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वास्तु टिप्स: व्यापार की सफलता के लिए हमेशा ध्यान रखें वास्तु के उपाय

New Delhi: आज के परिपेक्ष में जीवनयापन हेतु आजिविका का साधन ही सबसे महत्वपूर्ण विषय है। व्यापार कार्य आपको तो रोजगार देता ही है और आपके माध्यम से कई लोगों की आजीविका का साधन भी बनता है। 

वास्तु के नियमानुसार बना प्रतिष्ठान व्यापार में सफलता को प्राप्त करने में सहायता प्रदान करता है। अत: किसी भी औद्योगिक परिसर या कल कारखाने की उन्नत्ति एवं विस्तार के लिए वास्तु के नियमों के अनुसार निर्माण करना चाहिए।

व्यापार करने के लिये ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) से देव कृपा, अग्रि कोण (दक्षिण-पश्चिम) से समृद्धि, उत्तर दिशा से व्यापारिक सम्बन्धों में बढ़ोत्तरी, नैऋत्य कोण (दक्षिण-पश्चिम) से स्थिरता, पूर्व दिशा से सम्मान और सरकारी कार्य, वायव्य कोण (उत्तर-पश्चिम) से कार्यों में गति, दक्षिण से वर्चस्व व पश्चिम से कर्मचारियों की निष्ठा प्रभावित होती है। अत: कोई भी दिशा अगर वास्तु अनुरूप नहीं है तो व्यवसाय की गाड़ी का वह पहिया रुक जायेगा।

वास्तुशास्त्र के अनुसार फैक्ट्री या उद्योग के लिए सदैव ऐसी भूमि का चयन करना चाहिए जिस पर तुलसी का पौधा पनपता हो अर्थात भूमि का उपजाऊ और सकारात्मक ऊर्जा से परिपूर्ण हो। व्यापारिक परिसर का भूखण्ड वर्गाकार या आयताकार होना चाहिए। याद रखें आयताकार में भूखण्ड़ की लम्बाई चौड़ाई के दुगने से ज्यादा नहीं होनी चाहिये। यदि औद्योगिक भूखण्ड का ईशान कोण बढ़ा हुआ हो तो ऐसी भूमि स्वीकार की जा सकती है परन्तु इसके अलावा किसी भी दिशा का बडऩा व घटना शुभ नहीं होता।

व्यवसायिक भूखण्ड में उत्तर एवं पूर्व क्षेत्र को हल्का एवं खुला हुआ रखना चाहिए। क्योंकि ईशान क्षेत्र को अवरूद्ध या बंद रखने से ईश्वरीय शुभ ऊर्जा में रुकावट आती है जिससे धन का आगमन और व्यवसाय की प्रगति रूक जाती हैं। भूखण्ड के मध्य स्थान अर्थात् ब्रह्म स्थान को खुला रखना चाहिए। इस स्थान पर किसी भी तरह का निर्माण कार्य करना व्यवसाय में निरंन्तर परेशानियों को जन्म देता है।

व्यवसायिक भूमि का ढ़ाल हमेशा उत्तर या पूर्व की ओर रखें। इस तरह औद्योगिक इकाईयों की मुख्य फैक्ट्री के भवन जहाँ उत्पादन होता है, के छत का झुकाव भी उत्तर और पूर्व में रखना श्रेष्ठ होता है। व्यवसायिक परिसर के उत्तर, पूर्व या उत्तर-पूर्व में कुँआ, हैण्डपम्प, भूमिगत जल व्यवस्था, फव्वारा आदि रखना वास्तु में जल तत्व को संरक्षित करता है और सकारात्मक वातावरण को उत्पन्न करता है। छत पर पानी का टैंक या संचयन पश्चिम दिशा, या दक्षिण-पश्चिम दिशा में रखना चाहिए। फैक्ट्री या उद्योग में काम करने वाले कर्मचारी एवं मजदूरों के लिए कमरा हमेशा पश्चिम क्षेत्र में बनाना चाहिए।

ऐसा करने से कर्मचारी निष्ठा से कार्यों को सम्पादित करते हैं। व्यवसायिक परिसर में स्नानगर के लिए सबसे उपयुक्त स्थान पूर्व दिशा है। किसी भी व्यवसायिक प्रतिष्ठान के मुख्य द्वार के बाहर कचरा, गंदे पानी का नाला, खड्डा नहीं होना चाहिए। यह उद्योग की संपन्नता को रोककर उद्योगपति को कर्जदार बना देता है। उद्योगपति को खुद नैऋत्य (दक्षिण-पश्चिम) क्षेत्र में बैठना चाहिए ताकि फैक्ट्री पर उनका स्वामित्व एवं नियंत्रण बना रहें। मशीनें जो ज्यादा स्थान घेरे या वजन में भारी हो, उन्हें ठीक नैऋत्य दिशा के मध्य से दक्षिण या पश्चिम में स्थापित करना चाहिए।

    वास्तुशास्त्र के अनुसार व्यावसायिक प्रतिष्ठानों में शुभ ऊर्जा बढ़ाने हेतु कुछ मुख्य निम्र बिन्दुओं को सदैव ध्यान में रखना चाहिए :-

    • पीली मिट्टी वाला भूखण्ड हो तो दुकान एंव ऑफिस आदि के लिए शुभ होता है।
    • काली मिट्टी वाला भूखण्ड औद्योगिक कार्यो के लिए शुभ है।
    • प्रतिष्ठान इस प्रकार बनाया जाए कि भूखण्ड के पूर्व और उत्तर अधिक से अधिक खुला हों।
    • प्रतिष्ठान परिसर में मंदिर उत्तर पूर्व दिशा में बनाना चाहिए।
    • सेल्समैन या रिसेप्शन का कर्मचारी के बैठने की व्यवस्था में वह पूर्व या
    • उत्तर दिशा की तरफ देखता हुआ होना चाहिए।
    • स्वामी कक्ष को प्रशासनिक भवन के नैऋव्य में बनाना चाहिए।
    • मालिक और कर्मचारी के बैठने के स्थान के ऊपर लोहे का बीम नहीं होना चाहिए।
    • भूखण्ड को दक्षिण-पश्चिम की ओर से ऊँचा तथा ईशान कोण की ओर से नीचा रखना चाहिए।
    • एकाउन्ट्स, खजांन्ची, लेखा विभाग या धन के लेन देन सम्बन्धि कक्ष उत्तर दिशा में रखें।
    • कॉनफ्रेन्स रूम पूर्व दिशा में अत्यधिक शुभ रहता है।


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