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श्रीमहालक्ष्मीचरितमानस:सुन्दरकाण्ड | Shree Mahalakshmi Charit Manas

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(सर्वाधिकार सुरक्षित )

श्रीगणेशाय नमः 
श्रीमहालक्ष्मीर्विजयते 

श्रीमहालक्ष्मीचरितमानस

चतुर्थ सोपान
श्री सुन्दरकाण्ड

आर्ष स्तुति

ऊर्णनाभाद्यथा तन्तुर्विस्फुलिंगा विभावसोः |
तथा जगद्यदेतस्या निर्गतं तां नता वयम् ||
यन्मायाशक्तिसंक्लृप्तं जगत्सर्वं चराचरम् |
तां चितिं भुवनाधीशां स्मरामः करुणार्णवाम् ||
यदज्ञानाद् भवोत्पत्तिर्यज्ज्ञानाद् भवनाशनम् |
संविद्रूपां च तां देवीं स्मरामः सा प्रचोदयात् ||
महालक्ष्म्यै च विद्महे सर्वशक्त्यै च धीमहि |
तन्नो देवी प्रचोदयात् || 

मंगलाचरण श्लोक 

या माता जगतां हिताय कुलदेवीरूपमाश्रित्य वै,
लोकत्राणमहो करोति सततं दुःखान्धकारापहा |
सर्वाभीष्टफलप्रदा जगति या सर्वार्थ तत्त्वात्मिका,
वन्दे तां परमेश्वरीं हृदि महालक्ष्मीं परां वत्सलाम्  || 1||

यस्यामन्तर्लोकमेतद्विभाति ,
योगक्षेमं या वहत्येव तुष्टा |
भक्त्या लभ्यां वत्सलां वै श्रियं ताम्,
वन्दे देवीं मातरं देयदात्रीम् ||2||

अग्रोहाख्यं महातीर्थं सिद्धकाननशोभितम् |
वन्दे कोलापुरं चापि करवीरस्थितं श्रियः ||3||

दोहा
सौती मुनि बोले सुनो शौनक अब वृत्तान्त |
श्रीमाँ के वात्सल्य का सुन्दर शुभद नितांत || 1 (अ) ||
पावन ब्रह्मावर्त में रम्य क्षेत्र हरियान | 
शोभित सिद्धारण्य तहँ महालक्ष्मी का स्थान || 1 (आ) || 

चौपाई 
श्री का सिद्धपीठ सुप्रसिद्धा | वहाँ बसे बहु ऋषि मुनि सिद्धा ||
करें भक्ति से श्रीआराधन | श्रीविद्या का केन्द्र पुरातन ||        
गर्ग महर्षि ख्यात तहँ सिद्धा | श्रीविद्यातत्त्वज्ञ प्रसिद्धा || 
पिप्पलादसुत तेजनिधाना | करें महालक्ष्मी का ध्याना || 
गर्गाश्रम श्रीविद्यागुरुकुल | छात्रकुटीरों का तहँ संकुल || 
पावें श्रीविद्याउपदेशा | शिष्यवृन्द ख्याति सब देशा ||

 करे वहन महालक्ष्मी ही उनका योगक्षेम | 
जीवमात्र के प्रति सहज गर्गहृदय में प्रेम || 2 (अ) ||  

गर्गकदाचित् रात्रि में कीर्तनमग्न विभोर | 
रोमांचित वपु नयन जल हिय में उठे हिलोर || आ || 

ॐ महालक्ष्म्यै नमः यह कीर्तन ध्वनि दिव्य |  
गूँजे आश्रम में मधुर क्रमशः मृदुता नव्य || इ || 

प्रकटी महालक्ष्मी कहा सुनो गर्ग मुनिराय |
आया सिद्धारण्य के निकट युवक असहाय || ई ||

