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इसे कहते हैं प्यार..तेजाब पीड़िता लक्ष्मी को आलोक ने दी नई जिंदगी

New Delhi : लक्ष्मी 15 साल की थी और बड़ी होकर एक कामयाब सिंगर बनना चाहती थी। मगर सिर्फ एक ‘ना’ यानी कि इंकार ने उसके सारे सपनों को जला कर रख दिया और उसकी जिंदगी बदल गई। उसके उपर ह’मला हुआ। वो भी ऐसा-वैसा ह’मला नहीं बल्कि वो ह’मला जो जिस्‍म के साथ-साथ आत्‍मा भी जला देता है।

इस हम’ले के जख्‍म से रिसने वाले मवाद तो एक समय के बाद बंद हो जाते हैं मगर इसका दर्द पूरी जिंदगी रिसता रहता है। अगर वो बच गया तो समाज उसे दोयम दर्जे का नागरिक बना देता है। जिंदगी बेहद बोझिल व दर्दनाक हो जाती है और वो तिल-तिल कर जीने को मजबूर हो जाता है। हम बात कर रहे हैं एसि’ड अटै’क (ते’जाबी हम’ले) की।

आज लक्ष्मी देश में एसि’ड अटै’क की शिकार लड़कियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन चुकी हैं। अब अगर बात लक्ष्‍मी की हो रही हो तो उस  शख्स को कैसे भूला जा सकता है जिसने लक्ष्‍मी के अंदर जीने का जज्‍बा भरा और उसे समाज के एक प्‍लेटफार्म पर लाकर खड़ा किया। सिर्फ लक्ष्‍मी के अंदर ही नहीं बल्कि उन तमाम एसि’ड अटै’क पीड़िताओं के अंदर इस युवक ने वो दम भरा जिससे वो अपनी आवाज बुलंद कर सकें। इस व्‍यक्ति ने बुरी दुनिया में नि:स्‍वार्थ और पवित्र प्रेम की एक नई परिभाषा भी गढ़ी। सरकारी नौकरी छोड़कर एसि’ड अटै’क पीड़िताओं के लिये मुहिम (http://www.stopacidattacks.org/) चलाने वाले इस सख्‍स का नाम आलोक दीक्षित है।

सूरज तो उस दिन भी रौशनी लेकर निकला था मगर लक्ष्‍मी की जिंदगी में अंधेरा कर गया। उस दर्दनाक सुबह की भयावह कहानी बताते हुए लक्ष्‍मी कांप गई। लक्ष्‍मी ने बताया कि बात 2005 की है जब उसकी उम्र 15 साल थी और वो 7वीं कक्षा में पढ़ती थी। उसकी उम्र के दोगुने से भी बड़े उम्र (32 वर्ष) के एक व्‍यक्ति ने उसे शादी के लिये प्रपोज किया। लक्ष्‍मी ने उसे इंकार कर दिया। लक्ष्‍मी ने बताया कि 22 अप्रैल 2005 की सुबह लगभग 10 बजकर 45 पर वो दिल्‍ली के भीड़-भाड़ वाले इलाके खान मार्केट में एक बुक स्‍टोर पर जा रही थी कि वो युवक अपने छोटे भाई की गर्लफ्रेंड के साथ आया और उसे धक्‍का दे दिया। धक्‍का लगते ही लक्ष्‍मी सड़क पर गिर गई और उस युवक ने उसके उपर ते’जाब फेंक दिया।

लक्ष्‍मी ने बताया कि वो लंबे समय तक पुरुषों से नफरत करती रही। उन्‍होंने बताया कि प्‍यार नाम के शब्‍द से तो उन्‍हें डर लगता था। मै प्रेम भरे गीत तो गाया करती थी मगर उनके शब्द मेरे लिए खोखले थे। उनका ये नजरिया तब तक रहा, जब तक वो आलोक दीक्षित से नहीं मिली थीं। आलोक दीक्षित कानपुर के रहने वाले हैं और पत्रकार रह चुके हैं। उनकी मुलाकात लक्ष्मी से ते’जाब ह’मलों को रोकने की एक मुहिम के दौरान हुई और फिर उन्हें एक दूसरे से प्यार हो गया। दोनों एक बच्ची के मां- बाप हैं। अब ये दोनों दिल्ली के पास एक इलाके में रहते हैं और अपने छोटे से दफ्तर से मिल कर ते’जाब ह’मलों के खिलाफ मुहिम चला रहे हैं।

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