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Day Special: दो बार CM रहे कर्पूरी ठाकुर ढंग का एक मकान नहीं बनवा पाए, पढ़ें सादगी के 5 किस्से

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एक मुख्यमंत्री कितना अमीर हो सकता है? सोच में पड़ जाएंगे… क्योंकि इसकी सीमा नहीं है. खैर इस सवाल को छोड़िए, ये बताइये कि एक मुख्यमंत्री कितना गरीब हो सकता है? मुख्यमंत्री और भला गरीब? फिर से सोच में पड़ गए न? क्या वह इतना गरीब हो सकता है कि अपनी एक गाड़ी न हो… गाड़ी छोड़िए, मुख्यमंत्री रहते हुए अपना एक ढंग का मकान न बनवा पाए! और तो और उसके पास पहनने को ढंग के कपड़े न हों!

जननायक नाम उन्हें ऐसे ही नहीं दिया गया. सादगी के पर्याय और सिद्धांतों की प्रतिमूर्ति कर्पूरी ठाकुर की बात हो रही है. वही कर्पूरी ठाकुर, जो बिहार के दूसरे डिप्टी सीएम यानी उपमुख्यमंत्री रहे और फिर दो बार मुख्यमंत्री रहे. एक​ शिक्षक, एक राजनेता, एक स्वतंत्रता सेनानी वगैरह…. लेकिन उनकी असली पहचान थी ‘जननायक’ की.

गरीब परिवार में जन्म, स्वतंत्रता संग्राम में कूदने में पीछे न रहे

24 जनवरी 1924 को बिहार के समस्तीपुर जिला के पितौंझिया (अब कर्पूरीग्राम) निवासी गोकुल ठाकुर और रामदुलारी के घर उनका जन्म हुआ. सीमांत किसान पिता गोकुल नाई का काम करते थे. कर्पूरी ठाकुर ने भारत छोड़ो आंदोलन के समय करीब 26 महीने जेल में बिताया था. 22 दिसंबर 1970 से 2 जून 1971 और 24 जून 1977 से 21 अप्रैल 1979 के दौरान, दो कार्यकाल में वे बिहार के मुख्यमंत्री रहे.

उनकी सादगी के किस्से जानकर आज भी लोगों कीआंखों में आंसू आ जाते हैं. ऐसा समाजवाद अब कहां? बड़े-बड़े राजनेता उनकी दयनीय स्थिति के बारे में जानकर रो पड़ते थे. आज कर्पूरी ठाकुर की जयंती है. उनके पूरे व्य​क्तित्व और कृतित्व को कुछ सौ शब्दों में समेटना मुमकिन तो नहीं, लेकिन उनकी सादगी से जुड़े कुछेक किस्से जरूर सुना सकते हैं.

#1st किस्सा: दोस्त का फटा कोट पहनकर गए विदेश

‘द किंगमेकर: लालू प्रसाद की अनकही दास्तां’ किताब के लेखक जयंत जिज्ञासु ने अपने एक लेख में कर्पूरी ठाकुर की सादगी के बारे में कई किस्सों का जिक्र किया है. वे लिखते हैं, जब 1952 में कर्पूरी ठाकुर पहली बार विधायक बने, उन्हीं दिनों ऑस्ट्रिया जाने वाले एक प्रतिनिधिमंडल में उनका चयन हुआ था. लेकिन उनके पास पहनने को कोट नहीं था.

दोस्त से कोट मांगा तो वह भी फटा हुआ ​मिला. कर्पूरी वही कोट पहनकर चले गए. वहां यूगोस्लाविया के प्रमुख मार्शल टीटो ने जब फटा कोट देखा तो उन्हें नया ​कोट गिफ्ट किया. आज तो आदमी की पहचान ही उसके कपड़ों से की जाने लगी है.

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(जननायक कर्पूरी ठाकुर)

#2nd किस्सा: जीप मांगने पर विधायक ने कसा तंज

कर्पूरीजी के पास गाड़ी नहीं थी. वरिष्ठ स्तंभकार सुरेंद्र किशोर ने अपने एक लेख में ऐसे ही किस्से का जिक्र किया था. 80 के दशक में एक बार बिहार विधान सभा की बैठक चल रही थी, तब कर्पूरी ठाकुर विधान सभा में प्रतिपक्ष के नेता थे. उन्हें लंच के लिए आवास जाना था. उन्होंने कागज पर लिखवा कर अपने ही दल के एक विधायक से थोड़ी देर के लिए उनकी जीप मांगी. विधायक ने उसी कागज पर लिख दिया, “मेरी जीप में तेल नहीं है. आप दो बार मुख्यमंत्री रहे. कार क्यों नहीं खरीदते?”

दो बार मुख्यमंत्री और एक बार उप-मुख्यमंत्री रहने के बावजूद उनके पास अपनी गाड़ी नहीं थी. वे रिक्शे से चलते थे. उनके मुताबिक, कार खरीदने और पेट्रोल खर्च वहन करने लायक उनकी आय नहीं थी. संयोग देखिए कि उनपर तंज कसने वाले वही विधायक बाद में आय से अधिक संपत्ति के मामले में कानूनी पचड़े में पड़े.

