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कंगना का 100 प्रतिशत सच, रिया का 100 प्रतिशत झूठ…चलो भूल जाएं शहादत !

कैमरे (Camera) का नया टारगेट सेट हो चुका है. कैमरे की नई दौड़ बदस्तूर जारी है. रिया कल थी, कंगना आज है. सुशांत (Sushant) को न्याय दिलाने की अब बाद में सोचेंगे. फिलहाल फिक्र कंगना की है. कंगना भी कल तक सुशांत के लिए लड़ रही थी, अब खुद के लिए लड़ रही है. कैमरे कल तक रिया को जेल भेजने के लिए उतावले थे, वही कैमरे अब कंगना के टूटे दफ्तर की हर ईंट गिन रहे हैं. उद्धव सरकार की ईंट-से-ईंट बजाने पर आमादा हैं. कंगना से ज्यादा कैमरे चिंतित हैं. उनका दावा है कि सवाल देश का है. हिरोइन के ‘तू’ कहने पर केस क्यों? राउत के ‘हरामखोर’ कहने पर उनका भी वही हस्र क्यों नहीं? ऐसे कई सवाल हैं जिनका जवाब लेने की जल्दी में सारी मर्यादाएं तार-तार हैं. सारी वर्जनाएं बेकार हैं.

कंगना और उद्धव ठाकरे की ‘सेना’ लड़ रही है, तो लड़ भारतवर्ष भी रहा है. उसकी जंग पर नजर-ए-इनायत होनी बाकी है. लड़ भारतीय सैनिक भी रहे हैं, लेकिन उनकी लड़ाई कैमरे की पकड़ से बाहर है. और जो कुछ कैमरे से बाहर है, वह ‘कमोडिटी’ नहीं है. बाजार में कंगना के हर फ्रेम की कीमत है. भारत के 20 सैनिकों ने रात के अंधेरे में शहादत दे दी. उनकी शहादत का कोई फ्रेम कैमरे में कैद नहीं है. इसीलिए देश के सपूतों का शौर्य गुमनाम है. आखिर कैमरे को साक्षात सबूत और प्रमाण की जो दरकार है!

कंगना का 100 प्रतिशत सच…रिया का 100 प्रतिशत झूठ !

कंगना (Kangana) एक चुनी हुई सरकार के मुखिया के लिए अपशब्दों का इस्तेमाल करती हैं. सरकार में बैठे खेमे के कुछ सीनियर नेता वैसे ही अपशब्द कंगना के लिए कहते हैं. लक्ष्मण रेखा के पार कौन कितनी दूर गया, कहना-समझना मुश्किल है. अपना दफ्तर तोड़े जाने को कंगना लोकतंत्र की हत्या बताती हैं. लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई सरकार के मुखिया को ‘तुम-तड़ाक’ कहना उन्हें चुनने वाले वोटरों का अपमान है या नहीं, इसकी चर्चा की कोई जरूरत नहीं है. फिलहाल कंगना जो भी कह रही हैं, सिर्फ वही सच है. वैसे ही, जैसे अब तक रिया चक्रवर्ती जो भी कह रही थी, वो सब झूठ था.

सीमा पर सच्ची और नि:स्वार्थ जंग

सीमा पर बैठे दुश्मन देश के दुश्मन हैं. उनकी लड़ाई में कोई मिलावट नहीं है, उनकी जंग नि:स्वार्थ है. वे ऐसी ताकत के खिलाफ लड़ रहे हैं, जिसे पूरी दुनिया एकमत से खतरा मान रही है. लद्दाख से लेकर अरुणाचल तक भारत बस अपनी जमीन बचाने के लिए नहीं लड़ रहा. भारत पूरी दुनिया की लड़ाई लड़ रहा है. इस दृष्टिकोण से सोचें तो लड़ाई कितनी बड़ी है! भारत का मिशन कितना अहम, पाक और पवित्र है. सीमा पर दिख रहे भारत के संकल्प में कितने ही मुल्कों का संकल्प छिपा है!

पूर्वाग्रही कैमरों से कैसी उम्मीद?

लेकिन कैमरा तो मुंबई की सड़कों पर कभी रिया की गाड़ी के पीछे दौड़ रहा है, तो कभी कंगना की चिरौरी को देश की बेटी के स्वाभिमान की लड़ाई बताने और साबित करने पर तुला है. ये हाल तब है, जब कंगना बनाम उद्धव की लड़ाई में कुछ भी तय करना मुश्किल है. अगर आप अपने निजी स्वार्थ या पसंद-नापसंद को थोड़ी देर के लिए परे रखेंगे, तो किसी एक खेमे में खड़ा होना आपके लिए मुश्किल हो जाएगा. अपने आग्रहों-पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर आप न कंगना को सपोर्ट कर पाएंगे, न ही उद्धव और उनकी टीम को. इसके बाद कहने की जरूरत नहीं कि जो पहले सुशांत और अब कंगना को न्याय दिला रहे हैं, उनकी असल मंजिल क्या है?

सीमा पर लड़ाई खतरनाक सोच के खिलाफ

जबकि सीमा पर जो कुछ चल रहा है, उस सच को सच कहने के लिए न किसी पूर्वाग्रह की जरूरत है और न ही किसी खेमे में खड़े होने की. वहां तो सबकुछ शीशे की तरह साफ है. देश के सैनिक सिर्फ अपने देश के लिए नहीं, बल्कि इस बार दुनिया के तमाम देशों के साझा हित की खातिर लड़ रहे हैं. और ये लड़ाई भूमि के एक टुकड़े के लिए नहीं है. ये लड़ाई एक ऐसी सोच के खिलाफ है, जो देर-सबेर कई देशों को निगलने या उन्हें छिन्न-भिन्न कर डालने का मंसूबा रखती है.

याद कीजिए विकास सिंह के बयान को

कुछ समय पहले की बात है. सुशांत के पिता के वकील ने कहा था कि कंगना सुशांत के लिए नहीं लड़ रही है. कंगना खुद की लड़ाई लड़ रही है. सुशांत के परिवार की ओर से कही गई तमाम बातें कैमरे को भा गईं. बार-बार दिखाई-सुनाई गईं. विकास सिंह का ये बयान जल्दी ही नजरअंदाज कर दिया गया. क्योंकि सुशांत को कथित तौर पर न्याय दिलाने के लिए खड़े किए गए पूरे आडंबर से ये बयान मिसमैच करता था.

जांचने-सोचने-समझने-परखने की बात है

उद्धव से आमना-सामना हो जाने के बाद कंगना ने कितनी बार सुशांत का नाम लिया, ये भी जांचने की बात है. फिर कंगना को लेकर विकास सिंह कहां गलत कह रहे थे, ये भी सोचने की बात है. यही नहीं, सुशांत से कंगना पर शिफ्ट हो रही पटकथा को भी समझने की जरूरत है. क्योंकि सीमा पर शहादत, देश पर आए संकट और महामारी से परेशान अवाम को नजरअंदाज कर सुशांत और कंगना के नाम पर लड़ने वालों की मंशा परखने की दरकार है.

कहना पड़ेगा कि अजीब संयोग है मुंबई में जो कुछ चल रहा है, उसके पीछे की सोच खतरनाक दिखती है. जबकि सरहद पर हमारे सैनिकों की लड़ाई एक अन्य खतरनाक सोच के खिलाफ ही है.

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