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सूबेदार जोगिंदर सिंह की जीवनी | Subedar Joginder Singh Biography in Hindi

सूबेदार जोगिंदर सिंह   Biography (Subedar Joginder Singh)(26 सितंबर 1921 – 23 अक्टूबर 1962), जो की  एक भारतीय सेना के सैनिक थे, और परमवीर चक्र प्राप्तकर्ता थे । परमवीर चक्र जो की   भारत का सर्वोच्च सैन्य अलंकरण है जो दुश्मनों की उपस्थिति में उच्च कोटि की शूरवीरता एवं त्याग के लिए प्रदान किया जाता है।

Subedar Joginder Singh Biography in Hindi सूबेदार जोगिंदर सिंह का जीवन परिचय 

जोगिंदर सिंह का जन्म 28 सितंबर 1921 को पंजाब में मोगा के गाँव मेहाकलन में हुआ था। उनके पिता का नाम शेर सिंह और माता  बीबी कृष्ण कौर थे  उन्होंने अपने बचपन को एक ही गांव में बिताया। उनका परिवार बहुत समृद्ध नहीं था और अपने परिवार की वित्तीय बाधाओं के कारण, सिंह अपनी शिक्षा पूरी करने में सक्षम नहीं थे। उन्होंने ऐसी स्थिति में  सेना में शामिल होने का फैसला किया जोगिन्दर की सोच थी कि सेना ही उनके लिए सबसे बेहतर जगह हो सकती है।  उनका विवाह भी बीबी गुरदयाल कौर से हुआ था जो कोट कपूरा के पास कोठे रारा सिंह गांव के सैनी सिख परिवार से थीं.

Military Career Subedar Joginder Singh

Subedar Joginder Singh Biography  Get Here
Image Source: YouTube

ब्रिटिश भारतीय सेना में शामिल होने पर, सिंह को सिख रेजिमेंट के प्रथम बटालियन में 28 सितंबर 1 936 को तैनात किया गया था।  सेना में शामिल होने के बाद, उन्होंने शिक्षा में उनकी रुचि की पहचान की, और जल्द ही सेना शिक्षा परीक्षा पास कर दी। बाद में उन्हें यूनिट शिक्षा प्रशिक्षक के रूप में नियुक्त किया गया।उनकी ड्रिल और उनकी वर्दी का रख – रखाव आदि इतना अच्छा था कि उनका उदाहरण दिया जाता था। उन्होंने द्वितीय विश्व युद्ध में ब्रिटिश इंडियन आर्मी के लिए वे बर्मा जैसे मोर्चो पर लड़े, और 1947-1948 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान श्रीनगर में मुकाबला करने वाली सिख रेजीमेंट का हिस्सा भी वे थे ।

भारत-चीन युद्ध

अगस्त 1962 का समय आया जब चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी ने भारत पर हमला कर दिया था. उसने अक्साई चिन और पूर्वी सीमा (नॉर्थ-ईस्ट फ्रंटियर एजेंसी) पर अपना दावा ठोका था. चीनी सेना ने थगला रिज पर कब्जा कर लिया. रक्षा मंत्री वी. के. कृष्ण मेनन ने प्रधानमंत्री नेहरू की सहमति से 22 सितंबर को सेनाध्यक्ष को आदेश दिए कि थगला रिज से चीन को बाहर खदेड़ा जाए. भारतीय सेना की नई IV Corps ने इस असंभव काम के लिए टुकड़ियों को इकट्ठा किया. हालांकि चीनी सेना ज्यादा नियंत्रण वाली स्थिति में थी.अब चीन को तवांग पर कब्जा करना था जो उसकी सबसे बड़ी चाहत थी. उसे तवांग पहुंचने से रोकने का काम भारतीय सेना की पहली सिख बटालियन को दिया गया था.

