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"केजरीवाल" सिर्फ एक सरनेम नहीं बल्कि एक सोच, एक विचार धारा, एक युग का नाम हो गया है।



23 अगस्त 2016 

2012  के अन्ना आंदोलन से पहले "केजरीवाल" भारत में मौजूद अनेको जातियों में से एक जाति का सरनेम मात्र था। जैसे झा, पाण्डेय, मिश्रा, वर्मा, शर्मा, श्रीवास्तव, अग्रवाल, गुप्ता, यादव सरनेम होता है वैसे ही केजरीवाल भी एक सरनेम है। लेकिन अन्ना आंदोलन के दौरान एक नया सितारा जन मानस के बीच उदित हुआ, "अरविन्द केजरीवाल"। वैसे तो यह सितारा काफी पहले ही उदित हो चूका था और बहुत से लोग इसके प्रकाश से परिचित भी थे, लेकिन इसका दायरा सीमित था। अन्ना आंदोलन के बाद देश-विदेश में अरविन्द केजरीवाल के नाम की चर्चा हुई, लोग इनके बारे में जानने, सुनने और खोजने लगे। 

अन्ना आंदोलन के पहले देश में निराशा का माहौल था। आम आदमी हर तरह से परेशान था। महँगाई बढ़ती जा रही थी, भ्रष्टाचार नित नए कीर्तिमान स्थापित करते जा रहा था। देश के ईमानदार लोगों में यह बात घर कर गयी थी कि इस देश का अब कुछ नहीं हो सकता। गरीबों की जिंदगी बद से बदतर हो रही थी। ऐसे में जनलोकपाल के लिए जंतर मंतर पर आंदोलन करने के लिए अन्ना जी दिल्ली आये। उनको लाने वाले थे अरविन्द केजरीवाल और उनकी टीम। इस आंदोलन को भ्रष्टाचार से परेशान लोगों का खूब समर्थन मिला। लोगों को लगा कि अभी नहीं तो कभी नहीं।

उसी दौरान अरविन्द केजरीवाल जी के व्यक्तित्व से भी लोगों को परिचित होने का मौका मिला। लोग उनके जादुई व्यक्तिव को देखकर मंत्र-मुग्ध हो गए। एक साधारण सा दिखने वाले आदमी में उनको अपनी बहुत सी आशा और उम्मीद पूरी होती दिखी। जब आम आदमी पार्टी बनी तो जैसे हर कोई इससे जुड़ने के लिए बेताब था। भ्रष्टाचार और महँगाई से निजात दिलाने वाला एक ही शख्स नजर आता था, अरविन्द केजरीवाल। अब निराश और परेशान लोगों को उम्मीद जगी कि इस देश का बहुत कुछ हो सकता है। अब गरीब नहीं, गरीबी दूर होगी देश से। हिंदुस्तान फिर से सोने की चिड़िया बन सकता है।

आज कोई ईमानदारी की बात करता है तो लोग उसको केजरीवाल कहते हैं। कोई भ्रष्टाचार के विरुद्ध आवाज उठाता है तो उसको केजरीवाल कहते हैं। कोई रिश्वत न लेने और देने की बात करता है तो उसको केजरीवाल कहते हैं। अब केजरीवाल शब्द सिर्फ एक सरनेम ही नहीं बल्कि उससे बहुत ज्यादा हो गया है। आज केजरीवाल एक सोच का नाम हो गया है। ईमानदारी की सोच, भ्रष्टाचार को बर्दाश्त न करने की सोच। आज केजरीवाल नाम हो गया है अन्याय को न सहने की सोच का। चौक चौराहों पर लोगों के मुंह से कहते हुए सुना जा सकता है कि ज्यादा केजरीवाल न बन।

आज केजरीवाल एक ऐसी विचारधारा बन गया है जिसका उद्देश्य भ्रष्टाचार को मिटाना है। जिसका उद्देश्य अमीरी और गरीबी के बीच की खाई को पाटना है। जिसका उद्देश्य दलित उत्प्रीड़न को ख़त्म करना है। जिसका उद्देश्य भयमुक्त समाज बनाना है। जिसका उद्देश्य चोर, लुटेरों, अपराधियों से समाज को मुक्त करना है। जिसका उद्देश्य वीआईपी संस्कृति को ख़त्म करना है। जिसका उद्देश्य जनप्रतिनिधियों को शासक से सेवक बनाना है। जिसका उद्देश्य राजनीति को विलासिता और वैभव पाने का साधन नहीं बल्कि जनसेवा का माध्यम बनाना है। जिसका उद्देश्य जनता को सर्वोपरि बनाना है न कि जनप्रतिनिधियों को।

आज केजरीवाल एक ऐसे युग का नाम बन गया है जब भय-भूख मुक्त समाज होगा। एक ऐसे युग का नाम जब जनता पुलिस से डरेगी नहीं बल्कि उसको अपना साथी समझेगी। जब सरकारी अधिकारी जनता की सुनेंगे, जनता का काम ईमानदारी पूर्वक करेंगे।  सरकारी कार्यालय में बिना रिश्वत के काम होगा। कोई किसी का हक़ नहीं मारेगा। कोई किसी के अधिकारों पर अतिक्रमण नहीं करेगा। किसी को सबकुछ, किसी को बहुत कुछ, किसी को कुछ और किसी को कुछ नहीं, वाली बात नहीं रहेगी। हर तरफ खुशहाली होगी। सबको प्रगति के समान अवसर मिलेंगे।  समाज में भ्रष्टाचार का नामोनिशान नहीं रहेगा। महँगाई पर लगाम लगेगी।

केजरीवाल युग की शुरुआत दिल्ली से हो चुकी है, जरूरत है कि हम केजरीवाल का साथ दें। अपनी बेहतरी के लिए, अपने अपनों की बेहतरी के लिए।


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"केजरीवाल" सिर्फ एक सरनेम नहीं बल्कि एक सोच, एक विचार धारा, एक युग का नाम हो गया है।

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