Get Even More Visitors To Your Blog, Upgrade To A Business Listing >>

वो अंग्रेज, जो आजादी के बाद भी हमारा गवर्नर जनरल रहा, जिसे हिंदुस्तानी सबसे ज्यादा प्यार करते थे

New Delhi:

लॉर्ड लुइस माउंटबेटन जो ना सिर्फ भारत के पहले गवर्नर जनरल बने, बल्कि भारत में आज भी सबसे ज्यादा चर्चित अंग्रेज हैं, जानिए, उनकी दिलचस्प कहानी

लॉर्ड लुइस माउंटबेटन एक ब्रिटिश राजनीतिज्ञ, नौसैनिक अधिकारी और राजकुमार फिलिप के मामा थे । 25 जून 1900 को लॉर्ड माउंटबेटन का जन्म हिज सीरीन हाइनेस बैटनबर्ग के राजकुमार लुइस के रूप में हुआ, हालांकि उनके जर्मन शैलियां और खिताब 1917 में खत्म कर दिए गए थे। वह बैटनबर्ग के राजकुमार लुइस और उनकी पत्नी हीसे और राईन की राजकुमारी विक्टोरिया के दूसरे पुत्र और सबसे छोटी संतान थे। लॉर्ड माउंटबेटन भारत के पहले गवर्नर जनरल थे । ऐसा माना जाता है कि माउंटबेटन की पत्नी एडविना के नेहरु के साथ अंतरंग संबंध थे ।  

लॉर्ड माउंटबेटन ने पहले विश्व युद्ध के समय शाही नौसेना में एक मिडशिपमैन के रूप में सेवा दी। सेवा के बाद वह दो सत्रों के लिए कैम्ब्रिज के क्राईस्ट्स कॉलेज में रहे, जहां उन्होंने पूर्व सैनिकों के लिए विशेष रूप से डिजाइन एक पाठ्यक्रम में इंजीनियरिंग की पढ़ाई की । कैम्ब्रिज में अपने समय के दौरान, माउंटबेटन को क्राईस्ट्स कॉलेज के एक सदस्य के रूप में एक व्यस्त सामाजिक जीवन और पढ़ाई को संतुलित करना पड़ता था। 1926 में, माउंटबेटन को एडमिरल सर रोजर कीज के कमान वाले भूमध्य बेड़े के सहायक फ्लीट वायरलेस और सिग्नल अधिकारी के रूप में नियुक्त किया गया। लॉर्ड माउंटबेटन 1929 में सिग्नल स्कूल के सीनियर वायरलेस ट्रेनर नियुक्त किए गए । 1931 में, उन्हें फिर आर्मी में सेवा देने के लिए बुलाया गया, जहां उन्हें भूमध्य बेड़े का फ्लीट वायरलेस अधिकारी नियुक्त किया गया। यही वह समय था जब उन्होंने माल्टा में एक सिग्नल स्कूल की स्थापना की और बेड़े के सभी रेडियो ऑपरेटरों के साथ उनकी जान पहचान हई ।

माउंटबेटन का विवाह विल्फ्रेड विलियम एश्ले की बेटी एड्विना सिंथिया एश्ले के साथ 18 जुलाई 1922 में हुआ । वह एदवार्डियन मैगनेट सर अर्नस्ट कैसल की सबसे प्यारी पोती थी। उनकी दो बेटियां थीं कि एक बर्मा की माउंटबेटन काउंटेस और दूसरी लेडी पामेला कारमेन लुईस । माउंटबेटन कांग्रेसी नेता नेहरु के करीबी थे, उन्हें उनकी उदारपंथी सोच बहुत पसंद थी। वह मुस्लिम नेता जिन्ना को लेकर अलग विचार रखते थे, लेकिन वह जिन्ना की ताकत भली भांति पहचानते थे। मुसलमानों के संगठित भारत में प्रतिनिधित्व के लिए जिन्ना के विवादों से नेहरु और ब्रिटिश थक चुके थे, उन्होंने सोचा की बेहतर होगा अगर मुसलमानों को अलग राष्ट्र दिया जाए ।

