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गोवर्धन परिक्रमा (Goverdhan Parikrama)

यात्रा स्थल: गोवर्धन परिक्रमा (मथुरा, उत्तर प्रदेश)
यात्रा तिथी: 17 मार्च 2018
यात्रा व्यय: 630 रुपये

नाम महाधन है अपनों…. नहीं दूसरी संपत्ति और कमानी I
छोड़ अटारी अटा जग के, हम को कुटिया बृज मा ही बनानी।।

‘राधे – राधे’ या ‘राधे – कृष्णा’…. ये ऐसे नाम हैं जो भारतीय जन मानस के रोम – रोम में बसे हुए हैं। मन में कितना भी शोक व्याप्त हो, आप कितनी भी चिंताओं से घिरे हुए हों.. केवल एक बार राधे – राधे जप कर देखिये ! मन हलका हो जायेगा और आप नयी ऊर्जा से भर जायेंगे। राधे – कृष्ण की भक्ति का रस है ही ऐसा, जो एक बार भीगा… बस भीगता ही गया, डूबता ही गया।

हर जन्माष्टमी की आधी रात को जब भक्ति अपने चरम पर होती है, ढोल – मंजीरे ज़ोरों पर बज रहे होते हैं और हर ओर बस राधे – राधे सुनाई दे रहा होता है, उस वक्त मन तो मथुरा पहुँच जाता है लेकिन शरीर यहीं दिल्ली में रह जाता है और तभी मन पीछे मुड़ कर शरीर से कहता है ‘अरे कहाँ रह गया ? जल्दी कर और आजा बृज में।’

बहुत समय से इच्छा थी बृज की माटी को अनुभव करने की लेकिन कभी संयोग ही नही बन पाया।
शायद जनवरी का महीना रहा होगा, जब मेरे नए – नए लेकिन पक्के वाले मित्र मयंक पाण्डेय ने मुझसे गोवर्धन चलने को कहा। मैने झट से हाँ कह दी। टिकट वगैरह सब तैयार थे, लेकिन यात्रा वाले दिन एक तो ट्रेन क़रीब 5-6 घंटे लेट थी और दूसरा यह कीअगले ही दिन ऑफिस भी जाना था। इसलिए यात्रा रद्द करनी पड़ी। अच्छा तो नहीं लगा, लेकिन शायद अभी बुलावा नहीं था।

यह मार्च 2018 का महीना था और एक बार फिर से बृज की माटी की ख़ुशबू मथुरा की ओर से आती हवाओं में आने लगी थी। मयंक ने 17 मार्च को गोवर्धन परिक्रमा की योजना बना ली और मैंने भी सहमति दे दी। वैसे वे लगभग प्रति माह गोवर्धन की परिक्रमा करते हैं।

यह यात्रा केवल गोवेर्धन परिक्रमा से ही सम्बंधित है। वृन्दावन फिर कभी।

गोवर्धन के बारे में कुछ जानकारियाँ

गोवर्धन कहें… या गिरिराज कहें दोनों एक ही हैं। गोवर्धन पर्वत उत्तर प्रदेश राज्य के मथुरा जिले की एक नगर पंचायत है। यह वह भूमि है जहाँ श्री कृष्ण ने अन्य गोप – गोपियों संग लीलायें रचायी। द्वापर में देवराज इंद्र के प्रकोप से बचाने के लिए श्री कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी तर्जनी ऊँगली पर धारण किया था।

देश के लगभग सभी राज्यों से तीर्थ यात्री इसकी परिक्रमा करने को आते हैं। यह परिक्रमा 7 कोस (21 किलोमीटर) में होती है, जिसमे बड़ी परिक्रमा 12 किलोमीटर और छोटी परिक्रमा 9 किलोमीटर की होती है। 12 किलोमीटर वाली परिक्रमा गोवर्धन पर्वत क्षेत्र से होकर गुज़रती है और छोटी परिक्रमा शहरी क्षेत्र से। परिक्रमा के दौरान मार्ग में अनेक तीर्थ पड़ते हैं जैसे आन्योर, राधाकुंड, कुसुम सरोवर, मानसी गंगा, गोविन्द कुंड, पूँछरी का लोटा, दानघाटी आदि।