अग्रसेन सेवक धीमंता | गणतन्त्रोद्धारक स्वनियन्ता ||
समता-ममता-करुणाधारी | धर्ममूर्ति वह जनउपकारी ||
उसकी प्रकृति में नय बोधा | अभय अहिंसा दम अक्रोधा ||
शान्ति दया मार्दव धृति त्यागा | सच अद्रोह तेज वैरागा ||
था प्रतापपुर का युवराजा | पर हिय चाहा लोकस्वराजा ||
खल काका ने उसे सताया | वह निरुपाय राज्य तज आया ||
भक्तिमती माता का वह सुत | है विषण्ण अति निजजनवंचित ||
उसे निजाश्रम में ले आओ | शिष्य रूप में मुनि अपनाओ ||
दीजे श्रीविद्या उपदेशा | जो नाशे जीवन के क्लेशा ||
वत्सल वचन सुने श्री माँ के | गहे विभोर गर्ग पद वाँके ||
बोले तव वात्सल्य अनूपा | माँ तुम केवल प्रेमस्वरूपा ||
योगक्षेम सन्तति के धारो | सदा विपद से तुम हो तारो ||
माँ बोली सब मम उपजाये | सेवक भक्त मुझे अति भाये ||
सेवा वत्स भक्ति की मूला | मैं सेवक के प्रति अनुकूला ||
अग्र स्वयं को सेवक माने | तुच्छ राजसुख को वह जाने ||

सेव्यसेवकभाव ही भक्तिसाधनामूल |
ऐसे सेवक भक्त ही नाशें जग के सूल || 3 (अ) ||

भक्तपराधीना ह्यहं वत्स स्वतन्त्रा नैव |
भक्तानां हितचिन्तनं क्रियते मया सदैव || आ ||

अन्तर्धान हुई महालक्ष्मी श्री जगदम्ब |
हे शौनक माता परा भक्तों की अवलम्ब || इ ||

उठे गर्ग चलने लगे शिष्य कहा हे तात |
कहाँ अँधेरे में चले बाकी आधी रात || ई ||

कहे शिष्य से गर्ग ने मधुर सुधासम बैन |
मातृकार्य कीन्हे बिना मुझे नहीं अब चैन || उ ||

तुरत मशाल शिष्य तब लाया | आगे होकर मार्ग दिखाया ||
गर्ग महर्षि हृदय अनुरागे | अग्रसेन को खोजन लागे ||
सोचें हिय श्री माँ की लीला | माता कैसी करुणाशीला ||
सदा प्रीति जीवों पर राखे | जीव न किन्तु प्रीतिरस चाखे ||
निरखत जाय गर्ग चहुँ ओरा | आतुर दृक् हिय भावविभोरा ||
बीती रात भोर हो आई | क्रमशः अरुण प्रभा नभ छाई ||
सरसमीप अग्रहिं अवलोका | जो था निद्रामग्न सशोका ||

सुप्त अग्र जागा झटिति सुनि मुनि की पदचाप ||
दिखे गर्ग सम्मुख खड़े करते अजपाजाप || 4 ||

प्रखर तेजयुत अग्निज्वाल से | आभा दमके दीप्त भाल से ||
दीरघ वपु प्रलम्ब भुजदण्डा | शोभित यथा अपर मार्तण्डा ||

सघन जटा श्मश्रू तथा वल्कल कटिप्रदेश |
राजमान मुस्कान से गर्ग तपस्वी वेश || 5 ||

अग्र गर्ग को शीश नवाया | मुनिदर्शन से हिय हरषाया ||
अग्रहिं लखे गर्ग तपधामा | अति गम्भीर स्वरूप ललामा ||

शरदशशी सम रम्य मुख रुचिर केश रद नास |
उन्नत कन्धर पुष्ट वपु आनन किन्तु उदास || 6 ||

आकृति राजकुलोद्भव जानी | घनगम्भीर कही मुनि बानी ||
कौन युवक क्यों भटको वन में | क्या बाधा आई जीवन में ||
लगे विषादग्रस्त मन चंचल | दुखछाया छाई मुखमण्डल ||

सुने गर्ग के मृदु वचन भरे अग्र के नैन |
पाय स्नेह उमगा हृदय बोला सविनय बैन || 7 ||

