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ये है पानी में तैरने वाला दुनिया का पहला रॉकेट, इसकी रफ्तार ने उड़ा दिए थे दुनिया के होश

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 New Delhi: आज दुनिया भर में लग्जरी क्रूज और यॉट की भरमार है। वहीं, अमीर लोग तो वैकेशन के लिए एक से बढ़कर एक आलीशान यॉट बनवाने लगे हैं। लेकिन, आपको जानकर आश्चर्य होगा कि 1960 के दशक में सोवियत यूनियन (अब रूस) ने ऐसे सैकड़ों यॉट बना लिए थे, लेकिन अपनी आर्मी के लिए। यह शीत युद्ध का दौर था और अमेरिका-रूस के बीच आधुनिक वेपंस की होड़ मची हुई थी। इसी दौरान रूस ने इसका निर्माण करवाया, जिसकी रफ्तार उस समय सबसे ज्यादा थी। 

‘रिवर रॉकेट’ मिला नाम : इसकी डिजाइन सोरमोव्सकी जिले के निजनी नोवगोराद स्थित क्रासनोए सोरमोव फैक्ट्री में तैयार की गई। निर्माण सोवियत यूनियन की नेवी और रेड आर्मी की देखरेख में हुआ। इसकी सबसे बड़ी खासियत रफ्तार थी। हाइड्रोफॉइल टेक्नोलॉजी से लैस इस यॉट की स्पीड 150 किमी प्रतिघंटा थी, जो उस समय की सबसे ज्यादा स्पीड थी।

यह वह दौर था, सोवियत यूनियन अपनी समुद्री ताकत बढ़ाने के लिए आधुनिक सबमरींस का तेजी से निर्माण कर रहा था। इसी दौरान कंपनी ने दुनिया की सबसे तेज रफ्तार वाले याट बनाने का विचार किया, जो नेवी के लिए कारगर हो। इसके अलावा सोवियत यूनियन, अमेरिका और उसके साथी देशों को इस टेक्नोलॉजी के द्वारा अपनी ताकत भी दिखाना चाहता था।

  25 अगस्त, 1958 में वोल्गा नदी में इसकी टेस्टिंग की गई तो उस सयम इस वेसल ने सात घंटों में ही 420 किमी की दूरी तय कर ली थी। इसके बाद से ही इसने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा। सफल टेस्टिंग के बाद सोवियत यूनियन ने इसे ‘रिवर रॉकेट’ का नाम दिया।

पहली बार में 30 जवानों ने किया था सफर : पानी पर दौड़ने वाले सभी वेसल में यह सबसे रोचक थी। पहले वेसल में 4 क्रू मेंबर्स के अलावा 30 जवानों के बैठने की जगह थी। इसके बाद इनका निर्माण तेजी से होने लगा। सोवियत यूनियन का टार्गेट ऐसी ही करीब 1000 वेसल बनाने का था। हालांकि 1992 में सोवियत यूनियन के विघटन के बाद से इनका निर्माण रुक गया और अब इनकी जगह दूसरे वेसल ने ली है।



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