#3rd किस्सा: बेटे के इलाज के लिए ठुकरा दी इंदिरा गांधी की पेशकश

जयंत एक और किस्से का जिक्र करते हैं. साल था 1974, कर्पूरी ठाकुर के छोटे बेटे का मेडिकल की पढ़ाई के लिए चयन हुआ. पर वे बीमार पड़ गए. दिल्ली के राममनोहर लोहिया अस्पताल में भर्ती हुए. हार्ट की सर्जरी होनी थी. इंदिरा गांधी को मालूम हुआ तो एक राज्यसभा सांसद को भेजकर एम्स में भर्ती कराया. खुद मिलने भी गईं और सरकारी खर्च पर इलाज के लिए अमेरिका भेजने की पेशकश की.

कर्पूरी ठाकुर को मालूम हुआ तो बोले, “मर जाएंगे, लेकिन बेटे का इलाज सरकारी खर्च पर नहीं कराएंगे.” बाद में जयप्रकाश नारायण ने कुछ व्यवस्था कर न्यूजीलैंड भेजकर उनके बेटे का इलाज कराया था. कर्पूरी ठाकुर का पूरा जीवन संघर्ष में गुजरा.

#4th किस्सा: फटा कुर्ता देख चंद्रशेखर ने किया चंदा, लेकिन…

वर्ष 1977 के एक किस्से के बारे में सुरेंद्र किशोर ने लिखा था, पटना के कदम कुआं स्थित चरखा समिति भवन में जयप्रकाश नारायण का जन्मदिन मनाया जा रहा था. पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर, नानाजी देशमुख समेत देशभर से नेता जुटे थे. मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुरी फटा कुर्ता, टूटी चप्पल के साथ पहुंचे. एक नेता ने टिप्पणी की, ‘किसी मुख्यमंत्री के ठीक ढंग से गुजारे के लिए कितना वेतन मिलना चाहिए?’

सब हंसने लगे. चंद्रशेखर अपनी सीट से उठे और अपने कुर्ते को सामने की ओर फैला कर कहने लगे, कर्पूरी जी के कुर्ता फंड में दान कीजिए. सैकड़ों रुपये जमा हुए. जब कर्पूरी जी को थमाकर कहा कि इससे अपना कुर्ता-धोती ही खरीदिएगा तो कर्पूरी जी ने कहा, “इसे मैं मुख्यमंत्री राहत कोष में जमा करा दूंगा.”

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(जननायक कर्पूरी ठाकुर)

#5th किस्सा: अपना घर तक नहीं बनवा पाए कर्पूरी

कर्पूरी ठाकुर दो बार मुख्यमंत्री रहे, लेकिन अपना एक ढंग का घर तक नहीं बनवा पाए थे. एक बार प्रधानमंत्री रहते चौधरी चरण सिंह उनके घर गए तो दरवाजा इतना छोटा था कि उन्हें सिर में चोट लग गई. वेस्ट यूपी वाली खांटी शैली में उन्होंने कहा, “कर्पूरी, इसको जरा ऊंचा करवाओ.” कर्पूरी ने कहा, “जब तक बिहार के गरीबों का घर नहीं बन जाता, मेरा घर बन जाने से क्या होगा?”

70 के दशक में जब पटना में विधायकों और पूर्व विधायकों को निजी आवास के लिए सरकार सस्ती दर पर जमीन दे रही थी, तो विधायकों के कहने पर भी कर्पूरी ठाकुर ने साफ मना कर दिया था. एक विधायक ने कहा- जमीन ले लीजिए. आप नहीं रहिएगा तो आपका बच्चा लोग ही रहेगा! कर्पूरी ठाकुर ने कहा कि सब अपने गांव में रहेगा.

उनके निधन के बाद हेमवंती नंदन बहुगुणा जब उनके गांव गए, तो उनकी पुश्तैनी झोपड़ी देख कर रो पड़े थे. उन्हें आश्चर्य हुआ कि 1952 से लगातार विधायक रहे स्वतंत्रता सेनानी कर्पूरी ठाकुर दो बार मुख्यमंत्री बनें, लेकिन अपने लिए उन्होंने कहीं एक मकान तक नहीं बनवाया.

सादगी की प्रतिमूर्ति कर्पूरी जैसा कोई जननायक न होगा!

सादगी की प्रतिमूर्ति कर्परी ठाकुर का 17 फरवरी 1988 को असामयिक निधन हो गया था. पूर्व सीएम के निधन के बाद उनके राजनीतिक शिष्य लालू प्रसाद अपने साथी शरद यादव की मदद से उनके उत्तराधिकारी बने. हालांकि सिद्धांतों के मामले में जमीन-आसमान का अंतर दुनिया ने देखा है.

कर्पूरी ठाकुर की जयंती के अवसर पर जननायक को समर्पित एक गीत रिलीज किया गया है. इसे लिखा है, गीतकार डॉ सागर ने. संगीत विपिन पटवा का है. आवाज दी है कैलाश खेर और सौमी शैलेश ने. गीत के बोल कुछ यूं हैं-

सदियों से था दूर तलक, घनघोर अंधेरा राहों में… कर्पूरी तब भरे उजाला, इन खामोश निगाहों में….जन जन बोले, तन मन डोले, हर दिल बोले- जिंदाबाद-जिंदाबाद.

जननायक को सलाम करते हुए आपको इसी गीत के साथ छोड़े जाते हैं.

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