भारतीय नेताओं में गांधी ने बलपूर्वक एक एकजुट भारत के सपने का समर्थन किया और कुछ समय तक लोगों को इसके लिए एकजुट किया, लेकिन जब माउंटबेटन ने जल्द स्वतंत्रता प्राप्त करने की सम्भावना पर मुहर लगायी तब लोगों के मत बदल गए। माउंटबेटन के फैसले को देखते हुए, मुस्लिम लीग से किसी भी तरह के समझौते में नेहरु और पटेल की असफलता और जिन्ना की जिद्द के चलते सभी नेताओं ने जिन्ना के विभाजन के प्लान को मान लिया । जिसने माउंटबेटन के काम को आसान बना दिया । माउंटबेटन ने उन भारतीय राजकुमारों के साथ मजबूत रिश्ता भी बनाया, जो भारत के उन हिस्सों पर राज कर रहे थे जो सीधे ब्रिटिश शासन के अंतर्गत नहीं आते थे। इतिहासकार रामचंद्र गुहा अपनी पुस्तक 'इंडिया आफ्टर गांधी' में कहते हैं कि माउंटबेटन का हस्तक्षेप उन राजकुमारों के एक बड़े बहुमत को भारतीय संघ में शामिल होने का विकल्प अपनाने का लालच दिखाने में सफल रहा, इसलिए विभिन्न रजवाड़ों की एकता को उनके योगदान के सकारात्मक पहलू के रूप में देखा जा सकता है।

जब भारत और पाकिस्तान ने 14 से 15 अगस्त 1947 की रात स्वतंत्रता प्राप्त की, तो माउंटबेटन जून 1948 तक भारत के पहले गवर्नर जनरल के रूप में कार्य करते हुए दस महीने तक नई दिल्ली में रहे । भारत की स्वतंत्रता में अपनी खुद की भूमिका के बावजूद उनका रिकॉर्ड बहुत मिला हुआ समझा जाता है। एक बात यह है कि उन्होंने आजादी की प्रक्रिया में गलत और बिना सोचे-समझे काम किया और ऐसा उन्होंने इसलिए किया क्योंकि उन्हें यह पता लग गया था कि इसमें जान-माल का बड़ा नुकसाना होगा और वे नहीं चाहते थे कि यह सब अंग्रेजों के सामने हो । माउंटबेटन पंजाब और बंगाल में दंगें होने का कारण बन गए।

 ऐसा माना जाता है कि भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के साथ माउंटबेटन की पत्नी एडविना के शारीरिक संबंध थे। गर्मियों के दौरान, वे अक्सर प्रधानमंत्री निवास आया जाया करती थीं । एड्विना ने एक लेटर में कहा है कि हमने जो भी किया है या महसूस किया है । उसका प्रभाव तुम पर, तुम्हारे काम या मैं या मेरे काम पर नहीं पड़ना चाहिए । इससे सब कुछ खराब हो जाएगा । माउंटबेटन की दोनों बेटियों ने खुलकर स्वीकार किया है कि उनकी मां एक उग्र स्वभाव की महिला थी और कभी भी अपने पति का पूरा समर्थन नहीं करती थीं, क्योंकि वह उनके हाई प्रोफ़ाइल से ईर्ष्या करती थी और कुछ सामान्य कारण भी थे। लेडी माउंटबेटन की मृत्यु नॉर्थ बोर्नियो के एक अस्पताल में 21 फरवरी 1960 को हुई, तब उनकी उम्र 58 साल थीं । चूंकि माउंटबेटन का कोई बेटा नहीं था, इसलिए उन्होंने अपनी सारी संपत्तियों को अपनी दोनों बेटियों के नाम कर दिया । 

लॉर्ड माउंटबेटन आमतौर पर छुट्टियां मनाने मुलघमोर, काउंटी सिल्गो के अपने गर्मियों के घर जाते थे, यह आयरलैंड के उत्तरी समुद्री तट बुंड्रोन, काउंटी डोनेगल और सिल्गो, काउंटी सिल्गो के बीच बसा एक छोटा समुद्रतटीय गांव है। गार्डा सिओचना के सुरक्षा सलाह और चेतावनियों के बावजूद, 27 अगस्त 1979 को, माउंटबेटन एक तीस फुट लकड़ी की नाव, शेडो वी में लॉबस्टर के शिकार और टुना मछली पकड़ने गए, जब माउंटबेटन नाव पर डोनेगल बे जा रहे थे, उसी समय एक अज्ञात व्यक्ति ने किनारे से बम विस्फोट कर दिया । मैकमोहन को लॉगफ़ोर्ड और ग्रेनार्ड के बीच गार्डा नाके पर पहले ही गिरफ्तार किया गया था। माउंटबेटन, उस समय 79 वर्ष के थे, गंभीर रूप से घायल हो गए थे और विस्फ़ोट के तुरंत बाद बेहोश होकर गिर गए और उनकी मौत हो ग



This post first appeared on विराट कोहली ने शहीदों के नाम की जीत, please read the originial post: here

Share the post

वो अंग्रेज, जो आजादी के बाद भी हमारा गवर्नर जनरल रहा, जिसे हिंदुस्तानी सबसे ज्यादा प्यार करते थे

×

Subscribe to विराट कोहली ने शहीदों के नाम की जीत

Get updates delivered right to your inbox!

Thank you for your subscription

×