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Shree Sidhbali Dham- Kotdwar

आज मैं  अपने ब्लॉग लिखने की शुरुआत करने जा रहा हूँ हालांकि मैंने बहुत सोचा की कि किस विषय पर शुरुआत की जाय तो मन में आया कि क्यों न सब लोगो को उन महत्वपूर्ण स्थानों की जानकारी दी जाय जो धार्मिक और ऐतिहासिक दोनों ही रूप से महत्वपूर्ण हो।  

तो आज मैं अपने ही शहर से शुरुआत करता हूँ और आशा करता हूँ कि  आप सबको इसके बारे में पढ़कर अच्छा लगेगा।

मैं बात कर रहा हूँ कोटद्वार शहर के श्री सिद्धबली मंदिर की, इससे पहले कि मैं मंदिर के बारे में बताऊँ पहले यह जानना जरूरी है कि यह शहर कोटद्वार कहाँ स्थित है और इसके पीछे क्या कहा जाता है  यह शहर उत्तराखंड राज्य के जिला पौड़ी गढ़वाल के अंतर्गत आता है. कोटद्वार का उल्लेख स्कन्द पुराण में कौमुद तीर्थ के रूप में मिलता है।  स्कन्द पुराण के अनुसार - गंगाद्वार (हरिद्वार) के उत्तर पूर्व यानी ईशान कोण पर स्थित कौमुद  विषय में ११९ अध्याय के श्लोक ६ में वर्णन आता है-
 
तस्य चिन्ह प्रवक्ष्यामि 
यथा तंगायते परम. 

कुमुदस्य तथा गंधो 
लक्ष्यते मध्यरात्र के। . 

कहा जाता है कि कौमुद तीर्थ में कार्तिक की पूर्णिमा को चन्द्रमा ने भगवान शंकर को तपस्या कर प्रसन्न किया था इसीलिए इस स्थान का नाम कौमुद तीर्थ पड़ा और बाद में यह कौमुद तीर्थ का द्वार होने के कारण इसका नाम कोटद्वार हो गया. हालाँकि इस शहर के बारे में विस्तार से मैं बाद में बताऊंगा फिलहाल मैं यहाँ पर स्थापित भगवान हनुमान के धाम श्री सिद्धबली मंदिर के बारे में बताना चाहूंगा।  

कोटद्वार से 2 किमी0 की दूरी पर स्थित पौराणिक खोह नदी पहले कौमुदी के नाम से जानी जाती थी। पुराण के केदारखण्ड के अध्याय 115 में श्लोक 25 मे है।

गंगाद्वारोत्तेभागे गंगायाः प्राग्विभागके।  नदी कौमुद्वती ख्याता स्र्वदारिद्रनाषिनी।।

अर्थात गंगाद्वार (हरिद्वार) के ईशान कोण के कौमुद तीर्थ के किनारे कौमुदी नाम की प्रसिद्ध दरिद्रता हरने वाली नदी है।

खोह नदी के किनारे राम भक्त हनुमान को समर्पित श्री सिद्धबली का प्रसिद्ध मन्दिर है। इस मन्दिर मे बहुत दूर-दूर से दर्शनार्थी बडी संख्या मे आते हैं। श्री सिद्धबली बाबा को इस क्षे़त्र मे भूमि के क्षेत्रपाल देवता के रूप में भी पूजा जाता है। भक्तों का विश्वास है कि पवित्र भावना से जो कोई भी मनोती श्री सिद्धबली बाबा से माॅंगता है, वह अवश्य पूर्ण होती है। क्षेत्र के किसान फसल खलिहानों से उठाने से पहले दूध, गुड, अनाज सर्वप्रथम श्री सिद्धबली बाबा को चढाते हैं।

कहा जाता है कि सिद्धबाबा ने इस स्थान पर कई वर्ष तक तप किया। श्री सिद्धबाबा को लोकमान्यता के अनुसार साक्षात् गुरू गोरखनाथ माना जाता है जिन्हें कलियुग में शिव का अवतार कहा जाता है। गुरू गोरखनाथ भी बजरंगबली की तरह एक यति है।
सिद्धबली तीर्थ का जीर्णोद्वार एक अंग्रेज अधिकारी द्वारा कराया गया था। जो प्राचीन तीर्थ के समीप ही रहता था। उसे सिद्धबाबा ने दर्शन देकर इस कार्य को करने के लिए कहा था। वर्तमान में यह मंदिर भव्य रूप धारण कर चुका है।
यह स्थान बाबा सीताराम जी, बाबा गोपालदास जी, बाबा नारायण जी, महंत सेवादास जी जैसे अनेक योगियों एंव साधुओं की साधना स्थली भी है। कहा जाता है कि एक प्रसिद्ध मुस्लिम फकीर जो कि एक वली थे, ने भी कई वर्षो तक इस स्थान पर निवास किया। सिद्धबली तीर्थ में सिखों के गुरू गुरूनानक देवजी के भी आने का प्रमाण है।
मंदिर में रविवार, मंगलवार एंव शनिवार को भण्डारे की परम्परा है। हालांकि अब प्रतिदिन इस मंदिर में भंडारे होते है और अगले कई सालो के लिए पहले से ही भंडारे बुक है। मनौती पूर्ण होने पर भक्तजन भण्डारा करते हैं। कहा जाता है कि श्री सिद्धबली बाबा सप्ताह में 6 दिन समाधि मे रहते थे। इसी विश्वास से कि श्री सिद्धबाबा आज भी रविवार को दर्शन देते हैं।

यह स्थान चमत्कारिक रुप से प्रभावशाली है इस मंदिर से कोई भी आज तक खाली हाथ नहीं गया इसके बारे में एक कथा और है कि एक बार बजरंगबली को घमंड का एहसास हो गया और भगवान शिव ने अपने दूसरे अवतार गुरु गोरखनाथ जी के द्वारा इस स्थान पर उनके घमण्ड को चूर किया था और तब से भगवान बजरंगबली गुरु गोरखनाथ जी के साथ इस स्थान पर विराजमान है और दोनों साक्षात् रूप से शिला रूप में स्थित है।  

श्री सिद्धबाबा को आटा, गुड, घी, भेली से बना रोट एंव नारियल का प्रसाद चढता है एंव हनुमान जी को सवा हाथ का लंगोट व चोला भी चढता है। दिसम्बर माह में पौष संक्रान्ति को श्री सिद्धबाबा का तीन दिवसीय विशाल मेला लगता है जिसमें लगातार तीन दिन तक बडे भण्डारे आयोजित होते हैं एंव सवा मन का रोट का प्रसाद बनाया जाता है।


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