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कोर्ट के फैसले के बाद शायरा बानो ने कहा- अब MPhil करके नौकरी करूंगी

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 New Delhi : तीन तलाक के खिलाफ सबसे पहले 38 साल की शायरा बनो ने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। इस रिवाज के तहत कोई भी शख्स बेहद आसान तरीके से अपनी पत्नी को तीन तलाक बोलकर उसे छोड़ सकता था। कोर्ट ने अब इस कुप्रथा को खत्म कर दिया है। कोर्ट के फैसले के बाद शायरा बानो ने कहा कि वो MPhil करके नौकरी करेंगी।

बता दें कि शायरा को उनके पति ने टेलीग्राम से तलाकनामा भेजा था। उनके दो बच्चे हैं, लेकिन वे एक साल से उनका मुंह देखने को तरस रही हैं। फोन पर भी बात नहीं करने दी जाती। 

शायरा बानो ने सुप्रीम कोर्ट में निकाह हालाला की रिवाज को भी चैलेंज किया। इसके तहत मुस्लिम महिलाओं को अपने पहले पति के साथ रहने के लिए दूसरे शख्स से दोबारा शादी करनी होती है। वे मुस्लिमों में बहुविवाह को भी गैर-कानूनी बनाने की मांग कर रही हैं। उत्तराखंड के काशीपुर की रहने वाली शायरा की शादी 2002 में इलाहाबाद के प्रॉपर्टी डीलर रिजवान के साथ हुई थी।  उनके साथ जल्द की परेशानी शुरू हो गई। उन्होंने बताया, "मेरे ससुराल वाले फोर व्हीलर की मांग करने लगे और मेरे पैरेंट्स से चार-पांच लाख रुपए कैश चाहते थे। उनकी माली हालत ऐसी नहीं थी कि यह मांग पूरी कर सकें। मेरी और भी बहनें थीं।" शायरा के दो बच्चे हैं। 13 साल का बेटा और 11 साल की बेटी। शायरा का आरोप है कि शादी के बाद उसे हर दिन पीटा जाता था। रिजवान हर दिन छोटी-छोटी बातों पर झगड़ा करता था। "बहुत ज्यादा बहस करना और झगड़ना उसकी आदम में शामिल था।"

शायरा के मुताबिक, रिजवान से शादी के बाद उसे कई गर्भनिरोध (contraceptives) लेने को कहा गया, जिसकी वजह से वह काफी बीमार हो गई। रिजवान ने उसका छह बार अबॉर्शन करवाया। "पिछले साल अप्रैल में मैं अपने पैरेंट्स के घर लौट आ गई, तो मुझे लौट आने को कहा जाने लगा। अक्टूबर में मुझे टेलीग्राम के जरिए तलाकनामा भेज दिया गया।" वह एक मुफ्ती के पास गई तो उन्होंने कहा कि ट्रेलीग्राम से भेजा गया तलाक जायज है।

शायरा के बच्चे रिजवान के साथ रहे हैं। वह उन्हें देखने के लिए एक साल से तरस रही है। शायरा का कहना है कि यहां तक कि उसे बच्चों से फोन पर भी बात नहीं करने दी जाती। शायरा का कहना है कि वे इस जंग में पीछे हटने वाली नहीं हैं। उनका यह कदम दूसरी महिलाअों के लिए मददगार होगा।

जयपुर की रहने वाली 28 साल की अाफरीन रहमान एमबीए-ग्रेजुएट हैं। मेट्रीमोनियल वेबसाइट की मदद से 2014 में उनकी शादी इंदौर के वकील से हुई।  अाफरीन का कहना है, "लगता था वह बेहद शरीफ और अच्छे परिवार से ताल्लुक रखने वाला शख्स है। ऐसे में पहली ही मुलाकात के बाद मैं उसके साथ शादी को राजी हो गई।" अाफरीन के मुताबिक, उनकी चार बहनें हैं और उनकी शादी के लिए भाई ने 25 लाख का लोन लिया था।

उन्होंने बताया, "शादी के बाद जब उन्हें पहली बार पीटा गया तो वह हैरान रह गईं। इसके बाद यह हर दिन की बात हो गई। यहां तक सास-ससुर भी मुझे पीटते थे। यह सब दहेज के लिए होता था।"

अाफरीन का कहना है कि उन्होंने इन जुल्मों के बारे में अपने मायके वालों को नहीं बताया, क्योंकि उन पर पहले से ही बैंक का कर्ज था। इससे वे और तनाव में आ जाते। आखिरकार, शादी के एक साल बात उसे अगस्त 2015 में पति ने उन्हें घर से निकाल दिया। मायके वालों की गुजारिश पर नौ दिन बाद वापस ले गया, लेकिन अगले ही महीने फिर वापस भेज दिया। अक्टूबर में आफरीन की मां की बस एक्सीडेंट में मौत हो गई तो उनका पति हमदर्दी जताने के लिए कुछ दिन आया, फिर बातचीत बंद कर दी। फोन और सोशल मीडिया पर भी कोई बात नहीं करता। जनवरी में उसे स्पीड पोस्ट से एक लिफाफा आया। खोला तो देखकर दंग रह गई। यह तलाकनामा था। इसमें तलाक की वजह भी नहीं बताई गई थी।  बेसहारा महसूस कर रही आफरीन भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन से जुड़ी। शायरा और दूसरी सताई हुई महिलाओं से इंस्पायर होकर उसने भी कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। ये दोनों भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन की फाउंडर हैं। 2007 में बनाए गए इस एनजीओ से अब तक 15 राज्यों की 30 हजार महिलाएं जुड़ चुकी हैं। 

यह संगठन मस्जिदों और मुंबई की हाजी अली दरगाह में मुस्लिम महिलाओं की एंट्री की मांग करके चर्चा में आया। इस एनजीओ ने पिछले साल देश का पहला मुस्लिम महिलाओं का सर्वे करवाया, जिसमें दावा किया गया कि देश की 92% मुस्लिम महिलाएं तीन तलाक पर रोक चाहती हैं।  एनजीओ ने अपने इस कैम्पेन के पक्ष में चलाई गई ऑनलाइन पिटीशन पर 50 हजार लोगों ने दस्तखत किए थे। इनमें महिला और पुरुष दोनों शामिल थे। इस आंदोलन के तहत "शरिया अदालतों" या शरिया पर आधारित अनौपचारिक (informal) अदालतों का आयोजन भी किया जाता है। इनमें मुस्लिम महिलाएं अपनी घरेलू दिक्कतें पुरुष काजियों (इस्लामिक जजों) के सामने रखती हैं।



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