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विवादों के बवंडर का नाम था अब्दुल रहमान अंतुले, 85 की उम्र में भी अपनाए थे बागी तेवर

New Delhi: उम्र के आखिरी पड़ाव में भी बगावत का बिगुल फूंकने वाले महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री अब्दुल रहमान अंतुले का आज जन्म दिन है।

विवाद और अब्दुल रहमान अंतुले का चोली-दामन का साथ रहा। 9 फरवरी 1929 को जन्मे अंतुले कांग्रेस के दिग्गज नेताओं में शामिल थे। साल 2009 के लोकसभा चुनावों में उन्होंने मोदी सरकार के मंत्री अंनत गीते को महाराष्ट्र के रायगढ़ लोकसभा सीट से हराया था।

साल 2014 में हुए लोकसभा चुनावों में उनकी तबियत ठीक नहीं थी, फिर भी उन्होंने एनसीपी अध्यक्ष सुनील तटकरे के खिलाफ बगावत का बिगुल फूंक दिया था। कांग्रेस नेताओं के लाख मनाने पर भी वह न माने। उस चुनाव में शेतकरी कामगार पक्ष के उम्मीदवार को समर्थन देने की घोषणा कर दी। हालांकि इस लड़ाई में बाजी शिवसेना मार ले गई मगर अंतुले ने साबित कर दिया, उन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उनका खतरे की चिंता किए बिना मनमर्जी से काम करने का स्वभाव था। ऊपर से तल्ख बयान देने की आदत से ऐसा लगाता था कि विवादों से उनके फेफड़ों को सांस मिलती थी।

इग्लैंड से बैरिस्टर की पढ़ाई करके लौटे और राजनीति में उतरकर इसी रंग में रंगकर रह गए। 1962 से 1976 तक महाराष्ट्र विधानसभा के सदस्य रहे और राज्यमंत्री भी। विपक्ष, खासतौर पर शेतकरी कामगार पक्ष नेता दि.बा. पाटील ने मंत्री पर सरकारी कार से स्मगलिंग का आरोप लगाया। लेकिन इससे अंतुले के राजनीतिक कद पर कोई असर नहीं पड़ा। वह दिल्ली शिफ्ट हो गए। 1976 से 1980 के बीच इंदिरा गांधी के बेहद खराब काल में राज्यसभा सदस्य रहे और कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव भी। इसी का नतीजा था कि वो जून 1980 में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बनाए गए। संजय गांधी निराधार योजना शुरू की और विधायकों के पेंशन की भी व्यवस्था की।

उनके बनाए इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान और प्रतिभा प्रतिष्ठान विवाद में फंसे रहे। विपक्ष ने आरोप लगाया कि बिल्डरों से पैसे लेकर इसमें जमा किए गए थे। सीमेंट की कटौती के काल में बिल्डरों से सीमेंट अलॉट करने के बदले पैसे लिए गए, वह भी बाकायदा 'वाइट' में चेक पेमेंट से। इसको लेकर अखबारों में बहुत कुछ छपा और अंतुले को जाना पड़ा। उन्होंने अपने सबसे बड़े प्रतिस्पर्धि वसंतदादा पाटील की पत्नी शालिनीताई को अपनी कैबिनेट में मंत्री बना दिया। इसके बाद पाटील दंपति में नहीं पटी। इससे पहले भी इंग्लैंड से शिवाजी महाराज की 'भवानी तलवार' लाने को लेकर बावेला मचा था, लेकिन दांव कारगर नहीं हो पाया।

अंतुले तक लोगों का पहुंचना आसान हुआ करता था। वह पहले राज्यसभा और फिर रायगढ़ सीट से दो बार लोकसभा के लिए चुने गए थे। अंतुले के नाम से विवादास्पद बयानों का सिलसिला जारी रहा। एक खास बात यह रही कि अंतुले ने कभी किसी बयान का खंडन नहीं किया। इंदिरा गांधी से निष्ठा की कसम खाने वाले अंतुले की राजीव गांधी से नहीं बनी। बगावत करके रायगड से अपने बूते पर चुनाव लड़े और बुरी तरह परास्त हुए। इस घटना के बाद अंतुले कांग्रेस में तो लौटे, मगर उनकी महिमा खत्म हो चुकी थी। इस सबके बावजूद उनकी बेबाक जुबान पर लगाम नहीं लगी। मुंबई कांग्रेस के एक कार्यक्रम में अंतुले ने 24 वर्ष तक पार्टी के मुंबई अध्यक्ष रहे वरिष्ठ नेता मुरली देवड़ा को नहीं बक्शा। समारोह गुरुदास कामत के अध्यक्ष बनने पर आयोजित किया गया था।

सबसे बड़ा विवाद 2008 के मुंबई हमले के बाद उभरा था। अंतुले ने दावा किया था कि पुलिस अफसर हेमंत करकरे आतंकी हमले में नहीं मारे गए थे, बल्कि मालेगांव धमाकों में हिंदुत्ववादी नेताओं को जेल भेजने की वजह से उन्हें जान गंवानी पड़ी थी। बाद में तो कांग्रेस पार्टी ने उनकी राजनीतिक विरासत संभाल रहे उनके दामाद मुश्ताक अंतुले की दावेदारी भी नहीं मानी। अंतुले नाम के इस राजनीतिक बवंडर ने जाते-जाते भी भारतीय राजनीति में अपनी छाप छोड़ी।



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