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चम्बा – टिहरी झील यात्रा (भाग एक) (Chamba – Tehri Lake Part – 1)

स्थान: चम्बा शहर एवं टिहरी झील
तिथी: 15 मई 2016

मई 2016 के दिन थे और गर्मी अपने चरम पर थी। दिल्ली से गुरुग्राम की रोज़ाना की भाग दौड़ से अब बोरियत सी होने लगी थी। बहुत दिनों से कहीं दूर जाने की इच्छा थी। मन में कई दिन से सवाल थे की कहाँ जाया जाये ? जाये भी या नहीं, क्योंकि अवकाश मिलने की सम्भावना कम ही थी। एक तो बी. पी. ओ. में अवकाश वैसे ही कम होते हैं, ऊपर से तुर्रा यह की उन दिनों मैं सपोर्ट टीम का हिस्सा था। इसलिए उम्मीद कम ही थी। मन में चल रही इस दुविधा के साथ मैं अपने साप्ताहिक अवकाश के दिन अपने मित्र गुरुचरण सिंह (सनी) के घर पहुंचा।

हम दोनों पहले भी कई यात्रायें साथ में कर चुके हैं। चाय पीते हुए सनी ने कहा ‘कहीं चलने का प्लान बना, इतना सुनते ही मैंने कहा ‘ठीक है, इसी महीने चलते हैं’। पहले योजना बनी श्री बद्रीनाथ जाने की, पर वहां तो लगभग पांच से छः दिन लग जाते हैं और इस बीच कहीं कोई प्राकृतिक आपदा आ गयी तो और भी दिन लग सकते हैं। काफी देर तक चली गहन चर्चा के बाद तय की हुआ की ऋषिकेश और देव प्रयाग ही चलेंगे। ऑफिस में 3 दिन के अवकाश की बात की तो वही अपेक्षित उत्तर मिला ‘2 दिन के वीक-ऑफ में जहाँ भी जाना है जाओ, इससे ज्यादा नहीं मिलेगा’।

यात्रा का दिन निश्चित हुआ 15 मई। मै ऑफिस से जल्दी छुट्टी लेकर घर पहुंचा। बैग पहले से ही पैक था। बैग लेकर हम दोनों लगभग रात 10 बजे कश्मीरी गेट अंतर्राजीय बस अड्डा पहुँच गए। लेकिन यह क्या? इतनी ज्यादा भीड़….. कश्मीरी गेट बस अड्डे पर पैर रखने की भी जगह नहीं थी। कारण भी स्पष्ट था। आज शुक्रवार था और अगले दो दिन अवकाश होने के कारण नज़दीकी राज्यों के लोग अपने – अपने घर जा रहे थे ! गर्मी से परेशान हम जैसे लोग भी जा रहे थे। चार धाम यात्रा भी कुछ दिन पहले भी शुरू हुई थी तो वहां जाने वाले श्रद्धालु भी थे।

उत्तराखंड में खूबसूरती की कोई कमी नहीं है, लेकिन पेट भरने की लिए रोज़गार भी जरुरी है जिसकी कमी राज्य में स्पष्ट तौर पर दिखाई देती है। दिल्ली जैसे शहर की चकाचौंध हर किसी को अपनी तरह खींचती है, तो भला पहाड़ी भी पीछे क्यों रहें। अधिकांश पहाड़ी गावों में अब सिर्फ बुज़ुर्ग बचे हैं। ज्यादातर लोग अपने बच्चो के साथ मैदानी शहरों में आ बसें हैं। जो वहां अभी बचे हुए हैं वे भी अपने बच्चो को शिक्षा के लिए राज्य से बाहर भेज रहे हैं। जिनकी आर्थिक स्थिति थोड़ी अच्छी है वो दिल्ली में भेज देते हैं और जिनकी स्थिति ज्यादा अच्छी नहीं है उनके बच्चे हरिद्वार, रूड़की और हल्द्वानी जैसे शहरो में पढ़ते हैं।

