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स्थायी शांति की तलाश में कश्मीरी युवाओं पर होगा खास ध्यान

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New Delhi: कश्मीर में स्थायी शांति की तलाश में आइबी के पूर्व निदेशक दिनेश्वर शर्मा वैसे तो सभी पक्षों से बातचीत करेंगे, लेकिन उनका विशेष फोकस कश्मीरी युवाओं पर होगा।

दरअसल कश्मीर में युवाओं की बड़ी तादाद ऐसी है, जो हुर्रियत या किसी आतंकी संगठन के सीधे समर्थक नहीं हैं, लेकिन सरकार विरोधी प्रदर्शनों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं। वहीं हुर्रियत नेताओं से बातचीत का दरवाजा खुला होने के बाद भी उनके खिलाफ आतंकी फंडिंग की एनआइए की जांच जारी रहेगी। सरकार उन्हें जांच से राहत देने के मूड में नहीं है।

कश्मीर से जुड़े गृहमंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि पत्थरबाजी और हिंसक प्रदर्शनों के पीछे भले ही हुर्रियत नेताओं और सीमा पार से आने वाली फंडिंग का हाथ रहा हो, लेकिन इनमें बड़ी संख्या ऐसे युवाओं की रही है, जो मौजूदा हालात से खिन्न होकर इन प्रदर्शनों में शामिल होते रहे हैं। ऐसे युवाओं का हुर्रियत नेताओं और आतंकी संगठनों से कोई लेना-देना नहीं है। 2010 में बातचीत के लिए गए केंद्रीय प्रतिनिधिमंडल ने भी अपनी रिपोर्ट में इन युवाओं को मुख्यधारा से जोड़ने पर जोर दिया था। सरकार ने इसके बाद निजी कंपनियों में कश्मीरी युवाओं को रोजगार उपलब्ध कराने के लिए उड़ान योजना शुरू की थी, जिसे मोदी सरकार भी आगे बढ़ा रही है।

जाहिर है कश्मीरी युवाओं तक पहुंचने के लिए दिनेश्वर शर्मा आने वाले दिनों में घाटी में कालेजों और विश्वविद्यालयों का दौरा कर छात्रों से सीधे संवाद कायम करने की कोशिश भी कर सकते हैं। पिछले महीने गृहमंत्री राजनाथ सिंह चार दिन के कश्मीर दौरे के समय भी बड़ी संख्या में युवा और छात्र संगठनों के प्रतिनिधिमंडल से मिले थे।

लेकिन गृहमंत्री के प्रोटोकाल के कारण बातचीत का दायरा सीमित था। दिनेश्वर शर्मा के सामने ऐसा कोई प्रोटोकाल नहीं होगा। माना जा रहा है कश्मीर में लंबे समय तक काम कर चुके दिनेश्वर शर्मा के लिए युवाओं से संवाद कायम करना मुश्किल नहीं होगा।

कश्मीर समस्या का समाधान बातचीत के जरिये ढूंढने की ताजा कोशिश इस मायने में अलग है कि इसमें अलगाववादियों को ज्यादा तवज्जो नहीं दी जाएगी। उनसे बातचीत का न्यौता जरूर दिया जाएगा, लेकिन बातचीत भारतीय संविधान के दायरे में होने की शर्त भी होगी, जिसे हुर्रियत नेता हमेशा ठुकराते रहे हैं।

2010 में राधा कुमार, दिलीप पडगांवकर और एसके अंसारी की टीम का पूरा जोर अलगाववादी नेताओं की मांगों को समझने की थी और उनकी रिपोर्ट में इसे प्रमुखता भी दी गई थी। यही कारण है कि संप्रग सरकार को उनकी रिपोर्ट को ठंडे बस्ते में डालना पड़ा। इस बार सरकार ने हुर्रियत नेताओं से बातचीत का फैसला दिनेश्वर शर्मा पर छोड़ दिया है। लेकिन साथ ही गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने यह साफ कर दिया है कि हुर्रियत नेताओं के खिलाफ आतंकी फंडिंग की एनआइए जांच रहेगी।



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