वल्लभ हुए प्रतापपुरीशा | उनका सुत मैं अग्र मुनीशा ||
कुरुक्षेत्रे हि धर्मयुद्धार्थम् | यातो जनको मम निःस्वार्थम् ||
पाण्डवपक्षे विहितं युद्धम् | पित्रा कौरवपक्षविरुद्धम्  ||
रण में पिता वीरगति पाई | की तब काका कुन्द कुटिलाई ||
वह भटगण मालव से पाया | शासन पर अधिकार जमाया ||
मातृभ्रातृ सह वध मम चाहा | रच डाला षडयन्त्र अथाहा ||

मेरी माता भगवती मैं अरु मेरा भ्रात |
सौम्य पुरोहित राज्य से निकले बिछुड़े तात || 8 (अ) ||

माता भ्रात पुरोहित हुए नदीजलमग्न |
सुना वृत्त पर ना हुई मेरी आशा भग्न || (आ) ||

उन्हें खोजता भटका वन में | लिये प्रबल आशा मैं मन में ||
खोजा बहुत पता नहीं लागा | हूँ दुर्दैवाक्रान्त अभागा ||

चिन्ता चिता समान नित मुझको रही जलाय |
हिय पर शोक मोह अरु क्षोभ रहे लिपटाय || 9 (अ) ||

शत्रु चोट तन पर करे स्वजन हृदय पर घात |
धोखा काका ने किया टूट गया मैं तात || (आ) ||

पीड़ा बसी हृदय यह मेरे | रहती मुझे निरन्तर घेरे ||
घटना विकट परम दुखदाई | मेरी प्रज्ञा देव नशाई ||
मुनिवर मैंने सब कुछ खोया | फिरूँ भटकता थककर सोया ||

क्या मुनि यह प्रारब्ध मम पूर्व जन्म का पाप |
फलीभूत अब हो रहा बन बैठा अभिशाप || 10 ||

मूँदे नयन गर्ग ने देखा | अग्रभाग्य का पूरा लेखा ||
जाना अग्रहृदयगत खेदा | शोकशंकु मनु मर्महिं छेदा ||
मनहुं अलातशल्य हिय प्रविशा | रिसता व्रण मर्मान्तक विकसा ||
तब श्रीमाया को सिर नाया | जिससे प्रेरित वह वन आया ||
निष्ठा अग्रहृदय की जानी | बोले गर्ग सुधासम बानी ||
श्री माँ वत्स जिसे अपनाए | उसका निर्मल चित्त बनाए ||  
विपद निकष जीवन की ताता | इससे श्रद्धा परखे माता ||
तप्त स्वर्ण कुन्दन हो जावे | मूल्य तराशा हीरा पावे ||
मेहँदी पिसे बने शृँगारा | भक्त कष्ट से पाय निखारा ||
तजो दैन्य कृतनिश्चय सुत अब | श्रीअर्पण कर हृदयभाव सब ||
पुत्र अग्र श्री का विश्वासा | आशापूरक हने निराशा ||

बहुत देर से चल रहे बीहड़ पथ अविराम |
चलो सिद्धवन आश्रम में कीजे विश्राम || 11 ||

मातृप्रेरणा से मैं आया | श्री महालक्ष्मी स्वयं पठाया ||
यों कहि मुनि निज परिचय दीन्हा | विह्वल अग्र चरण गहि लीन्हा ||
श्रीमाता ने स्वयं पठाया | यह सुनि वचन हृदय उमगाया ||
बहने लगी अश्रुजलधारा | रुद्ध कण्ठ से वचन उचारा ||
मुनिवर अहो आपके वचना | अमृतवत् किन्ही सुखरचना ||
करुणामयी मात जगदम्बा | दीन्हा मुझे परम अवलम्बा ||
मातृप्रेरणा से तुम आये | यही बात आशा उपजाये ||
आगे गुरुवत् कृपा तुम्हारी | नहीं असम्भव परे निहारी ||
श्री के पथ पर मुझे चलाओ | जो माँ चाहे वही कराओ ||
गर्ग शिष्य को तुरत पठाया | लेय अश्व वह आश्रम आया ||