कश्मीरी गेट बस अड्डे पर उत्तराखंड जाने वाली बसों के लिए जुटी भीड़ एक अलग ही कहानी कह रही थी। उत्तराखंड से हो रहे पलायन की कहानी। ऐसे में मुझे श्री उमेश पंत जी की किताब ‘इनरलाइन पास’ में लिखी एक कुमाउनी लोक गायिका कबूतरी देवी की कुछ पंक्तियाँ याद आ रही थी –

‘आज पनी ज्यों – ज्यों, भोल पनी ज्यों – ज्यों, पोर्खिन त न्हें जोंला
स्टेशन सम्मा पुजा दें मलय, पछिल वीरान हवें ज्योंल’
(आज और कल जाने की जल्दी में निकल जायेंगे और परसो तो चले ही जाना है।
मुझे स्टेशन पहुंचा दे फिर सब वीरान हो ही जाना है)।

हर कोई किसी तरह बस में सवार होने को आतुर था। इसी भाग दौड़ में थोड़ी से चोट मुझे भी लग गयी। सभी बसें पहले से ही भरी हुई आ रही थी। इसलिए बस अड्डे के बाहर वाले पुल का रुख किया। उत्तराखंड से आने वाली बसें वही भर जा रही थी। लगभग एक घंटे तक चली भाग दौड़ के बाद एक बस में जगह मिली। ड्राइवर के साथ वाली सीट पर किसी तरह हम दोनों ने खुद को एडजस्ट किया और चल पड़े पहाड़ो की ओर।

दूसरा दिन

गाज़ीयाबाद, मेरठ, मुज़फ्फरनगर और रूड़की होते हुए लगभग सुबह 7 तक बजे हम हरिद्वार पहुँच गए। हरिद्वार पहुँच कर गंगा माँ को प्रणाम किया और थोड़ी तफरी की। हरिद्वार के बारे में जो मुझे थोड़ा – बहुत ज्ञान वह आप सबसे साझा करना चाहता हूँ।

हरिद्वार समुद्र तल से 314 मीटर की ऊंचाई पर स्थित उत्तराखंड का प्रमुख नगर है। उत्तराखंड का प्रवेश द्वार होने के साथ – साथ इसे देव भूमि का प्रवेश द्वार होने का भी गौरव प्राप्त है। हरिद्वार को विभिन्न नामो से जाना जाता है जिसमे से प्रमुख हैं मायापुरी, कपिल स्थान, गंगाद्वार। इस शहर के उत्तर और उत्तर-पश्चिम में शिवालिक पर्वत और दक्षिण में पवित्र गंगा नदी बहती है। पुराणों में वर्णित सप्त-पुरियों में हरिद्वार भी एक है। इसके साथ – साथ प्रत्येक छः वर्ष के अंतराल पर यहाँ कुम्भ मेला आयोजित होता है। यहाँ स्थित मोती बाज़ार अपने आप में एक शहर है। हिंदुत्व और आयुर्वेद की जड़ें गहरी हैं इस शहर में। इसके प्रमुख प्रमाण यहाँ स्थित योग गुरु बाबा राम देव स्थापित पतंजलि योगपीठ और आचार्य श्री राम शर्मा द्वारा स्थापित शांति कुञ्ज हैं। एक बात और बताना चाहता हूँ की इस शहर को भारतीय रेलवे से वर्ष 1886 में ही जोड़ दिया गया था।

हरिद्वार में गंगा स्नान और पूजा – पाठ करने के बाद हम चल पड़े माता मनसा के मंदिर की ओर। पहले सोचा की उड़न खटोले से चलेंगे, लेकिन एक तो उड़न खटोले का ज्यादा किराया और ऊपर से 2 घंटे से ज्यादा का प्रतीक्षा समय। इसलिए पैदल ही जाना उचित समझा। सीढ़ियां चढ़ कर कुछ ही देर में मंदिर तक पहुँच गए। मार्ग बन्दर और लंगूर मार्ग की पहरे-दारी कर रहे थे। मंदिर के पास से पूरे हरिद्वार शहर को देखा जा सकता है। कुछ फोटो खींचे और फिर नीचे उतर आये और ऋषिकेश जाने वाले शेयर्ड ऑटो में बैठ कर निकल पड़े ऋषिकेश की ओर।