पौराणिक इतिहास

कहा जाता है की गोवर्धन पर्वत पहले मथुरा जिले में नहीं था, अपितु इसे यहाँ लाया गया ! लेकिन कहाँ से ?
त्रेता युग में रामायण काल के दौरान जब लंका पर चढ़ाई के लिये समुद्र पर पुल बनाया जाने लगा तो श्री राम को लगा की पुल बनाने के लिए पत्थर कम पड़ सकते हैं। इसलिए उन्होंने हनुमान जी को कहा हिमालय क्षेत्र से किसी पर्वत को ले आओ। आज्ञानुसार जब हनुमान जी हिमालय पहुंचे तो सबसे पहले उनकी भेंट गोवर्धन पर्वत से हुई। हनुमान जी ने गोवर्धन को श्री राम की इच्छा बताई। इस पर गोवर्धन जी उनकी सहायता के लिए एक शर्त पर तैयार हो गए की वे आजीवन प्रभु श्री राम के काम में आएंगे। हनुमान जी ने उनकी यह शर्त मान ली और उनको लेकर चल पड़े। वे अभी मथुरा क्षेत्र के पास ही पहुंचे थे की श्री राम का सन्देश आया की पुल बन चुका है और अब पत्थरों की आवश्यक्ता नहीं है। ऐसा सुनकर गोवर्धन बहुत नाराज़ हुए और उन्होने हनुमान जी से कहा की यह तो उनका अपमान है। इस पर हनुमान जी ने उन्हें कहा की वे यहीं प्रतीक्षा करें, तब तक वे श्री राम से बात करके आते हैं। हनुमान जी ने श्री राम को गोवर्धन नाराज़गी के बारे में बताया तो श्री राम ने उन्हें कहा की ‘गोवर्धन को कहो की वे मथुरा में ही रुके, मैं द्वापर में कृष्ण अवतार में उन्हें तर्जनी ऊँगली पर धारण करूँगा।’ तब से गोवर्धन पर्वत मथुरा में ही हैं।

कैसे पहुंचे गोवर्धन?

गोवर्धन मथुरा शहर से मात्र 20 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है और आप यहाँ जीप/ बस आदि द्वारा मथुरा से पहुँच सकते हैं। मथुरा के लिए देश के लगभग सभी भागों से रेल उपलब्ध हैं।

कहाँ ठहरें ?

गोवर्धन क्षेत्र में होटल और धर्मशालों आदि की कोई कमी नहीं हैं।

आगे बढ़ते हैं…

चूँकि हमारी इच्छा रात में परिक्रमा करने की थी, इसलिए हम दोपहर 2 बजकर 20 मिनट वाली श्री धाम एक्सप्रेस पकड़ना चाहते थे। मैं 1 बजकर 30 मिनट तक हज़रत निज़ामुद्दीन रेलवे स्टेशन पहुँच चुका था। वहां टिकट लेकर लाइन से निकला ही था की मयंक की कॉल आ गयी की वो पहुँचने वाले हैं। कुछ ही देर में वे भी पहुँच गए। रेल प्लेटफार्म नंबर एक पर पहले से ही खड़ी थी। दिल्ली से मथुरा का सफ़र केवल दो घंटो का ही है इसलिए हमने अनारक्षित टिकट ले रखे थे। वैसे डब्बों में भीड़ भी कोई ज़्यादा नहीं थी। रेल अपने निश्चित समय 2 बजकर 20 मिनट पर राधे – राधे बोलती हुई चल पड़ी।

मयंक पाण्डेय के बारे में बता दूँ की यह उनसे दूसरी मुलाकात थी। ट्रेवल स्टोरीज़ लिखने और पढ़ने के शौक ने हमें फेसबुक पर मिलाया। वे नोएडा की एक आई.टी. कंपनी में वेब डेवेलपर हैं और शौकिया तौर पर ट्रेवल ब्लॉगर। कुल – मिलाकर हम दोनों एक ही बिरादरी यानी घुमक्क्ड़ बिरादरी से हैं, इसलिए अच्छी जमती है।

