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मूर्ति के पैर पकड़ कर बैठना ईश्वर की शरण नहीं

New Delhi: संसार माया जाल है। इस जाल में उलझक जीव जन्म जन्मांतर तक भटकता रहता है। हो सकता है कि आपने भी अब तक करोड़ों जन्म लिये हों और अगर इस जन्म में माया के बंधन से प्रयास नहीं किया तो आगे भी करोड़ों योनियों में भटकना पड़ेगा।

इन्हीं स्थितियों से निकलने के लिए भगवान श्री कृष्ण ने कहा है दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया। मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते॥

‘यह अलौकिक अर्थात् अति अद्भुत त्रिगुणमयी मेरी माया बड़ी दुस्तर है परंतु जो पुरुष केवल मुझको ही निरंतर भजते हैं, वे इस माया का उल्लंघन कर जाते हैं अर्थात् संसार से तर जाते हैं।’

यह जो माया है बड़ी दुस्तर है, इसको तरना बड़ा कठिन है। असम्भव नहीं कठिन है। यह तीन गुणवाली है। तामसी आदमी अपना बिगाड़ करके भी दूसरे का बड़ा बिगाड़ करने में खुश होगा। आलस्य, निद्रा, शराब-कबाब में, कलह में वह मजा लेगा- वह माया के तामसी गुण में बंधा है।

राजसी आदमी भोग में, संग्रह में- माया के रजोगुण में बंधा है। मरनेवाले शरीर की सुख-सम्पत्ति और मान-प्रतिष्ठा में अपना जीवन खपा देता है नासमझ! सात्त्विक आदमी होम-हवन, यज्ञ-याग किया, दान-पुण्य यह-वह… अच्छा काम किया और लोग बोल रहे हैं: ‘अच्छे हैं, नेक हैं, आहा…’बोले : ‘अच्छा है, अपना घर है, बेटे वेल-सेट हैं, बेटी का विवाह करा दिया, भगवान की दया है मुझ पर…’ वह सात्त्विक व्यक्ति इन्हीं में बँधा है, फँसा है। यह माया का गुण है।

कोई स्वर्ग और बिहिश्त का सपना लेकर बैठा है: ‘बस… संतुष्ट हूँ।’ वह माया के सत्त्वगुण अंश में फँसा है। तो यह माया है, इससे तरना दुस्तर है लेकिन जो भगवान की शरण आता है वह तर जाता है। भगवान ने भी कहाः मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते।

अब एकनाथजी महाराज कहते हैं कि ‘‘मेरे विट्ठल! मेरे प्रभु!! तुम्हारी शरण क्या है? क्या मैं हिमालय में चला जाऊँ – यह तुम्हारी शरण है? या गुफा में समाधि लगाऊँ तो तुम्हारी शरण है? अथवा पंढरपुर में तुम्हारी आरती-पूजा करता रहूँ – यह तुम्हारी शरण है? आप ही बताओ आपकी शरण क्या है?’’ भगवान की शरण जाना चाहिए, गुरु की शरण जाना चाहिए… ‘शरण’ तो नाम सुन लिया।

pravachan

चित्रकारों ने कल्पना करके भगवान का जो चित्र बनाया और उस चित्र पर से चित्र लेकर जो फोटो छपे और हमारे घर आये, क्या उस फोटो के पैर पकड़ के बैठना भगवान की शरण है? अथवा उस फोटो को देखकर किसी ने पत्थर में से भगवान का श्रीविग्रह बनाया, उनको हम प्रणाम तो करते हैं, पूजा भी करें अच्छा है तो क्या उस जयपुर से लाये हुए श्रीविग्रह के, जिसमें प्राण-प्रतिष्ठा कर दी, उसके पैर पकड़ के बैठना भगवान की शरण है?

भगवान की किसी धातु से अथवा पत्थर से बनी हुई मूर्ति अथवा यरूसलेम में रखे हुए उस पत्थर को पकड़ के आलिंगन करके बैठना खुदा की शरण है क्या, भगवान की शरण है क्या? अगर मूर्ति के पैर पकड़ के बैठना या श्रीविग्रह के पैर पकड़ के बैठना ही भगवान की शरण है तो पकड़ ले पैर, छुट्टी हो जाय, कल्याण हो जाय।

संत एकनाथजी महाराज एकांत में अंतर्यामी ईश्वर से वार्ता, ईश्वर-चिंतन, ईश्वर-पुकार करते-करते शांत हो गये तो उन संत को मानो उस सच्चिदानंद ने, उस परमेश्वर ने, उस गुरुतत्त्व ने, जिसमें उनकी स्थिति हुई, यह स्फुरना दिया कि एक संकल्प उठता है और दूसरा उठने को है, इसके बीच की जो संकल्परहित स्थिति है, वह सच्चिदानंद है।

उस सच्चिदानंद में विश्रांति करना ईश्वर की शरण है। सुख और दुःख चले जाते हैं फिर भी जो नहीं जाता, उसमें स्थिति करना – यह ईश्वर की शरण है। अनुकूलता में हर्ष होता है और प्रतिकूलता में शोक होता है। हर्ष-शोक, राग और द्वेष मति के धर्म होते हैं।

वह मति बदल जाती है, हर्ष-शोक बदल जाते हैं फिर भी हर्ष-शोक के समय उनको जो देखता है, हर्ष-शोक का जो साक्षी है उस परमात्मा में स्थिति करना – यह ईश्वर की शरण है। मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते। जैसे मछुआरा चारों तरफ जाल डालता है तो मछलियाँ देर-सवेर पकड़ी जाती हैं लेकिन जो मछली मछुआरे के पैरों में घूमती है, उसको मछुआरे का जाल नहीं पकड़ता है। ऐसे ही जो सच्चिदानंद के इर्द-गिर्द अपने चित्त को ले जाता है, वह इस माया के जाल से छूट जाता है।

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