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23 अक्तूबर 1962 का दिन था। सूबेदार जोगिन्दर सिंह रिज के पास नेफा में टोंग पेन में अपनी टुकड़ी के साथ तैनात थे। सुबह 05:30 बजे चीन की फौजों ने बूमला पर जबरदस्त धावा बोला। उनका इरादा टोवांग तक पहुँच जाने का था। दुश्मन की फौज ने 3 दौरों में उन मोर्चे पर हमला किया। हर बार सैनिकों की संख्या 200 थी। पहला हमला सूबेदार की फौजें बहादुरी से झेल गई जिसमें चीन को कोई कामयाबी नहीं मिली। उसका भारी नुकसान भी हुआ। और उसे थम जाना पड़ा। कुछ ही देर बाद दुश्मन ने फिर धावा बोला। उसका भी सामना जोगिन्दर सिंह ने बहादुरी से किया। ‘जो बोले सो निहाल…’ का नारा लगाते और दुश्मन का हौसले पस्त कर देते।

लेकिन दूसरा हमला जोगिन्दर सिंह की आधी फौज साफ कर गया। सूबेदार जोगिन्दर सिंह खुद भी घायल थे। उनकी जाँघ में गोली लगी थी फिर भी वह जिद में थे कि मैदान नहीं छोड़ेंगे। उनके नेतृत्व में उनकी हिम्मत और साहस को देख कर पूरी फौज भी उनके साथ जमी हुई थी, हालाँकि उनके बहुत से सैनिक घायल हो चुके थे। तभी अचानक दुश्मन की ओर से तीसरा हमला बोल दिया गया। अब तो सूबेदार जोगिन्दर सिंह ने खुद हाथ में मशीनगन लेकर गोलियाँ दागनी शुरू कर दीं थीं। चीन की फौज का भी इस हमले में काफ़ी नुकसान हो चुका था, लेकिन वह लगातार बढ़ते जा रहे थे फिर स्थिति यह आई कि सूबेदार की फौज के पास गोलियों का भण्डार खत्म हो गया। अब बारी थी संगीन को खंजर की तरफ इस्तेमाल करके दुश्मन का काम तमाम करने की।

Param Vir Chakra

इस कार्रवाई के दौरान, सुबेदार जोगिंदर सिंह ने कर्तव्य, प्रेरणादायक नेतृत्व और सर्वोच्च क्रम की बहादुरी के प्रति समर्पण दिखाया।

सूबेदार और उनके साथी इस मुठभेड़ में भी बिना हिम्मत हारे पूरे जोश के साथ जूझते रहे और आगे बढ़ती चीन की फौजों को चुनौती देते रहे। आखिर वह और उनके बचे हुए सैनिक दुश्मन के कब्जे में आ गए। इस मोर्चे को भारत जीत नहीं पाया लेकिन उस मोर्चे पर सूबेदार जोगिन्दर सिंह ने जो बहादुरी आखिरी पल तक दिखाई, उसके लिए उनको सलाम। सूबेदार जोगिन्दार सिंह दुश्मन की गिरफ्त में आ गए, उसके बाद उनका कुछ पता नहीं चला। चीनी फौजों ने न तो उनका शव भारत को सौंपा, न ही उनकी कोई खबर दी। इस तरह उनकी शहादत अमर हो गई।

सिंह की मौत की खबर सुनने पर, उनकी बड़ी बेटी की मृत्यु हो गई।  चीनी ने 17 मई 1963 को बटालियन में पूर्ण सैन्य सम्मान के साथ उनकी राख भेज दी। बाद में कलश मेरठ में सिख रेजिमेंटल सेंटर में लाया गया और आखिरकार उनकी पत्नी को सौंप दिया गया

In Popular Culture

Subedar Joginder Singh के जीवन और चीन-भारत युद्ध के दौरान उनकी कार्रवाई पर एक Biography बायोग्राफी फिल्म बनायी जा रही है। इस फिल्म में पंजाबी सिनेमा के ऐक्टर और सिंगर गिपी ग्रेवाल “जोगिन्दर” के रोल में नज़र आ रहे हैं ।

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