नदी सरस्वति तीर पथ चले गर्ग अरु अग्र |
आगे पहुँचे सिद्धवन शोभा जहाँ समग्र || 12 ||

सर्वदिशा छाई हरियाली | महकें पुष्प लता तरु डाली |
प्रविशा जबहिं सिद्धवन माहीं | रहा विषाद अग्रमन नाहीं ||
बोला अग्र सुनहुँ मुनिराया | आय विपिन में मन सुख पाया ||
अनुभव हुआ प्रभाव विलक्षण | हिये भावपरिवर्तन तत्क्षण ||
अद्भुत शान्ति हृदय में छाई | तड़पत मीन यथा जल पाई ||
ठिठुरत शीत अग्नि ज्यों पाई | सूखत धान वृष्टि ज्यों आई ||

दावानल झुलसा यथा हाथी घुसा तड़ाग |
धूपतप्त मरुपथिक ज्यों छाहँ लही सौभाग || 13 ||

हिय की फाँस कसकती निसरी | मानो स्मृति जागी चिरबिसरी ||
मुनिवर सुखप्रद क्षेत्र प्रभावा | अद्भुत नूतन अनुभव पावा ||
बोले गर्ग वचन सुखकारी | अग्र तीर्थमहिमा अति न्यारी ||
तीर्थों से ही धरती पावन | आत्मशान्तिप्रद जनमनभावन ||
उनमें सिद्धारण्य विलक्षन | धाम महालक्ष्मी का यह वन ||

मिटे सर्वथा भय यहाँ दैन्य क्षोभ अरु मोह |
मन का मिटे विषाद सब त्रिविध तापसन्दोह || 14 ||

कोटियज्ञ फलदायक तीरथ | मातृशरणयात्रा का यह रथ ||
तीर्थ प्रभाव शोक तव नाशा | हुआ हृदय में शान्ति प्रकाशा ||
अग्र विलोका भव्य सरोवर | निर्मल जल से भरा मनोहर ||
सर में रुचिर कमल मुस्कावें | मधुर गान भ्रमरावलि गावें ||
हिंसक और अहिंसक प्रानी | पीवें एक घाट पर पानी ||
सर के तीर वाटिका सोहे | शोभा अमित लखत मन मोहे ||
तरु अशोक गूलर बड़ नीमा | पीपल आम कदलि दाड़ीमा ||
लताकुंज शुक पिक मृदु बोलें | कुरजां मोर कबूतर डोलें ||
तुलसी सींच रहे नर-नारी | लेय सरोवर का शुचि वारी ||

महालक्ष्मीप्रतिमा वहाँ वट के नीचे दिव्य |
चतुर्भुजा जगदम्ब की शोभा अतिशय भव्य || 15 ||

ऋषि-मुनि मण्डल और वन्यजन | पूजनरत सह विपुल बटुकगन ||
नारी वृन्द मधुर लय ताना | करे नाम संकीर्तन गाना ||

ॐ महालक्ष्म्यै नमः यह संकीर्तन गान |
अमृतधारा के सदृश लगा सुखद अति कान || 16 ||

गर्ग कहा यह शक्तिसरोवर | आदिशक्ति का सर्वपापहर ||
पावन सर में जो जन न्हावे | सकल सुतीर्थ स्नान फल पावे ||
स्पर्शमात्र से पाप विनाशे | मातृभक्ति हिय माहिं विलासे ||
सर के तट यह वट अति पावन | इससे शोभित है सिधकानन ||
प्रकटे बालमुकुन्द यहीं पर | वटपल्लवपुट देव अनश्वर ||

दीन्हा बालमुकुन्द को श्री भागवतमन्त्र |
श्रीविद्या जिससे हुई व्यक्त फलप्रद पुत्र || 17 (अ ) 

करें भक्त पूजन यहाँ श्री की महिमा गाय |
अग्र गर्ग बैठे वहाँ श्री माँ को सिर नाय || (आ)

कृपापूर्ण वात्सल्यमय श्री की छवि सुनिहार |
करी गर्ग मुनि वन्दना परैकाग्रता धार || (इ)

