओ, तो कहती है मैं ने खा लिया था, उस समय लगता है झूठ बोलती है "
"बेटा अगर तुम्हारे घर का खर्च मिल जाय तो पढाई करोगे ?"
"बिल्कुलु नहीं"
"क्यों"
"पढ़ाई करने वाले गरीबों से नफरत करते हैं अंकल, हमें किसी पढ़े हुए ने कभी नहीं पूछा - पास से गुजर जाते हैं" अजनबी हैरान भी था और शर्मिंदा भी। फिर उसने कहा "हर दिन इसी इस मस्जिद में आता हूँ, कभी किसी ने नहीं पूछा - यहाँ सब आने वाले मेरे वालिद(बाप) को जानते थे - मगर हमें कोई नहीं जानता "बच्चा जोर-जोर से रोने लगा" अंकल जब बाप मर जाता है तो सब अजनबी क्यों हो जाते हैं ?" मेरे पास इसका कोई जवाब नही था और ना ही मेरे पास बच्चे के सवाल का जवाब है। ऐसे कितने मासूम होंगे जो हसरतों से घायल हैं



बस एक कोशिश कीजिये और अपने आसपास ऐसे ज़रूरतमंद यतिमो,बेवाओं और बेसहाराओ को ढूंढिये और उनकी मदद किजिए.........
मदरसों, मस्जिदों मे सीमेंट की बोरी देने से पहले, मुसलमानों की लड़ाई लड़ने का ठुथा वादा करने वाले फरेबियो को चन्दा देने से पहले, अपने आस - पास किसी गरीब को देख लेना शायद उसको आटे और अनाज की बोरी की ज्यादा जरुरत हो।
कुछ वक्त के लिए एक गरिब बेसहारा कि आँख मे आँख डालकर देखे आपको क्या मेहसूस होता है.
फोटो या विडियो सोशल मीडिया पर भेजने कि जगह ये मेसेज कम से कम 100 लोगो तक जरुर पहुंचाए. 
खुद में व समाज में बदलाव लाने के कोशिश जारी रखे।

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