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एकता की मिसाल है यह शहर, जहां रोज सुबह मस्जिद का ताला खोलता है एक हिंदू

New Delhi : कुछ साल पहले हिन्दू-मुस्लिम दंगों का दंश झेल चुका गुजरात अब पूरी तरह बदल चुका है। यहां के अलग-अलग क्षेत्रों में अक्सर धार्मिक सौहार्द की मिसालें देखने को मिलती हैं।

 ऐसी ही एकता की एक और मिसाल सांप्रदायिक रूप से संवेदनशील माने जाने वाले अहमदाबाद के कालूपुर इलाके की है। यहां जर्जर हो चुकी एक पुरानी मस्जिद को कई सालों बाद हिंदुओं और मुस्लिमों ने साथ मिलकर दोबारा खड़ा कर डाला और अब इस मस्जिद की एक चाभी हिंदू परिवार के पास रहती है।

दरअसल, अहमदाबाद के सांप्रदायिक रूप से संवेदनशील माने जाने वाले कालूपुर इलाके काफी संवेदनशील माना जाता रहा है। कालूपुर इलाके की इस मस्जिद का इतिहास लगभग 100 साल पुराना है। लेकिन साल 1984 के बाद कालूपुर में हुए साम्प्रदायिक दंगों के बाद इस मस्जिद को लगभग बन्द कर दिया गया था। इन दंगों में कई हिन्दू और मुसलमानों का खून बहा था। सबसे बड़ी बात यह है कि इस मस्जिद के चारों ओर रामजी, हनुमान और शेष नारायण के मंदिर हैं। लेकिन इसके बाद 2002 के दंगों ने यहां के माहौल को और बदतर बना दिया। 

इस बीच यह 100 साल पुरानी मस्जिद लगभग पुराने खंडहर में तब्दील होने वाली थी। मस्जिद के ऊपर सिर्फ पेड़ों के पुराने और सूखे पत्ते ही दिखाई दिया करते थे। मस्जिद की ऐसी हालत को देख आसपास के हिन्दू भाइयों ने मुस्लिम भाइयों के साथ मिलकर भाईचारे की भावना दिखाते हुए मस्जिद की सफाई की और साल 2016 में इस मस्जिद को दोबारा खोल दिया गया। आज आलम यह है कि यह मस्जिद हिंदू और मुस्लिमों की एकता का प्रतीक बन गई है। इस मस्जिद की एक चाबी हिंदुओं के पास रहती है। 

खबर के अनुसार मस्जिद की एक चाबी पूनम पारेख और कौशिक रामी जोकि मस्जिद के पास फूल बेचते हैं, ऊके पास ही रहती है।' उन्हें ख़ुशी है कि करीब 30 वर्षों से बंद पड़ी मस्जिद अब खुल गई है और श्रद्धालु इसमें नजर आने लगे हैं।' इलाके में रहने वाले हमीदुल्लाह शेख हिंदुओं का आभार व्यक्त करते हुए कहते हैं, 'हमारे हिंदू भाइयों ने मस्जिद के पुनर्निमाण के लिए मजदूर जुटाने में हमारी मदद की।' ऐसा लगता है कि समाज में पड़ी एक दरार की बेहद प्यार से मरम्मत की गई हो।



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