स्तोत्र

अयि महालक्ष्मि विपत्तिनिवारिणि दैन्यविदारिणि विश्वनुते,
प्रेमानन्दसुधारसभासिनि भक्तिप्रकाशिनि प्रीतिभरे |
ऋषिमुनिहृदयागारनिवासिनि नीतिविकासिनि तापहरे,
जय जय हे भगवति जगदीश्वरि श्रीः परमेश्वरि शुभफलदे || 1 ||

जय जगदम्ब सुमंगलकारिणि ममताधारिणि बालहिते,
भवभवविभवपराभवकारिणि करुणासारिणि सुखकलिके |
कृपयोत्सारितनिजजनविघ्ने भक्तजनाखिलपापहरे,
जय जय हे भगवति जगदीश्वरि श्रीः परमेश्वरि शुभफलदे || 2 ||

जय वरदायिनि सिद्धिविधायिनि मातर्विश्वजनोद्धरिके,
आर्तहितैषिणि ब्रह्मस्वरूपिणि भुवनविभूषिणि ज्ञानघने |
कमले कमले विमले यमले ललिते पदगतलालित्यन्ते,
जय जय हे भगवति जगदीश्वरि श्रीः परमेश्वरि शुभफलदे || 3 ||

करुणाशालिनि साधकपालिनि मौक्तिकमालिनि प्रीतियुते,
शरणागतरक्षिणि भयभक्षिणि वात्सल्यान्वितलोचनके |
दानवदर्पविनाशनकारिणि वन्दनतत्परदासहिते,
जय जय हे भगवति जगदीश्वरि श्रीः परमेश्वरि शुभफलदे || 4 ||

धनसुखवर्षिणि संकटधर्षिणि दुर्जनमर्षिणि भूतिकृते,
खलदलगञ्जिनि दुर्मदभञ्जिनि ऋषिमुनिरञ्जिनि भक्तनुते |
पद्मदलायतनयने संस्मितवदने भक्तसुबोधकृते,
जय जय हे भगवति जगदीश्वरि श्रीः परमेश्वरि शुभफलदे || 5 ||

दिव्यशरच्छशिकान्तिहरामलहेममयाभरशोभितके,
मणिगणकुण्डलकरिवरमौक्तिकनासिकभूषणरञ्जितके |
शोभारञ्जितसाधकहृदये विविधालंकृतिकान्तिनिधे,
जय जय हे भगवति जगदीश्वरि श्रीः परमेश्वरि शुभफलदे || 6 ||

अमलं कमलं मृदुलं सुदलं सजलं सदये तव पादतले,
अधनं सधनं कुरुषे सततं कुशलं निखिलं तव करकमले |
तव चरणं शरणं हरणं विपदां भवभीतिविनाशकृते,
जय जय हे भगवति जगदीश्वरि श्रीः परमेश्वरि शुभफलदे || 7 ||

त्वत्पदपद्ममहोश्रितमद्य महेशसुरेशनगेशनुतम्,
श्रीः कल्याणि कृपानिधिरम्ब सुवर्धय भक्तिं पावय माम् |
दीनमनन्यगतिं कृपणं शरणागतमाशु विमोचय हे,
जय जय हे भगवति जगदीश्वरि श्रीः परमेश्वरि शुभफलदे || 8 ||

विपदं मर्दय वर्धय भक्तिं शक्तिं सान्द्रीकुरु वरदे,
आनन्दकन्दमनन्तानन्दमहो प्रददात्यरविन्दन्ते |
अभयं सुधियं विजयं निचयं यशसो लभते मा भक्तस्ते,
जय जय हे भगवति जगदीश्वरि श्रीः परमेश्वरि शुभफलदे || 9 ||