रेल तेज़ गति से मथुरा की ओर बढ़ती जा रही थी और हम दोनों की बातें भी। दोनों ही अपने – अपने अनुभव बाँट में लगे हुए थे। आगरा रुट होने के कारण इस रुट पर कई तेज़ गति वाली रेल सेवायें शुरू गयी हैं और इसी कारण रेलवे लाइन के दोनों ओर बाड़ भी लगा दी गयी है। इन्ही रेलों में से एक है गतिमान एक्सप्रेस जो की अब ग्वालियर तक जाती है। मात्र 1 घंटा 40 मिनट में यह रेल आपको आगरा पहुंचा देगी।

बातें करते – करते कब मथुरा आ गया, पता ही नहीं चला। शाम 4 बजकर 20 मिनट पर रेल मथुरा जंकशन पहुँच चुकी थी। यहाँ पहुँच कर सबसे पहले तो चाय और समोसे खाये और फ़िर चल पड़े मंज़िल की ओर। यहाँ से ई-रिक्शा में सवार होकर पहले बस स्टैंड पहुंचे और फ़िर वहां से गोवर्धन के लिए बस में सवार हो गये। मथुरा की दो ख़ासियतें जो सबसे ज़्यादा पसंद आयी वो है यहाँ की भाषा और लोगों का मिलनसार होना।

बस में भी राधे – राधे ही हो रहा था। मैं तो यहाँ पहली बार आया था लेकिन मयंक और अन्य सवारियों की अनुसार पिछले कुछ महीनों यहाँ बहुत सुधार हुआ है। शहर में साफ़ – सफ़ाई में कोई कमी नहीं है। ट्रैफ़िक भी कम ही है। कुछ साधू महाराज भी साथ ही बैठे थे। मथुरा, द्वापर, मोदी, योगी… आदि चर्चायें करते हुए शाम 6 बजे तक हम गोवर्धन स्टैंड पहुँच चुके थे। मयंक गिरिराज जी के बहुत बड़े भक्त हैं। अब तक की यात्रा में शायद ही कोई कहानी मथुरा या गोवर्धन के बारे में बची होगी जो उन्होंने न बतायी हो। यहाँ चाय पीकर और गोलगप्पे खा कर गिरिराज जी का जयकारा लगाया और 12 किलोमीटर वाली बड़ी परिक्रमा के साथ यात्रा आरम्भ की।

Goverdhan bus stand
गोवर्धन बस स्टैंड

ज़्यादातर लोग पैदल ही परिक्रमा करते है लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है की आपको पैदल ही परिक्रमा करनी है। यहाँ ई-रिक्शा भी उपलब्ध हैं। जो बुज़ुर्ग चलने में असमर्थ हैं किन्तु ई-रिक्शा पर भी नहीं जाना चाहते क्योंकि उन्हें धीरे – धीरे परिक्रमा का आनंद लेना है, उनके लिए रेढ़ी भी उपलब्ध है। रेढ़ियों पर गद्दों और तकिये का पूर्ण प्रबंध होता है। मार्ग की बायीं ओर गांव है और दायीं और गोवर्धन पर्वत। शुरुआत में कुछ शहरी क्षेत्र है किन्तु कुछ किलोमीटर बाद ग्रामीण क्षेत्र आरम्भ हो जाता है। भू-माफ़िया द्वारा किये जाने वाले खनन को रोकने के लिए गोवर्धन पर्वत को कंटीली तारों से घेर दिया गया है। मार्ग में धर्मशालाओं और विश्राम स्थलों की कोई कमी नहीं है।

बहुत से लोग नंगे पैर परिक्रमा करते हैं और कुछ लोग दंडवत भी ! उन लोगो का भी ध्यान रखा गया है। परिक्रमा मार्ग लगभग 50 फुट चौड़ा है जिसमें 40 फुट पक्का और 10 फुट कच्चा है। कच्चा मार्ग नंगेपैर और दंडवत वालों को बहुत सुकून देता है। मयंक तो नंगे पैर ही परिक्रमा कर रहे थे। कुछ दूर तो मैंने भी ऐसे ही की। मिट्टी पर नंगे पैर चलने का आनंद ही कुछ और है। मार्ग में मंदिरों की कोई कमी नहीं। मार्ग के किनारे भजन मण्डली भी बैठ कर भजन गाने में मस्त थी। शाम की मंद – मंद बह रही हवा आज अपने गाँव की याद दिला रही थी। कुछ दूर चलने के बाद गाने का शरबत पीया और फिर बढ़ चले।