Haridwar
हरिद्वार
Haridwar view from Mansa Devi
हरिद्वार शहर मनसा देवी के द्वार से

रायवाला से होते हुए लगभग 11 बजे तक हम राम झूला पहुँच चुके थे। वैसे उत्तराखंड ऐसा स्थान है जहाँ आप जितना आगे बढ़ते जाएँ उतना कम लगता है। ऋषिकेश से पहाड़ो की ओर बढ़ते रास्ते हिमालय की खूबसूरती का दीदार कराते हैं। समय की कमी के कारण हम ज्यादा आगे नहीं जा सकते थे। गर्मी यहाँ भी लगभग दिल्ली जैसी ही थी।

ऋषिकेश, राजधानी देहरादून के अंतगर्त आता है। अधिकांश लोग रामझूला और लक्ष्मण झूला क्षेत्र को ऋषिकेश समझते हैं, लेकिन ऐसा नहीं है। ऋषिकेश की सीमा ऋषिकेश बस अड्डे के पीछे बहने वाली चंद्रभागा तक ही है। चंद्रभागा पार करते ही टिहरी गढ़वाल जिले की सीमा शुरू हो जाती है। गंगा पार पौड़ी गढ़वाल है। परमार्थ निकेतन और स्वर्ग आश्रम अदि पौड़ी गढ़वाल क्षेत्र में है, जबकि लक्ष्मण झूला टिहरी गढ़वाल में।

ऋषिकेश को स्वयं भगवान विष्णु ने ऋषियों के लिए बसाया था, ताकि यहाँ के सुरम्य वातावरण में वे तप आदि कर सके। यहाँ आने वाले हर इंसान के लिए यहाँ आने का कारण अलग अलग होता है। कोई मन के शांति के लिए आता है, कोई पूजा पाठ के लिए। युवा रिवर राफ्टिंग के लिए भी आते हैं। इसके साथ – साथ ऋषिकेश को योग की अंतराष्ट्रीय राजधानी भी कहा जाता है। लगभग हर गली में छोटे – बड़े योग केंद्र खुले हुए हैं। देश – विदेश से लोग योग सीखने आते हैं।

राम झूला के आस – पास कई मन्दिर बने हुए हैं जैसे शत्रुघ्न मंदिर, हनुमान मंदिर आदि। राम झूला एक लोहे की तारो पर झूलता पुल है जिससे गंगा का विहंगम दृश्य दिखाई देता है। राम झूला स्थित शत्रुघ्न घाट से गंगा पार जाने के लिए नाव चलती है। किराया भी बहुत कम है, मात्र 10 रुपये एक तरफ के और जिसे वापसी भी करनी हो उसके लिए 15 रुपये। एक नाव का टिकट लिया और और अपनी – अपनी सीट पर बैठ गए। इस नाव पर ज्यादातर यात्री दक्षिण भारतीय और गुजराती थे। वैसे भी ऋषिकेश में दक्षिण भारतीय, बंगाली और गुजराती ही अधिक मात्रा में दिखाई देते हैं। गंगा की विशाल धारा पर सवार यह छोटी सी नाव बढ़ती जा रही थी। एक मद्रासी अम्मा गंगा का जल हाथ में लेकर सब पर छिड़काव कर रही थी। एक ही नाव पर भारत की विभिन्न भागो से आये हुए लोग थे। अच्छा लगा नाव पर हिंदुस्तान देख कर।

गीता भवन वाले घाट पर नाव जा कर रुकी। यहाँ से स्वर्ग आश्रम की गलियों से होते हुए परमार्थ निकेतन पहुंचे। इस बीच गलियों में दुकानों पर बज रहे भगवान शिव के भजन वातावरण को शिवमय बना रहे थे। परमार्थ निकेतन को ऋषिकेश का पर्याय भी समझा जा सकता है। इसकी स्थापना त्रिवेणी घाट पर स्वामी शुकदेवानंद जी महाराज ने वर्ष 1942 में की थी। वर्तमान में स्वामी चिदानंद जी महाराज इसके प्रशाशनिक और आध्यात्मिक प्रमुख हैं। 1000 कमरों के साथ यह ऋषिकेश का सबसे बड़ा आश्रम है। यहाँ की दैनिक गतिविधियों में सत्संग, कीर्तन, योग शामिल हैं ! विशेष रूप से विन्यास योग हठ योग, और योग निद्रा यहाँ की योग क्रियाओं के भाग हैं। यहाँ त्रीवेणी घाट पर होने वाली गंगा आरती विश्व प्रसिद्ध है।

