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Padman Review: अक्षय की दमदार एक्टिंग जीत लेगी दिल, टूटेंगे महिलाओं की माहवारी से जुड़े टैबूज

New Delhi: बॉलीवुड अभिनेता अक्षय कुमार की महिलाओं पर केंद्रित फिल्मों में अब पैडमैन रिलीज हो गई है।

महिलाओं के लिए शौचायलय की समस्या को उजागर करती टॉयलेट एक प्रेमकथा के बाद पैडमैन महिलाओं की माहवारी की परेशानी को दर्शाएगी।

अक्षय कुमार की फिल्मों में अब 'औरतों वाली बात' को सामाजिक रूप से व्यापक स्तर पर देखा जा रहा है। इसलिए मेंस्ट्रुअल हाइजीन के मुद्दे को लेकर फिल्म बनी है। पैडमैन में अक्षय कुमार एक सच्ची कहानी को पर्दे पर दर्शा रहे हैं। 

अरुणाचलम मुरुगनंथम की सच्ची कहानी पर आधारित फिल्म पैडमैन के जरिए निर्देशक आर. बाल्की और अक्षय कुमार ने मेंस्ट्रुअल हाइजीन के प्रति लोगों को जागरूक करने की दमदार पहल की है। 

पैडमैन में अक्षय कुमार एक सच्ची कहानी को पर्दे पर दर्शा रहे हैं

जब मुरुगनंथम अपनी महिलाओं की पीरियड्स की समस्या का निवारण करने के लिए खुद सैनिटरी पैड बनाने की ठान लेता है। मगर वह जिस दौर में यह निर्णय लेता है, वह है करीब 16 साल पहले यानी 2001 की बात, जब टीवी पर किसी सैनिटरी पैड के विज्ञापन के आने पर या तो चैनल बदल दिया जाता था या पूछे जाने पर उसे साबुन या किसी और ऐड का नाम दिया जाता था। ग्रामीण इलाकों में तो इसे गंदा और अपवित्र मानकर इसके बारे में बात करना भी पाप समझा जाता था। 

कहानी है दमदार- 

फिल्म में लक्ष्मीकांत चौहान का किरदार निभा रहे अक्षय कुमार को जब पता चलता है कि उसकी पत्नी गायत्री यानि राधिका आप्टे पीरियड्स में किस तरह का जीवन जीती है तो वह परेशान हो जाता है। शादी करने के बाद पता चलता है कि माहवारी के दौरान उसकी पत्नी न केवल गंदे कपड़े का इस्तेमाल करती है बल्कि उसे अछूत कन्या की तरह 5 दिन घर से बाहर रहना पड़ता है। उसे जब डॉक्टर से पता चलता है कि उन दिनों में महिलाएं गंदे कपड़े, राख, छाल आदि का इस्तेमाल करके कई जानलेवा और खतरनाक रोगों को दावत देती हैं तो वह खुद सैनिटरी पैड बनाने की कवायद में जुट जाता है। 


इस सिलसिले में उसे पहले अपनी पत्नी, बहन, मां के तिरस्कार का सामना करना पड़ता है और फिर गांववाले और समाज उसे एक तरह से बहिष्कृत कर देते हैं, मगर जितना वह जलील होता जाता है उतनी ही उसकी सैनिटरी पैड बनाने की जिद पक्की होती जाती है। परिवार उसे छोड़ देता है, मगर वह अपनी धुन नहीं छोड़ता और आगे इस सफर में उसकी जिद को सच में बदलने के लिए दिल्ली की एमबीए स्टूडेंट परी (सोनम कपूर) उसका साथ देती है। 
 

राधिका आप्टे ने किरदार में डाली जान

'चीनी कम', 'पा', और 'की ऐंड का' जैसी फिल्में देने वाले निर्देशक आर. बाल्की ने पूरी कोशिश की है कि वह मेंस्ट्रुअल हाइजीन के मुद्दे को हर तरह से भुना लें। इसमें कोई दो राय नहीं कि मासिक धर्म को लेकर समाज में जितने भी टैबू हैं उनसे पार पाने के लिए यह आज के दौर की सबसे जरूरी फिल्म है, मगर कई जगहों पर बाल्की भावनाओं में बहकर फिल्म को उपदेशात्मक बना बैठे हैं। सैनिटरी पैड को लेकर फैलाई जानेवाली जागरूकता की कहानी कई जगहों पर खिंची हुई लगती है। हालांकि बाल्की ने उसे चुटीले संवादों और लाइट कॉमिक दृश्यों के बलबूते पर संतुलित करने की कोशिश जरूर की है। फिल्म का दूसरा भाग पहले भाग की तुलना में ज्यादा मजबूत है। बाल्की ने दक्षिण के बजाय मध्यप्रदेश का बैकड्रॉप रखा जो कहानी को दिलचस्प बनाता है। 

अक्षय की दमदार एक्टिंग पर टिकी है फिल्म

अक्षय कुमार फिल्म का सबसे मजबूत पहलू हैं। उन्होंने पैडमैन के किरदार के हर रंग को दिल से जिया है। एक अदाकार के रूप में वह फिल्म में हर तरह से स्वछंद नजर आते हैं और अपने रोल में दर्शकों को निश्चिंत कर ले जाते हैं कि परिवार और समाज द्वारा हीनता का शिकार बनाए जाने के बावजूद वह सैनिटरी पैड क्यों बनाना चाहते हैं?

राधिका आप्टे आज के दौर की नैचरल अभिनेत्रियों में से एक हैं और उन्होंने अपने रोल को सहजता से अंजाम दिया है। परी के रूप में सोनम कपूर कहानी ही नहीं बल्कि फिल्म में भी राहत का काम करती हैं। फिल्म की सपॉर्टिंग कास्ट भी मजबूत है। फिल्म में महानायक अमिताभ बच्चन की एंट्री प्रभाव छोड़ जाती है। अमित त्रिवेदी के संगीत में 'पैडमैन पैडमैन', 'हूबहू', 'आज से मेरा हो गया' जैसे गाने फिल्म की रिलीज से पहले ही हिट हो चुके हैं। 

परि के किरदार में सोनम सहज लगती हैं

देश में महिलाओं की समस्या को लेकर जुड़े अंधविश्वासों को जानने के लिए यह फिल्म देखी जानी चाहिए। वहं सुपरस्टार अक्षय कुमार की ऐक्टिंग के लिए यह फिल्म देखी जा सकती है।



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