यह यात्रा इतनी अच्छी नहीं होती, यदि मयंक की जगह कोई और होता। मयंक का धार्मिक और घुमक्कड़ी ज्ञान बहुत अच्छा है। बहुत से ऐसे किस्से सुनाये जो बहुत कम लोग जानते हैं। मार्ग में संकर्षण कुंड देखा। संकर्षण कुंड की सुंदरता अप्रतिम है, लेकिन हमेशा से ऐसा नहीं था। कुछ महीनों पहले यह एक कचरे से भरा दल-दल बन चुका था। बृज फाउंडेशन और सरकार पहल के कारण इसे पुनर्जीवन मिला है। ऐसे अनेक कुंडो के सुधार के लिए यह संस्था प्रयासरत है और बहुत हद तक यह सफल भी हो चुकी है। मार्ग में स्थित सभी प्राचीन इमारतों की मरम्मत का कार्य जारी है।

goverdhan parikrama route
गोवर्धन परिक्रमा मार्ग
aanyor
आन्योर
भक्ति रस
govardhan
पेड़ों के पीछे गोवर्धन पर्वत
sankarshan kund goverdhan
संकर्षण कुंड द्वार
संकर्षण कुंड की पहले की दशा
sankarshan kund
संकर्षण कुंड अब

अब तक अँधेरा हो चुका था। एक जगह भण्डारा होते देख जीभ ललचा गयी और भण्डारा खाकर ही आगे बढ़े। लगभग रात 9 बजे तक बड़ी परिक्रमा पूरी हो चुकी थी। अब बारी थी छोटी परिक्रमा की। यह परिक्रमा 9 किलोमीटर की है किन्तु है पहले वाली से अधिक थकाऊ। यह ज़्यादातर गलियों से होकर गुज़रती है। मार्ग में बहुत से मंदिरों को बाहर से ही प्रणाम किया और आगे बढ़ते रहे। राधा कुंड, ललिता कुंड और ना जाने कितने ही कुंडों से होकर हम गुज़रे।

रात 11 बजकर 30 मिनट पर हम अपनी यात्रा के अंतिम स्थल अथार्त मानसी गंगा मंदिर पहुँच चुके थे। मानसी गंगा को श्री कृष्ण ने अपने मन से उत्पन्न किया था। यहाँ प्रशाद ख़रीदा और मंदिर में प्रवेश किया। यहाँ गोवर्धन जी शिला रूप में विराजमान हैं और उन्हें दूध और जनेऊ आदि भेट किया जाता है। यहाँ एक विशाल कुंड है और कुंड से ही पाइप द्वारा पानी बाहर लाकर लोगों के नहाने के लिए नल लगाये गये हैं। यहाँ गिरिराज जी और मानसी माता को भेंट चढ़ायी और फ़िर मंदिर से बाहर निकलकर ढाबे पर पहुँच गए पेट – पूजा करने।

रात 1 बजे हम मथुरा रेलवे स्टेशन पहुँच चुके थे। मयंक ने अपने सभी तरकीबें लगाकर किसी स्पेशल रेल के बारे में पता लगाया। उन्हें और शायद मुझे भी उम्मीद थी की यह स्पेशल रेल है तो भीड़ कम ही होगी, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। एक जानी – पहचानी भीड़ – भाड़ वाली रेल में हम बढ़ चले दिल्ली की ओर।

उम्मीद है की आपको यह यात्रा पसंद आयी होगी।

मिलते हैं किसी और सफ़र पर। तब तक के लिए बोलो राधे – राधे

lord goverdhan
गोवर्धन महाराज

radha kund mathura
राधा कुंड
परिक्रमा मार्ग

mansi ganga temple goverdhan
मानसी गंगा मंदिर
mansi ganga temple goverdhan
मानसी गंगा मंदिर

राधे – राधे

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