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दिमागी बुखार पर लापरवाही, सिस्टम पर उठ रहे सवाल

मनीष श्रीवास्तव
लखनऊ :  बिहार में एक्यूट इंसेफिलाइटिस सिंड्रोम यानी चमकी बुखार से होने वाली मौतों का आंकड़ा लगातार बढ़ता जा रहा है। हालांकि यूपी में जेई या एईएस से होने वाली मौतों के आंकड़ों में कमी आई है, लेकिन अभी यह खतरा टला नहीं है। इसकी रोकथाम में लगे प्रदेश सरकार के 12 विभागों का आपस में समन्वय न होना और पूरी तरह से रुचि लेकर काम न करने से इसके यूपी में दोबारा फैलने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता है। दरअसल, एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम का कोई इलाज नहीं है। तमाम कोशिशों और रिसर्च के बाद भी ऐसी कोई दवाई नहीं बनाई जा सकी जिससे पीडि़त रोगियों का इलाज हो सके। यहां तक कि अभी तक इस बीमारी के पीछे के वायरस की भी पहचान नहीं हो सकी है। जाहिर है कि इस बीमारी को खत्म तो नहीं किया जा सकता है, लेकिन इसकी रोकथाम संभव है। इसके लिए ही उत्तर प्रदेश सरकार ने इस काम में अपने 12 विभागों को लगाया है जिसमें पंचायती राज, ग्राम्य विकास, बेसिक शिक्षा, माध्यमिक शिक्षा, सिंचाई, जल निगम, नगर विकास, पशुपालन, कृषि, सूचना एवं जनसम्पर्क, विकलांग व समाज कल्याण विभाग शामिल है।

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केवल पचास फीसदी ही काम
यूपी के स्वास्थ्य मंत्री सिद्धार्थनाथ सिंह भी मानते हैं कि जेई व एईएस की रोकथाम के लिए लगे 12 विभागों की टीमें केवल 50 फीसदी ही काम कर सकी हैं। पिछले दिनों राजधानी लखनऊ में इस बीमारी की रोकथाम के लिए आयोजित इन 12 विभागों की कार्यशाला में सिद्धार्थनाथ सिंह ने कहा कि जो विभाग इसमे शामिल हंै, उन्हें इसे अपना काम समझकर करना होगा। यह भावना अंदर से आनी चाहिए। उन्होंने विभागीय समन्वय पर जोर देते हुए कहा कि केवल डंडा चलाने से यह कार्य नहीं हो सकता है।
उनका मानना है कि एक गांव के विकास के लिए जितने विभाग कार्यरत हैं, एक साथ एक छतरी के नीचे कार्य नहीं करेंगे तब तक इन्सेफलाइटिस का समूल नाश नहीं कर सकते। अब तक यही होता रहा है, एक विभाग दूसरे विभाग पर दोषारोपण करता है कि शुद्ध पेयजल मुहैया कराना मेरा काम नहीं है, शौचालय बनाना मेरा काम नहीं, टीका लगाना मेरा काम नहीं। इस बहस में मारे जाते हैं मासूम बच्चे। स्वच्छता, शुद्धपेयजल, सूअरबाड़ों का प्रबंधन, टीकाकरण, विकलांगों के लिये पुनर्वास और साथ ही साथ अपनी संवेदना और मानवता को बचाए और जगाए रखने की जरूरत है।

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रिसर्च के नतीजे संतोषजनक नहीं
बिहार और पूर्वांचल के इलाकों में बच्चों में ये बीमारी मई से शुरू होकर जुलाई तक चलती है। उसके बाद यह अपने आप खत्म हो जाती है। बरसात के बाद यह बीमारी क्यों खत्म हो जाती है, यह भी एक रहस्य है। वैज्ञानिकों ने एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम पर काफी रिसर्च किया, लेकिन जो कुछ भी नतीजे सामने आए हैं, वो बहुत संतुष्ट करने वाले नहीं है। इस बीमारी का सर्वाधिक प्रकोप पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार प्रांत के सीमावर्ती जिलों में है। पूर्वांचल के पीडि़त क्षेत्रों में गोरखपुर, महराजगंज, कुशीनगर, देवरिया, बस्ती, सिद्धार्थनगर, बहराइच, संतकबीर नगर जिले प्रमुख हैं। जापानी बुखार यानी इन्सेफलाइटिस (जापानी इन्सेफलाइटिस या एक्यूट इन्सेफलाइटिस सिंड्रोम) उत्तर प्रदेश विशेषकर पूर्वी उत्तर प्रदेश के मासूमों के स्वास्थ्य के लिए बहुत बड़ी चुनौती बना हुआ है। मानसून के आगमन के साथ ही इस बीमारी का कहर टूट पड़ता है और हर वर्ष सैकड़ों बच्चों की जान इस बीमारी से चली जाती है। इस बीमारी की रोकथाम के सभी प्रयास 39 वर्ष बाद भी प्रभावी नहीं हो सके हैं। जापानी इन्सेफलाइटिस से 1978 से पूर्वी उत्तर प्रदेश में बड़ी संख्या में मौतें हो रही हैं। सबसे पहले यह बीमारी 1978 में गोरखपुर में तब पता चली, जब यहां के बीआरडी मेडिकल कॉलेज में 274 बच्चे भर्ती हुए जिनमें 58 की मौत हो गई। तब से आज तक सिर्फ बीआरडी मेडिकल कॉलेज में इन्सेफलाइटिस से 39 हजार से अधिक मरीज भर्ती हुए जिनमें 9 हजार से अधिक बच्चों की मौत हो चुकी है।

