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रहस्यमय: स्त्रियों से दूर रहने वाले हनुमान को इस मंदिर में स्त्री रूप में पूजा जाता है

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New Delhi: पवन पुत्र व राम भक्त हनुमान को युगों से लोग पूजते आ रहे हैं। उन्हें बाल ब्रह्मचारी भी कहा जाता है जिस कारण स्त्रियों को उनकी किसी भी मूर्ति को छूने से मना किया गया है। वे देवता रूप में विभिन्न मंदिरों में पूजे जाते हैं लेकिन एक ऐसा मंदिर भी है जहां पर हनुमान को पुरुष नहीं बल्कि स्त्री के रूप में पूजा जाता है।

अद्भुत है यह मंदिर जहां हनुमान को स्त्री स्वरूप में देखा जाता है। छत्तीसगड़ के बिलासपुर में प्रसिद्ध यह मंदिर एक प्रचीन मंदिर है जहां पर हनुमान के स्त्री के रूप के पीछे छिपी दस हजार साल पुरानी एक कथा प्रचलित है।

कहां है ये मंदिर

यह मंदिर छत्तीसगड़ के बिलासपुर जिले से 25 कि। मी। दूर रतनपुर में है। कहा जाता है कि यह एक महत्वपूर्ण जगह है जो काफी महान है। इतना ही नहीं, इस नगरी को महामाया नगरी भी कहा जाता है क्योंकि यहां पर मां महामाया देवी मंदिर और गिरजाबंध में स्थित हनुमानजी का मंदिर है।

इस छोटी सी नगरी में स्थित हनुमान जी का यह विश्व में इकलौता ऐसा मंदिर है जहां हनुमान का नारी रूप में पूजन किया जाता है। स्थानीय लोगों का कहना है कि इस मंदिर में आने वाला हर एक भक्त हजारों मन्नतें लेकर आता है और इस स्थान से वो कभी भी निराश होकर नहीं लौटता। लोगों की श्रद्धा व भावना से भरपूर इस मंदिर में हर समय लोगों का आना-जाना लगा रहता है।


लेकिन क्यों होती है स्त्री रूप में पूजा?

कहा जाता है कि हनुमान का स्त्री रूप में यहां पूजा जाना एक कथा का परिणाम है जो हजारों वर्षों पुरानी है। तकरीबन दस हजार वर्ष पुरानी बात है जब एक दिन रतनपुर के राजा पृथ्वी देवजू जिन्हें एक शारीरिक कोढ़ था वे इस रोग के कारण काफी उदास हो गए। इस रोग की वजह से वे ना तो कोई काम कर सकते थे और ना ही जिंदगी का आनंद उठा सकते थे। उदासी में बैठे-बैठे राजा को नींद आ गई।

नींद के दौरान उन्होंने एक सपना देखा जिसमें उन्हें एक ऐसे रूप के दर्शन हुए जो वास्तव में है ही नहीं। उन्होंने संकटमोचन हनुमान को देखा लेकिन स्त्री रूप में। वे लंगूर की भांति दिख रहे थे लेकिन पूंछ नहीं थी, उनके एक हाथ में लड्डू से भरी थाली थी और दूसरे हाथ में राम मुद्रा। कानों में भव्य कुंडल व माथे पर सुंदर मुकुट माला भी थी। उनका यह दृश्य देख राजा अचंभित हो उठा।


इसीलिए बना ऐसा मंदिर

सपने में हनुमान के स्त्री रूप ने राजा से एक बात कही। हनुमान ने राजा से कहा कि “हे राजन् मैं तेरी भक्ति से अत्यंत प्रसन्न हूं और मैं तुम्हारा कष्ट अवश्य दूर करूंगा। तू एक मंदिर का निर्माण करवा और उसमें मुझे बैठा। मंदिर के पीछे एक तालाब भी खुदवा जिसमें मेरी विधिवत पूजा करते हुए तू स्नान करना। इससे तुम्हारे शरीर का यह कोढ़ रोग आवश्य दूर हो जाएगा।”

नींद खुलते आते ही राजा ने गिरजाबन्ध में ठीक वैसा ही मंदिर बनवाना शुरु कर दिया जैसा कि हनुमान ने उसके सपने में बताया था लेकिन मंदिर पूरा होते ही राजा को उसमें रखने के लिए मूर्ति कहां से लाई जाए यह चिंता सताने लगी। इसका उपाय भी संकटमोचन हनुमान ने दोबारा से राजा के स्वप्न में आकर दिया।

एक रात हनुमान राजा के सपने में फिर से आए और कहा कि “मां महामाया के कुण्ड में मेरी मूर्ति रखी हुई है। हे राजन् तू उसी मूर्ति को यहां लाकर मंदिर में स्थापित करवा।” अगले दिन ही राजा अपने परिजनों और पुरोहितों के साथ देवी महामाया के मंदिर में गए लेकिन बहुत ढूंढने पर भी उन्हें मूर्ति नहीं मिली। राजा काफी बेचेन हो गया।

हताश राजा इसी चिंता में विश्राम करने के लिए अपने कक्ष में आया और सो गया। नींद आते ही हनुमान फिर से राजा के सपने में आए और बोले “राजन तू हताश न हो मैं वहीं हूं तूने ठीक से तलाश नहीं किया। उस मंदिर में जहां लोग स्नान करते हैं उसी में मेरी मूर्ति है।”

जब राजा ने वह मूर्ति खोजे तो यह वही मूर्ति थी जिसे राजा ने अपने स्वप्न में देखा था। मूर्ति को पाते ही राजा प्रसन्न हो उठा और जल्द से जल्द उसकी स्थापना मंदिर में करवाई। हनुमान के निर्देश अनुसार इस मंदिर के पीछे तालाब भी खुदवाया गया। प्रसन्नता भरे राजा ने हनुमान से वरदान भी मांगा था कि जो भी यहां दर्शन को आए उसकी हर इच्छा अवश्य पूरी हो।

एक अद्भुत तेज है इस मूर्ति में

राजा को मिली इस मूर्ति में अनेक विशेषताएं हैं। इसका मुख दक्षिण की ओर है और साथ ही मूर्ति में पाताल लोक़ का चित्रण भी है। मूर्ति में हनुमान को रावण के पुत्र अहिरावण का संहार करते हुए दर्शाया गया है। यहां हनुमान के बाएं पैर के नीचे अहिरावण और दाएं पैर के नीचे कसाई दबा हुआ है। हनुमान के कंधों पर भगवान राम और लक्ष्मण की झलक है। उनके एक हाथ में माला और दूसरे हाथ में लड्डू से भरी थाली है। कहा जाता है कि छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से लगभग 84 किलोमीटर दूर रमई पाट में भी एक ऐसी ही मूर्ति स्थापित है।



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