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Exclusive: शिन्जियांग के ‘PM’, जो मांग रहे हैं ड्रैगन के जुल्‍म ओ सितम से आजादी, सुना रहे हैं उइगरों का दर्द

सबसे घातक दोहरा चरित्र चीन का है, जो अब दुनिया के लिए बर्दाश्त से बाहर हो गया है. चीन की बौखलाहट अब फिर सामने आई है. चीन की सरकारी मीडिया ग्लोबल टाइम्स ने कहा है कि श्रीलंका की जो मदद चीन कर सकता है. वो अमेरिका नहीं कर सकता. दरअसल चीन की बौखलाहट की दो वजहें हैं. पहली वजह ये है कि अधिकतर देशों में उसकी साजिश अंजाम तक नहीं पहुंच पा रही है और दूसरी वजह ये कि खुद चीन के बिखरने की आहट आ रही है. इस दूसरी वजह को समझिए.

चीन ने शिनजियांग प्रांत और तिब्बत को हड़प रखा है. शिनजियांग को चीन की राजशाही ने हड़पा था, जबकि तिब्बत को चीन की तानाशाही ने हड़प लिया, लेकिन ये दोनों देश भारत की तरफ मदद के लिए देख रहे हैं और भारत अब इस संभावना की ओर बढ़ रहा है कि इन्हें बांग्लादेश की तरह आजाद करा दे, जिसके बाद पड़ोस तो नहीं बदलेगा, लेकिन पड़ोसी बदल जाएंगे. भारत का एक पड़ोसी शिनजियांग होगा और इस फ्रंट पर चीन 1200 किलोमीटर दूर होगा. जबकि तिब्बत के फ्रंट पर 600 किलोमीटर दूर होगा.

इन दोनों की ही अपनी-अपनी निर्वासित सरकारें हैं. तिब्बत की निर्वासित सरकार भारत में है, जबकि शिनजियांग की निर्वासित सरकार अमेरिका में है और अब सवाल उठने लगा है कि क्या हमें ताइवान और तिब्बत पर चुप्पी साधने की पॉलिसी बदलनी होगी?

चीन के न हथियार काम आएंगे न गोला बारूद

चीन जानता है कि न तो उसके ये हथियार काम आएंगे, न गोला बारूद काम आएंगे और न ही उसके प्रोपेगैंडा वीडियो कुछ हासिल कर पाएंगे, क्योंकि भारत के पास ड्रैगन सेना को पछाड़ने का ही नहीं. पड़ोसी ही बदल देने का विकल्प मौजूद है. बांग्लादेश की तरह शिनजियांग और तिब्बत को भी आजाद होने में भारत मदद कर सकता है और अगर ये दोनों देश चीन से कटकर निकल गए, तो LAC पर चीन की ओर से पैदा किए गतिरोध का ये स्थायी इलाज होगा.

भारत के पास बुरे पड़ोसी को अच्छे पड़ोसी से रिप्लेस कर देने का विकल्प हमेशा से रहा है, लेकिन भारत की नीतियां बदली हैं, तो तीन निर्वासित सरकारों ने बीजिंग तक की नींद उड़ा दी है, जिसकी ठोस वजह भी है. कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना यानी CPC में भले ही चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने अकूत ताकत हासिल कर ली हो, ताकत इतनी कि वो चीन के आधार माने जाने वाले माओ जेडॉन्ग से आगे निकल गए हों, तानाशाह बन बैठे हों, लेकिन ये उनका ही राज है. जब बीजिंग की दीवारें दरकने लगी हैं. लाल बादशाह के महल की नींव हिलने लगी है और इसका सबूत है चीन का लहराता ये नया झंडा.

शिनजियांग की निर्वासित सरकार

ये झंडा बीजिंग से बहुत दूर अमेरिका के न्यूयॉर्क शहर में लहरा रहा है, जहां पर बाकायदा चीन की निर्वासित सरकार रहती है, जिस सरकार के स्वघोति राष्ट्रपति हैं. एक बिलियनायर बिजनेसमैन गुओ वेंगी (Guo Wengui), जो यूट्यूब पर चीन की कम्युनिस्ट सरकार के खिलाफ मुहिम चलाते हैं और जिन्होंने हडसन में पांच विमानों पर, “चीन के नए संघीय राज्य को बधाई” लिखा बैनर लहराकर बीजिंग में बैठे शी जिनपिंग को पसीने-पसीने कर दिया था.

जानकार मानते हैं कि जिनपिंग के लिए इस आवाज को नजरअंदाज करना भले ही मुमकिन हो, लेकिन अमेरिका के ही वाशिंगटन से उठ रही एक और सरकार की आवाज ने लाल देश के हुक्मरानों का सिर चकरा दिया है. ये सरकार है शिनजियांग प्रांत की, जहां उइगर मुसलमानों पर चीन बेइंतेहा जुल्म ढाता है और उसी सरकार के निर्वासित प्रधानमंत्री से टीवी9 भारतवर्ष ने मुलाकात की, जो शिनजियांग को शिनजियांग मानने से इनकार करते हैं. सालेह हुदेयार, जो शिनजियांग को ईस्ट तुर्किस्तान के बताते हैं और यहां के निर्वासित प्रधानमंत्री हैं.

“शिनजियांग नहीं ईस्ट तुर्किस्तान है असल नाम”

उन्होंने कहा, ‘हमारे देश का नाम ईस्ट तुर्किस्तान है, जिसपर 1884 में चीनी राजवंश ने कब्जा कर लिया और इसे शिनजियांग नाम दे दिया. हालांकि, ईस्ट तुर्कीस्तान के लोगों ने 20वीं सदी में खुद को स्वतंत्र घोषित कर दिया.’ चीन के तानाशाहों को जिस तरह तिब्बत की निर्वासित सरकार का नाम सुनकर पसीना आता रहा है, उसी तरह पसीना आता है ईस्ट तुर्किस्तान की आवाज सुनकर.

“हम दुनिया और भारत से अपेक्षा करते हैं कि वो शिनजियांग में जारी अत्याचार को नरसंहार की मान्यता दें और चीन के खिलाफ कड़े कदम उठाएं. ईस्ट तुर्किस्तान को ऑक्युपाइड कंट्री के तौर पर मान्यता दें. हमें आजादी हासिल करने में पूरी दुनिया मदद करे और 71 साल से जारी नरसंहार को रोकने में मदद करें.”

इस निर्वासित सरकार ने भारत के सामने चीन-भारत सीमा विवाद का एक सीधा सा हल सुझाया है और वो हल है तिब्बत और शिनजियांग की आजादी में मदद.

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