एतद् गर्गकृतं स्तोत्रं यः पठेन्नियतः शुचिः |
महालक्ष्मीप्रसादाय तस्य माता प्रसीदति ||10 ||
         
 || इति श्री महालक्ष्मीस्तोत्रम् ||

         ततः चले गर्गाश्रम आया | शोभा निरखि अग्र हरषाया ||
         कुटी-कुटी में श्रुतिपारायण | सस्वर क्वचित् साम का गायन ||
         जो जो ऋचा बटुकगण बोलें | शुकगण वही बोलते डोलें ||
         अग्निहोत्र धूम की रेखा | दीर्घ चढ़ी नभ में वह देखा ||
         कीन्हा अग्र स्नान अरु भोजन | बोले गर्ग वचन शुभ रंजन ||
         वत्स अग्र श्री माँ जग माहीं | परम शरण्य विमति कोउ नाहीं ||
         आराधन उनका कर लीजे | पार कष्टसागर को कीजे ||
         मातृभक्ति सब सुख की मूला | अनायास नाशे भवशूला ||

परम प्रेम ही भक्ति है अमृतरूपा तात |
श्री केवल चाहे वही तृप्त उसी से मात || 18 (अ) ||

जिसका वाचक प्रणव वह महालक्ष्मी जगदम्ब |
श्री श्रेष्ठतादायिनी है श्रेष्ठत्वालम्ब || (आ) ||

माता-सुत सम्बन्ध तुम श्री से लेओ मान |
माँ मेरी मैं मात का यह निश्चय लो ठान || (इ) ||

मात्र स्वत्वसम्बन्ध ही प्रेमभक्ति का मूल |
हुआ नहीं सम्बन्ध वह केवल यह ही भूल || (ई) ||

लाक्षासदृश है मानवमन। प्रकृतिकठोर न द्रवे कथंचन ||
इसे वेदना जब पिघलावे। प्रेमभक्ति का रंग मिल जावे ||

तात तुम्हारी ही तरह सुरथ काल प्राचीन |
निजजनवंचित राज्य से निकला होकर दीन || 19 ||

जाय सुमेधा ऋषि के आश्रम | श्रीविद्योक्त सुना व्रत उत्तम ||
सुरथ महालक्ष्मीव्रत कीन्हा | मनवांछित फल उसने लीन्हा ||
उच्च लक्ष्य हित व्रत आवश्यक | व्रत से होवो मन पर शासक ||
यह जग महालक्ष्मी से चालित | उस पर सृष्टि चक्र आधारित ||
कार्यशक्ति सब उससे पावें | व्रत से आत्मशक्ति बढ़ जावे ||

आए तुम सौभाग्यवश महालक्ष्मी के धाम |
भक्तिभाव से कीजिए श्री का व्रत निष्काम || 20 (अ) ||

अग्र कहा विस्तार से सुनना चाहूँ तात |
निजजनवंचित सुरथ का कहें कथावृत्तान्त || (आ) ||

श्रीविद्योक्त श्रेष्ठ श्रीव्रत बतलाया आप |
क्या श्रीविद्या जो मिटा सके हृदयसन्ताप || (इ) ||

व्रतमाहात्म्य मुझे कह दीजे | मेरे हिय प्रकाश मुनि कीजे ||    
मन में जिज्ञासासंचारा | सुनकर वत्सल वचन तुम्हारा ||
कहने लगे गर्ग साह्लादा | सुनो सुमेधा-नृपसंवादा ||
सरस भक्तिरस से यह ताता | इसमें मातृकृपावृत्तांता ||

चैत्रवंश में नृप हुआ सुरथ नाम गुणवान |
मन्त्री अनुज नरेश का अति शठ दोष निधान || 21 (अ) ||

कोलाध्वंसी वंश का राजा शत्रु सुमन्त्र |
मन्त्री उससे जा मिला किया कुटिल षडयन्त्र || (आ) ||

शत्रु सुरथ पर करी चढाई | नृप सम्मुख जा करी लड़ाई ||
मन्त्री नृप से धोखा कीन्हा | समरसहाय शत्रु को दीन्हा ||
रण में सुरथ पराजय पाई | वन में जाकर जान बचाई ||
मन्त्री अनुज राजपद लीन्हा | राजकोष रिपु को दे दीन्हा ||
सुरथ प्रवंचित कानन माहीं | भटके चैन हिये में नाहीं ||
भटकत गया सुमेधा-आश्रम | सरतट राजित परम



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