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वर्ल्ड प्रेस डे – कितनी स्वतंत्र है मीडिया…

वर्ल्ड प्रेस डे – कितनी स्वतंत्र है मीडिया…

किसी भी देश में लोकतंत्र और लोकतंत्र में प्रेस की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है। स्वतंत्रता या आजादी एक एसा शब्द है जिसकी आवश्यक्ता हर किसी को है। लेकिन जब हम बात करते हैं आजादी की तो उसकी सीमा क्या है इस पर भी चर्चा अनिवार्य है। क्या किसी भी राष्ट्र के द्वारा दी जाने वाली अत्यधिक आजादी ठीक है ? या फिर आजादी या स्वतंत्रता के नाम पर कुछ भी न देना ये कैसा होता है। ये ठीक उसी तरह होता है जैसे आपको भूख लगी हो और आप खाना न खा पाओ। नागरिकों के अधिकारों की रक्षा, किसी समुदाय के अधिकारों की रक्षा। सबको समता ये सब बातें निर्भर करती हैं लोकतंत्र के उपर। और लोकतंत्र में जनहित की रक्षा के लिए मीडिया या प्रेस का रोल सबसे महत्वपूर्ण हैं।
लोकतंत्र में मीडिया को चौथा स्तंभ माना जाता है। यदि हम बात करें प्रेस की स्वतंत्रता पर तो भारत में पूरी मीडिया इंडस्ट्री संविधान के अनुच्छेद 19 में भारतीय नागरिकों को दिए जाने वाले अभिव्यक्ति की आजादी पर टिकी हुई है।
अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मीडिया की आजादी को सम्मान देने के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा द्वारा 3 मई को विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस घोषित किया गया। जिसे हर साल प्रेस दिवस के रूप में भी मनाया जाता है।

बिना प्रेस की स्वतंत्रता के कहीं भी एक कुशल लोकतंत्र स्थापित नहीं हो सकता। और जब प्रेस की स्वतंत्रता पर खतरा होता है तो कोई एक ताकत लोकतंत्र पर हावी होने की कोशिश करती है। ये बात इतिहास के कई किस्से भी सिद्ध करते हैं। ये एक बड़ी विडंबना वाली बात होती है जब हम कहते हैं कि एक लोकतांत्रिक देश में प्रेस की आजादी पर खतरा मंडरा रहा है। लेकिन ये भी वास्तविक्ता है कि प्रेस के काम करने के बीच अड़चने कम नहीं है। कहीं न कहीं कोई दबाव जरूर निकल आता है।
हालांकि वर्तमान समय में सवाल ये भी उठता है कि क्या मीडिया पूर्णतः निष्पक्ष है। पेड न्यूज और टीआरपी के इस दौर में क्या हम जनता के सवालों को और सामाजिक मुद्दों को उठा पा रहे हैं ? पत्रकारिता में हम देखते हैं प्राईम टाईम डिबेटों में बड़ी चिल्लाहट मची होती है लेकिन उसका कुछ निष्कर्ष भी निकलता है? ये सवाल बड़ा महत्वपूर्ण है।
आज के दौर में पत्रकारिता क्षेत्र में वो खबरें नहीं आ पा रही हैं जो आम लोगों से जुड़ी होती हैं। बल्कि ये चीजें ज्यादा प्रचलित हैं जिनपर विवाद हो और जिससे संस्थान को बिजनेस अच्छा मिले कुछ भी कहो लेकिन कटु सत्य यहीं है। आखिर मीडिया संस्थानों के उपर किसका दबाव है ? यही बात है जो कि प्रेस पर सवाल भी खड़ा करती है और उसकी आजादी को भी कटघरे में लाती है। लेकिन क्या सभी पत्रकारों को इस श्रेणी में रखना भी उचित है कि वो दबाव में या फिर किसी लालच में पत्रकारिता कर रहे हैं। बिल्कुल नहीं ऐसा बिल्कुल भी नहीं है क्योंकि अधिकतम पत्रकार निष्ठापूर्ण कार्य आज भी करते हैं।
आखिर प्रेस की आजादी कौन छीन रहा है ? और वो क्यों किसी के दबाव में आकर काम कर रहा है? इन दोनों ही सवालों का जवाब पत्रकारों को खुद ढूंढना है। खासतौर पर संस्थानों के उच्च अधिकारियों को क्योंकि एक रिपोर्ट तो सिर्फ वही काम करेगा जो उसे कहा जायेगा। या फिर चलेगा वही जो चैनल या सामाचार पत्र के शीर्शस्थ लोग चलाना चाहेंगे। कुछ इन्हीं कारणों से आज पत्रकारिता क्षेत्र की छवि और पत्रकारों की छवि खराब हो रही है। जिससे उभरना जरूरी है। अगर इसी तरह से किसी भी एक विवादित मुद्दे को अपना मुख्य ऐजेंडा बनाकर रात दिन उसी पर चिल्लाहट मचाना पत्रकारिता है तो इससे हम सिर्फ दो विचारधाराऐं बना रह हैं एक वो जो पक्ष में होगी और एक वो जो उसके विपक्ष में होगी। और साथ ही अपने संस्थान का बिजनेस इनक्रीस करेंगे। पत्रकारिता का अर्थ ये नहीं है कि हम किसी भी अंतिम निर्णय पर पहुंचे, हम सिर्फ विश्लेषण कर सकतें या उसपर लोगों का पक्ष जान सकते हैं। जरूरत है कि प्रेस की आजादी और कार्यशैली पर आत्ममंथन किया जाय और इसमें सुधार लाया जाय।

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