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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # 191 ☆ सिरमौर विरंचि विचार सँवारे… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना सिरमौर विरंचि विचार सँवारे। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – आलेख  # 191 ☆ सिरमौर विरंचि विचार सँवारे

भारतीय संस्कृति का आधार जिसने समझ लिया उसके लिए जीवन एक उत्सव की तरह हो जाता है। वसुधैव कुटुम्बकम का भाव जब हमारे भीतर समाहित होगा तब हम व्यक्ति से ज्यादा समष्टि को महत्व देने लग जाते हैं। कण- कण में भगवान को महसूस कर, धरती को माँ मानकर नदियों से अमृत स्वीकार कर, गीता का ज्ञान हृदय में बसा कर कर्म तो करते हैं पर फल की चिंता नहीं करते।

मैं (अहंकार) का भाव जब तक तिरोहित नहीं होगा तब तक सब कुछ सहजता से स्वीकार करना आसान नहीं होता। व्यक्ति क्रोध, लोभ मोह, माया से ग्रसित हो पृथ्वी लोक में भटकता रहेगा।

कर्म हमेशा सही योजना बनाकर करें। राह और राही दोनों को सत्यमार्ग का वरण करते हुए सहजता से आगे बढ़ना चाहिए जिससे प्रकृति का आनन्द उठाते हुए नर्मदा के कण- कण में शंकर बसते हैं इसे आप जी सकें, महसूस कर सकें अमृत तुल्य निर्मल जल की उद्गम धारा को आत्मसात कर सकें। किसी भी विशाल वृक्ष को देखें उसमें पंछी कितने उन्मुक्त भाव से अपने जीवन को बिताते हैं, प्रातः दूर आकाश में उड़ान भरते हुए अपने भोजन की तलाश में जाते हैं और शाम होने से पहले अपने घोसले में वापस आते हैं।

इसी तरह ऋतुओं का बदलाव भी कितना सहजता से होता है बिल्कुल बच्चे की मुस्कान जैसे, जो खेलते हुए चोट लगने पर रोता तो है पर माँ के पुचकारने से पुनः आँसू पोछता हुआ खेलने भाग जाता है। क्या हम ऐसा जीवन नहीं जी सकते ? आकाश की विशालता, पंछी की उन्मुक्तता, बच्चों की सहजता, धरती से धीरज, वृक्षों से निरंतर देते रहने का, प्रकृति से परिवर्तन का भाव ग्रहण कर सहजता से मानव धर्म का पालन करते हुए जीवन नहीं जी सकते ?

अभी भी समय है ये सब चिंतन हमें अवश्य करना चाहिए जिससे हमारा और भावी पीढ़ी का जीवन सरल होकर हर्षोल्लास में व्यतीत हो।

कोई भी कार्य शुरू करो तो मन में तरह- तरह के विचार उतपन्न होने लगते हैं क्या करे क्या न करे समझ में ही नहीं आता। कई लोग इस चिंता में ही डूब जाते हैं कि इसका क्या परिणाम होगा ? बिना कार्य शुरू किए परिणाम की कल्पना करना व भयभीत होकर कार्य की शुरुआत ही न करना।

ऐसा अक्सर लोग करते हैं पर वहीं कुछ ऐसे लोग भी होते हैं जो अपने लक्ष्य के प्रति सज़ग रहते हैं और सतत चिंतन करते हैं जिसके परिणामस्वरूप उनकी सकारात्मक ऊर्जा में वृद्धि होती रहती है।

द्वन्द हमेशा ही घातक होता है फिर बात जब अन्तर्द्वन्द की हो तो विशेष ध्यान रखना चाहिए क्या आपने सोचा कि जीवन भर कितनी चिन्ता की और इससे क्या कोई लाभ मिला ?

यकीन मानिए इसका उत्तर, शत- प्रतिशत लोगों का न ही होगा। अक्सर हम रिश्तों को लेकर मन ही मन उधेड़बुन में लगे रहते हैं कि सामने वाले को मेरी परवाह ही नहीं जबकि मैं तो उसके लिए जान निछावर कर रहा हूँ ऐसी स्थिति से निपटने का एक ही तरीका है आप किसी भी समस्या के दोनों पहलुओं को समझने का प्रयास करें। जैसे ही आप अपने हृदय व सोच को विशाल करेंगे सारी समस्याएँ अपने आप हल होने लगेंगी।

सारी चिंता छोड़ के, चिंतन कीजे काज।

सच्चे चिंतन मनन से, पूरण सुफल सुकाज।।

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, [email protected]

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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