आश्रम में प्रवेश करने पर विभिन्न देवी देवताओं, संतो और महापुरुषों की मूर्तियां ध्यान आकर्षित करती हैं। मैंने सनी को आश्रम के बारे में बताया। वैसे आश्रम में केवल धार्मिक यात्रा पर ही आये लोगो को कमरा मिलता है, लेकिन मैं पहले भी आ चुका हूँ इसलिए पुराने बिल दिखाने पर आश्रम प्रबंधन कमरा देने को तैयार हो गया। यहाँ आने का मुख्य कारण यहाँ की स्वच्छता है। बहुत कम दाम में कमरे मिल जाते हैं। मात्र 400 रुपये में कमरा मिल गया। 400 रुपये में ही एक समय का खाना और योग सेशन भी शामिल था। सनी यह देख कर बहुत खुश हुआ। सामान्य तौर पर ऋषिकेश में कमरे 800 – 1000 रुपये के बीच मिलते हैं। जो कमरा मिला वह एक मकान से कम नहीं था, जिसमे एक बड़ा सा कमरा, बैठक, रसोईं और शौचालय थे। कमरे में सामान रख कर थोड़ी देर आराम किया और फिर निकल पड़े ऋषिकेश के रास्तो पर घूमने।

राम झूला से लक्ष्मण झूला की दूरी लगभग 2 किलोमीटर है। इस बीच थोड़ा सा जंगल भी है जिसमे साधुओं की कुटिया बनी हुई हैं। जगह – जगह वृक्षों के नीचे शिवलिंग स्थापित हैं। लक्ष्मण झूला पहुँचते – पहुँचते दोपहर हो चुकी थी, लेकिन लक्ष्मण झूला पर भीड़ में कमी नहीं थी। गर्मी अपने चरम पर होने के उपरांत भी लोगो के जोश में कमी नही थी। देशी – विदेशी सभी सैलानी फोटो लेने में व्यस्त थे। लक्ष्मण झूला पूरी तरह भीड़ के कारण भरा हुआ था। कुछ किराये के फोटो ग्राफर लोगो को आवाज़ दे रहे थे। दुकानों पर भगवान शिव के भजन और चार धाम यात्रा के वीडियो चल रहे थे।

यहाँ से लगभग 26 किलोमीटर दूर शिव पूरी से वाइट – वाटर राफ्टिंग शुरू होती है। भाग लेने वालो को शिव पूरी से राम झूला तक राफ्ट होता है। शिव पुरी से आने वाली राफ्ट लक्ष्मण झूला के नीचे से गुज़र रही थी। गर्मी से परेशान हमने गन्ने का रस पीया और थोड़ा आगे बढ़े। पास ही एक 13 मंजिल का शिव मंदिर है बारह ज्योतिर्लिंगों और सभी देवी – देवताओं के दर्शन किये जा सकते हैं। मंदिर में काफी भीड़ और 13 मंज़िल की ऊंचाई होने के कारण वहां जाने की हिम्मत नहीं हुई और बाहर से ही भगवान को प्रणाम करके आगे बढ़ गए। लक्ष्मण झूला के पास से ही नीलकंठ मंदिर के लिए टैक्सियां जाती हैं।

