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हर राजनेता लालची नहीं होता।


23 जुलाई, 2016 

आज कल राजनीति में लोभ, लालच और भ्रष्टाचार का इतना बोल-बाला हो गया है कि कोई मानने को तैयार ही नहीं होता कि राजनीति में लोग नि:स्वार्थ सेवा के लिए भी आ सकते हैं।  राजनीति की इस बदनामी के लिए निश्चित रूप से ऐसे राजनेता ही जिम्मेदार हैं जिन्होंने इस तरह के कर्म किए हैं। घोटाले पर घोटाले हो रहे हैं, सरकारी मशीनरियों का जम कर दुरूपयोग हो रहा है। जम के एक दूसरे का चरित्र हनन भी कर रहे हैं कुछ नेता तो कुछ एक-दूसरे को गाली भी देते रहते हैं। नारी सम्मान को भी दर-किनार करके बयानबाजी हो रही है, पिछले कुछ दिनों से। 

ऐसे में कोई राजनीति में आता है तो यही सोचा जाता है कि वो पैसे बनाने आया है। कोई राजनीति में सादगी की बात करता है तो लोग मजाक उड़ाते हैं। कोई राजनीति में सादगी रखता है तो उसको पुराने राजनेता नौटंकी बताते हैं। किसी की बीमारी का भी मजाक उड़ाने में पीछे नहीं हट रहे हैं लोग। जब से आम आदमी पार्टी बनी है, भ्रष्टाचार से त्रस्त लोगों का, भ्रष्टाचार से लड़ने का जज्बा रखने वाले लोगों का पार्टी में आना जारी है। इस मुहीम में बहुत से लोग इस दूसरी पार्टी से भी आए हैं। 

पार्टी बनने के बाद कांग्रेस से अलका लाम्बा जी आईं। लोगों ने उनको अवसरवादी कहा। अरे अवसरवादी ही होना होता तो कांग्रेस में कौन से छोटे पद पर थीं वो ? राष्ट्रीय महिला आयोग की सम्मानित सदस्य थीं, सत्ता सुख लेने के लिए उनको नई-नवेली पार्टी ही मिली थी, जिसका उस समय कोई राजनीतिक भविष्य नहीं था। उसके बाद बिहार में मंत्री पद को सुशोभित कर रही परवीन अमानुल्लाह जी आम आदमी पार्टी में शामिल हुईं। उनको पार्टी की तरफ से लोकसभा चुनाव में उम्मीदवार भी बनाया गया था।  

लेकिन ये पार्टी का फैसला था, ये कहना गलत होगा कि वो सत्ता सुख के लालच में आम आदमी पार्टी में शामिल हुईं। मंत्री पद से बड़ा सत्ता सुख क्या हो सकता है जिसको छोड़ कर वो आई थी? अगर उनको सांसद बनने का ही लालच होता तो उनकी पार्टी जदयू भी टिकट दे सकती थी। उनको सिर्फ कहने भर की देर थी। इसी कड़ी में अभी थोड़े दिनों पहले ही नवजोत सिंह सिद्धू जी ने राज्यसभा की सदस्यता से इस्तीफा दिया है। पहले तो सिर्फ अटकलें थीं लेकिन अब तो बिलकुल साफ़ हो गया है कि वो कुछ ही दिनों में आम आदमी पार्टी में शामिल होंगे। 

इनके इस्तीफा देते ही लोगों ने कहना शुरू कर दिया कि ये सत्ता सुख के लिए भाजपा छोड़ रहे हैं। जो आदमी 10 साल तक लोकसभा सांसद रह चूका हो और अभी-अभी 2-3 महीने पहले ही 6 साल के लिए राज्यसभा की सदस्यता के लिए मनोनीत हुआ हो, उसको क्यों छोड़ देगा ? लेकिन लोगों को तो उनकी बुराई करनी थी। कहने लगे कि पंजाब में आम आदमी पार्टी की तरफ से मुख्यमंत्री का उम्मीदवार बनने के लिए ये भाजपा से जा रहे हैं। जबकि आम आदमी पार्टी की तरफ से कहा गया कि उनको चुनाव का टिकट भी नहीं दिया जायेगा।  अब लोग कह रहे हैं कि सिद्धू न इधर के रहे न उधर के। मतलब लालच का ही अर्थ निकाला जायेगा। 

कोई ये क्यों नहीं कहता कि सिद्धू जी ने भ्रष्टाचार से लड़ाई लड़ने में आम आदमी पार्टी का साथ देने के लिए भाजपा एवं राज्यसभा की सदस्यता छोड़ी है ? क्यों किसी भी नेता के हर एक कदम को लोभ और लालच के साथ ही जोड़ा जाता है ? क्यों नहीं मान लिया जाता कि लोग ईमानदार राजनीति भी करते हैं ?


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