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दुनिया की लगभग एक चौथाई जनसंख्या खुले में शोच करने को मजबूर, भारत में सबसे ज्यादा लोग

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New Delhi : 

बेशक पृथ्वी पर लोग टेक्नोलॉजी में कितना भी आगे चले गए हों लेकिन आज भी दुनिया अरबों लोग खुले में शोच करने पर मजबूर हैं। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार विश्व की अनुमानि ढाई अरब आबादी को पर्याप्त स्वच्छता मयस्सर नहीं है और दुनिया की एक अरब आबादी खुले में शोच को मजबूर है जिनमे आधे से अधिक लोग भारत में रहते हैं। इसी के चलते संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 24 जुलाई, 2013 को प्रतिवर्ष 19 नवंबर को ‘विश्व शौचालय दिवस’ मनाने का फैसला किया था।

इन सबके चलते बीमारियां उत्पन्न होने के साथ साथ पर्यावर दूषित होता इसलिए सरकार इस समस्या से उबरने के लिए स्वच्छ भारत अभियान चला रही है, लेकिन एक सर्वे के अनुसार खुले में सौच जाना एक तरह की मानसिकता दर्शाता है। इसके मुताबिक सार्वजनिक शौचालयोँ में नियमित रूप से जाने वाले तकरीबन आधे लोगो और खुले में शौच जाने वाले इतने ही लोगो का कहना है कि यह सुविधाजनक उपाया है। ऐसे में स्वच्छ भारत के लिए सोच में बदलाव की जरुर दिखती है। दुनिया में हर तीन में से एक महिला को सुरक्षित शौचालय की सुविधा उपलब्ध नहीं है। खुले में शौच के लिए विवस होने का कारण महिलाओं और बालिकाओं की निजता सम्मान पर बुरा प्रभाव पड़ता है और उनके खिलाफ हिंसा तथा बलात्कार जैसी घटनाओं की आशंका बनी रहती है।

विश्व शौचालय दिवस (World Toilet Day) का इतिहास :-
2001 में विश्व शौचालय संगठन ने विश्व शौचालय दिवस की शुरुआत की। विश्व शौचालय संगठन के निर्माता जैक सिम और सिंगापुर के रेस्ट्रूम एसोसिएशन को एहसास हुआ कि शौचालय के मुद्दे पर एक अंतरराष्ट्रीय दिन होना चाहिए और इसलिए वे विश्व शौचालय दिवस बनाने के विचार के साथ आगे बढ़े ताकि यह दुनिया भर के लोगों के लिए स्वच्छता के मुद्दों की याद दिलाता रहे। विश्व शौचालय दिवस की स्थापना के बाद से दुनिया में परिवर्तन करने के लिए व्यवसायों, सरकारों और कई अन्य समूहों ने इसको बढ़ावा देने में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इस दिन ने कई पाबंदियों को भी तोड़ा है जो शौचालय के विषय पर चर्चा करने और सुरक्षित और बेहतर समाधान बनाने के लिए हैं।

विश्व शौचालय दिवस कई स्वच्छता मुद्दों के प्रति जनता का ध्यान दिलाने और उन मुद्दों को हल करने का प्रयास करता है। हालांकि पर्याप्त स्वच्छता तक पहुंच को मानव अधिकार के रूप में घोषित किया गया है लेकिन दुनिया में हर तीन लोगों में से एक के पास शौचालय को लेकर कोई भी स्पष्ट दृष्टिकोण नहीं है। इसके अलावा जिन लोगों की पहुंच असुरक्षित और अशुद्ध शौचालय तक है उन्हें कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है जिनमें टाइफाइड, हैजा, डायरिया और हेपेटाइटिस जैसी कई बीमारियां शामिल हैं। खुले में शौचालय जाने पर बच्चों और महिलाओं पर होने वाले यौन उत्पीड़न के केसों में वृद्धि होती है। विश्व शौचालय दिवस का अंतिम उद्देश्य सभी व्यक्ति को अपनी प्राथमिक जरूरतों का ख्याल रखने के लिए सुरक्षा के डर के बिना अनुमति देना है।

जैक सिम ने कहा था- जिसके बारे में हम चर्चा नहीं कर सकते उसका हम सुधार नहीं कर सकते। विश्व शौचालय दिवस स्वच्छता के महत्व पर जागरूकता फैलाने का एक बहुमूल्य अवसर प्रदान करता है और हर जगह को सुधारने तथा हर साल वहां की उचित स्वच्छता को बनाए रखने के उद्देश्य की गति को प्रोत्साहित करता है। यह दिवस इस बात को सुनिश्चित करता है कि सभी की सुरक्षित शौचालय और स्वच्छता तक पहुंच होनी चाहिए। सभी लोगों को विश्व शौचालय दिवस का उद्देश्य समझाना एक अंतर्राष्ट्रीय विकास प्राथमिकता है और जो शौचालय की सुविधा नहीं रखते हैं उनके लिए स्वच्छता संकट को रोकना तत्काल आवश्यकता है। यह दिवस लोगों को इस संकट को खत्म करने के लिए आवश्यक कदम उठाने हेतु भी प्रेरित करता है।

भारत में क्या है इसकी स्थिति :-
भारत की 2011 की जनगणना के अनुसार गांवो में 67 प्रतिशत और शहरो में 13 प्रतिशत परिवार खुले में शौच करते हैं। गैरसरकारी संगठन रिसर्च इंस्टीटीयूट ऑफ कंपेशनेट इकोनामिक्स के मुताबिक देश के 40 प्रतिशत जिन घरो में शौचालय है इसके बावजूद उनमे से प्रत्येक घर से एक सदस्य नियमित रूप से खुले में शौच के लिए जाता है।

2001-11 के दौरान बने घर और शौचालयों की संख्या
5.47 करोड़ देश भर में घरो की संख्या
5.39 करोड़ शौचालय सुविधा वाले घर
इसमेँ सार्वजनिक शौचालय, स्कूल शौचालय के साथ पहले से ही मौजूद निर्माण को शामिल किया गया है।

24.66 करोड़ देश भर में घरो की संख्या केवल 2011 की जनगणना अनुसार
12.38 करोड़ शौचालय सुविधा वाले घर केवल 2011 की जनगणना अनुसार
12.28 करोड़ घरो में शौचालय नहीं केवल 2011 की जनगणना अनुसार



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