लगभग 500 मीटर आगे एक फ़ास्ट फूड की दुकान हैं। जब भी मैं ऋषिकेश आता हूँ तो वह अवश्य जाता हूँ, इसका कारण है वह का सस्ता और स्वादिष्ट पिज़्ज़ा। वहां पहुँच कर पिज़्ज़ा और पराठो का आर्डर दिया। मात्र 115 रुपये में लार्ज साइज़ पिज़्ज़ा और 20 रुपये में परांठे। है न सस्ता? किसी मशहूर ब्रांड के रेस्टोरेंट में यही पिज़्ज़ा 400 रुपये से कम का नहीं मिलता। एक ही समस्या है यहाँ के अधिकांश ढाबो और रेस्टोरेंट्स में की ये लोग देरी बहुत करते हैं। लगभग एक घंटे के बाद पिज़्ज़ा आया और परांठे उसके भी 20 मिनट बाद। पिज़्ज़ा खाकर हम परमार्थ निकेतन की और चल पड़े। परमार्थ तक पहुँचते – पहुँचते थकान बहुत हो गयी थी और नींद भी आ रही थी। शाम को आश्रम के सामने वाले त्रिवेणी घाट पर होने वाली गंगा आरती भी देखनी थी, इसलिए सो गए।

Inside Parmarth Niketan Rishikesh
परमार्थ निकेतन के अंदर
Inside Parmarth Niketan
परमार्थ निकेतन के अंदर
Towards Lakshman Jhula
लक्ष्मण झूला की ओर
Tryambkeshwar Temple Lakshman Jhula
लक्ष्मण झूला के पास 13 मंजिल शिव मन्दिर

गंगा आरती की आवाज़ कानो में पड़ी तो नींद खुली। शाम के पांच बज चुके थे। गंगा आरती शुरू हो चुकी थी। यहाँ गंगा आरती शाम 4:30 बजे से शाम 6:30 बजे तक होती है। परमार्थ निकेतन में ही गुरुकुल भी है। गुरुकुल के विद्यार्थी और साधु संत मिल कर गंगा आरती करते हैं। हम शीघ्र ही वहां पहुंचे। आरती का आरम्भ हवन से होता है। विभिन्न प्रकार के भजन गाये जाते हैं। इस आरती का हिस्सा विदेशी भी बनते हैं।

Ganga Aarti on Triveni Ghat Parmarth Niketan
परमार्थ निकेतन त्रिवेणी घाट पर गंगा आरती

वहां बैठे – बैठे कब 6 बज गए पता ही नहीं चला। हमें ऋषिकेश स्थित गुरुद्वारा भी जाना था। इसलिए गुरूद्वारे की ओर चल पड़े। गुरुद्वारा काफी शानदार बना है। यह आधुनिक और प्राचीन शैली का मिश्रण है। गुरूद्वारे से दर्शन करके हम वापस स्वर्ग आश्रम की ओर बढ़ चले। अब तक अँधेरा हो चुका था। रामझूला से गंगा पार करते हुए गंगा के दोनों घाटों पर होने वाली गंगा आरती देखना एक सुखद अनुभव था। त्रिवेणी घाट पर होने वाली आरती अब लगभग समाप्त होने वाली थी और शत्रुघ्न घाट पर होने वाली आरती अभी आरम्भ ही हुई थी। गंगा में छोटे – छोटे दीप विसर्जित किये जा रहे थे। अच्छा लगा यह सब देख कर आधुनिकता की इस दौड़ में हम लोग अपनी परंपरा भूले नहीं हैं।

कुछ देर स्वर्ग आश्रम के जंगल वाले क्षेत्र में घूमने के बाद हम परमार्थ की और लौट चले। यहाँ खाना खाने का समय शाम 7:30 से 8:30 का है। इसके बाद खाना नहीं मिलता। इसलिए खाना खा लेना ठीक समझा। एक बड़े से हॉल में सभी ने दरी बैठ कर भोजन किया । भोजन के बाद एक अंतीम संध्या आरती देखने हम हॉल में पहुंचे वहां स्वयं स्वामी चिदानंद जी आरती कर रहे थे। गीता हॉल में गीता पाठ जारी था। आश्रम के वन में शांत हवा चल रही थी। थोड़ा देर इधर – उधर घूमने के बाद हम सोने चले गए। सुबह जल्दी भी उठना था।

गंगा के बीच बने इसी चबुतरे पर कभी ध्यान में बैठे भगवान शिव की विशाल मूर्ति थी, जो वर्ष 2013 में आयी हिमालयी आपदा में बह गयी

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