2005 में राष्ट्रीय स्तर पर बहस शुरू हुई
नेशनल वेक्टर बॉर्न डिजीज कंट्रोल प्रोग्राम के मुताबिक 2010 से 2016 तक एक्यूट इन्सेफलाइटिस सिन्ड्रोम से पूरे देश में 61 हजार 957 लोग बीमार पड़े जिनमें 8 हजार 598 लोगों की मौत हो गई। इन्हीं वर्षों में जापानी इन्सेफलाइटिस से 8 हजार 669 लोग बीमार हुए जिनमें से 1 हजार 482 की मौत हो गई। सबसे बड़ी बात तो यह है कि यह सिर्फ मेडिकल कॉलेज और जिला अस्पताल के आंकड़े हैं। निजी अस्पताल से कोई आंकड़ा ही प्राप्त नहीं होता है। बहुत से ऐसे मरीज हैं, जो अस्पताल तक आ ही नहीं पाते और जो कुछ शेष बचते हैं वो झोलाछाप डॉक्टर और स्थानीय वैद्य-हकीम के इलाज में उलझकर रह जाते हैं। उत्तर प्रदेश में वर्ष 2005 में जेई और एईएस से जब 1500 से अधिक बच्चों की मौत हुई तो पहली बार इस बीमारी को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर बहस शुरू हुई। तत्कालीन केंद्र सरकार ने चीन से जापानी इन्सेफलाइटिस के टीके आयात करने और बच्चों को लगाने का निर्णय लिया, टीकाकरण से जेई के केस काफी कम हो गए। वर्ष 2005 तक दिमागी बुखार के 70 प्रतिशत मामलों में जेई को ही जिम्मेदार माना जाता था, लेकिन आज यह कुल केस का अधिकतम दस प्रतिशत ही रह गया है। एक्यूट इन्सेफलाइटिस सिन्ड्रोम (एईएस) का मतलब किसी भी उम्र के व्यक्ति में वर्ष के किसी भी वक्त यदि बुखार के साथ सुस्ती, बदहवासी, अर्धचेतन, पूर्णअचेतन, झटका, विक्षिप्तता के लक्षण दिखते हैं तो उसे एक्यूट इन्सेफलाइटिस सिन्ड्रोम कहेंगे।

जेई व एईएस का इतिहास
जापानी इन्सेफलाइटिस का प्रकोप 1912 में जापान में हुआ था। उसी समय इसके विषाणु की पहचान की गई और इससे होने वाले संक्रमण को जापानी इन्सेफलाइटिस नाम दिया गया। जापानी इन्सेफलाइटिस का विषाणु क्यूसेक्स विश्नोई नाम के मच्छर से फैलता है। यह मच्छर धान के खेत में गंदे पानी वाले गड्ढों, तालाबों में पाया जाता है। ये पांच किमी की परिधि तक विषाणु फैलाने में सक्षम होते हैं। यह विषाणु मच्छर से उसके लारवा में पहुंच जाता है और इस तरह इसका जीवन चक्र चलता रहता है। मच्छर से ही विषाणु जानवरों, पक्षियों, और मनुष्यों में पहुंचता है, लेकिन सूअर के अलावा अन्य पशुओं में ये विषाणु अपनी संख्या नहीं बढ़ा पाते और इससे बीमार भी नहीं होते। इसी कारण इन्हें ब्लॉकिंग होस्ट कहते हैं, जबकि सूअर में ये विषाणु बहुत तेजी से बढ़ते हैं। इसी कारण सूअर को एम्लीफायर होस्ट कहते हैं।

सरकारी विभागों में तालमेल की कमी
विभागीय तालमेल की कमी का आलम यह है कि पंचायतीराज विभाग ने 12 जिलों, ग्राम्य विकास ने 20 जिलों, बेसिक शिक्षा ने आठ जिलों, माध्यमिक शिक्षा ने 15 जिलों, सिंचाई ने 37 जिलों, जल निगम ने 36 जिलों, नगर विकास ने 30, पशुपालन ने 9, कृषि विभाग ने 29, विकलांग व समाज कल्याण विभाग ने 24 जिलों में एईएस व दिमागी बुखार की रोकथाम के लिए हुई बैठकों में शामिल होने की जहमत तक नहीं उठाई। अब जो विभाग इन बैठकों में शामिल होने में कोताही बरत रहे हों,उनसे इसकी रोकथाम के लिए कोई गंभीर प्रयास की उम्मीद करना बेमानी लगता है। कुछ ऐसा ही नतीजा सामने भी आया। शासन ने इन विभागों से इस खतरनाक बीमारी की रोकथाम के लिए माइक्रोप्लान मांगा था, लेकिन इसमें भी सभी 12 विभाग अपने लक्ष्य को पूरा नहीं कर सकें। स्वास्थ्य विभाग ने 15 जिलों, पंचायती राज ने 43 जिलों, ग्राम्य विकास ने 58 जिलों, बेसिक शिक्षा ने 47 जिलों, माध्यमिक शिक्षा ने 59 जिलों, सिंचाई ने 56 जिलों, जल निगम ने 62 जिलों, नगर विकास ने 54 जिलों, पशुपालन ने 35 जिलों, कृषि ने 41 जिलों, सूचना एवं जनसम्पर्क ने 66 जिलों, विकलांग व समाज कल्याण विभाग 50 जिलों में इसकी रोकथाम का माइक्रोप्लान भी नहीं दे पाए हैं।

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