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व्रत में खाया जाने वाला 'साबूदाना' शाकाहारी नहीं....

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 New Delhi: हिन्दू परिवारों में ‘साबूदाना’ का नाम तब सुनने को मिलता है जब कोई व्रत-त्यौहार आने वाला होता है। क्योंकि यह एक ऐसी खाद्य सामग्री है जिसे व्रत का आहार माना जाता है। व्रत में हर घर में साबूदाना खाना सामान्य बात है।

ये तो आप जानते ही होंगे कि कई जगह इसे प्रसाद के तौर पर भी चढ़ाया जाता है। लेकिन अगर आपको पता चले की आपक व्रत में जो साबूदाना खातें हैं वो शाकाहारी नहीं बल्कि मांसाहरी है तो…? तो क्या करेंगे आप? आपको बता दे कि जो हम बोल रहे हैं वो सोलाह आने् सच है।

आपको पता होगा कि सबूदाना से लड्‍डू, हलवा, खिचड़ी जैसे कई तरह के व्यंजन बनते हैं। इसका उपयोग खास तौर से व्रत-उपवास में किया जाता है। फलों की तुलना में अधिकतर व्रत करने वाले लोग साबूदाना ही खाना पसंद करते हैं। लेकिन अगर एक बार आप साबूदाना बनने की प्रक्रिया को जान जाएंगे तो आपके मन में भी यह सवाल जरूर उठेगा, कि क्या साबूदाना सच में मांसाहारी है या फिर फलाहारी? कहीं साबूदाना खाने से व्रत टूट तो नहीं जाता?

शुरुआती तौर पर देखें तो साबूदाना पूरी तरह से प्राकृतिक वनस्पति है। क्योंकि यह सागो पाम के एक पौधे के तने व जड़ में पाए जाने वाले गूदे से बनाया जाता है। लेकिन बाजार में मिलने वाले साबूदाने के निर्माण की जो पूरी प्रक्रिया होती है उसके बाद ये कहना गलत हो जाता है कि ये वानस्पतिक है। क्योंकि इसकी निर्माण प्रक्रिया में ही साबूदाना मांसाहारी हो जाता है।

खास तौर से वो साबूदाने जो तमिलनाडु की कई बड़ी फैक्ट्र‍ियों से बनके आते हैं। दरअसल तमिलनाडु में बड़े पैमाने पर सागो पाम के पेड़ हैं। इसलिए तमिलनाडु देश में साबूदाना का सबसे बड़ा स्त्रोत माना जाता है और यहीं साबुदाना बनाने की बड़ी-बड़ी फैक्ट्रियां लगी हैं। यही बड़ी-बड़ी फैक्ट्रियां साबूदाना को मांसाहारी बनाती हैं। इसी के साथ आपको बता दे कि फैक्ट्रियों में सागो पाम की जड़ों को इकट्ठा कर, उसके गूदे से साबूदाना बनाया जाता है। इन गूदों से साबूदाना बनाने के लिए इन गूदों को महीनों तक बड़े-बड़े गड्ढों में सड़ाया जाता है। इन गड्ढों की सबसे खास बात यह है कि ये पूरी तरह से खुले होते हैं। गड्ढों के खुले होने के कारण गड्ढ़ों के ऊपर लगी लाइट्स की वजह से इन गड्ढों में कई कीड़े-मकोड़े गिरते रहते हैं और साथ ही इन सड़े हुए गूदे में भी सफेद रंग के सूक्ष्म जीव पैदा होते रहते हैं।

अब इस गूदे को बगैर कीड़े-मकोड़े और सूक्ष्म जीवों से बिना अलग किए, पैरों से मसला जाता है जिसमें सभी सूक्ष्मजीव और कीटाणु भी पूरी तरह से मिल जाते हैं। फिर इन मसले हुए गूदों से मावे की तरह वाला आटा तैयार होता है। अब इसे मशीनों की सहायता से छोटे-छोटे दानों को साबूदाने के रुप में तैयार किया जाता है और फिर पॉलिश किया जाता है। फिर इसे बाजार में पहुंचा दिया जाता है।

  इसके बाद आप इन बाजारों से खरीद कर इन्हें घरों में लाते है और बड़ी श्रद्धा के साथ इनका प्रयोग फलाहार के रूप में करते है हालाकिं साबूदाना शुद्ध है या नहीं इसका कोई दावा हम नहीं कर रहे हैं। लेकिन साबूदाने के बनाने की जो जानकारी उपलब्ध है उसी के हवाले से हमने आपको ये पूरी जानकारी दी है। इस रिपोर्ट को पढ़ने के बाद आप खुद तय करें की साबूदाने का प्रयोग व्रत के दौरान करना है या नहीं।

ऐसा नहीं है कि आप पूरी तरह से हमारी दी हुई खबर पर ही विश्वास करें। बेहतर होगा आप अपने तरीके से खुद इसकी जांच करें और फिर इसका उपयोग करें।



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