Get Even More Visitors To Your Blog, Upgrade To A Business Listing >>

चीनी ऐप बैन करने के बाद 'दीर्घकालीन पॉलिसी' का निर्माण हो!

हमारा YouTube चैनल सब्सक्राइब करें और करेंट अफेयर्स, हिस्ट्री, कल्चर, मिथॉलजी की नयी वीडियोज देखें.

देश में कार्य करने वाले 59 चीनी ऐप्स को प्रतिबंधित करने के बाद भारत सरकार ने चीनी गवर्नमेंट और कंपनियों को एक तरह से सख्त संदेश दे दिया है कि विस्तारवाद और व्यापार दोनों साथ - साथ चलना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन भी है.

यह कुछ ऐसा ही है, जैसा पाकिस्तान के साथ भारत की पॉलिसी बन चुकी है कि आतंकवाद और बातचीत साथ-साथ नहीं चल सकते. मतलब, जब तक पाकिस्तान आतंक फैलाने की नीति का त्याग नहीं करता है, तब तक उससे गंभीर बातचीत की संभावना नहीं पनपेगी!

सबसे बड़ा आश्चर्य इस बात का है कि आखिर अब तक चीन के संबंध में इस तरह का संदेश क्यों नहीं दिया गया? 

जिस प्रकार से वह भारत के साथ लगी लंबी सीमा पर गाहे बगाहे विवाद करता रहता है, उसने हम भारतीयों के सामने हमेशा ही संकट खड़ा किया है.'


अपने वर्चस्व को कायम रखने के लिए भारत के साथ वह बेवजह विवादों को बढ़ावा देता रहा है. 1962 में जबरन उसने हमारी हजारों वर्ग किलोमीटर ज़मीन हथिया ली और उसके बाद भी उसको चैन नहीं आया!
ऐसे में हमारे नीति-निर्माताओं को आखिर किस बात की कन्फ्यूजन रही है जो कोई हिंदी चीनी भाई भाई का नारा देता है तो कोई निवेश की खातिर दर्जनों बाद चीनी प्रशासकों के सामने हाथ फैलाने चला जाता है?

हमें समझना ही होगा कि एक तरफ दुनिया जहां लोकतान्त्रिक ढंग से आगे की तरफ बढ़ रही है, वहीं चीन अपनी सैन्य शक्ति को किसी अंतरराष्ट्रीय ब्लैकमेलर की तरह इस्तेमाल कर रहा है! कभी भारतीय सीमा पर तो कभी साउथ चाइना सी में तो कभी अफ्रीका के जिबूती में...

सिर्फ सैन्य शक्ति ही नहीं, बल्कि उसकी आर्थिक स्थिति भी दुनिया को ब्लैकमेलिंग के रास्ते पर ले जा रही है. चीन द्वारा दिया गया क़र्ज़ छोटे और कमजोर देशों के गले की फांस बनता जा रहा है और कई देश तो चीन के आर्थिक उपनिवेश बनने को ओर अग्रसर हो चुके हैं.

बड़े आश्चर्य की बात है कि तमाम अंतरराष्ट्रीय मजबूरियों के बावजूद भी भारत, चीन के प्रति इतना उदार कैसे बना रहा? चाहे वह पाकिस्तान के किसी आतंकवादी का संयुक्त राष्ट्र संघ में अपने वीटो पॉवर से समर्थन करना हो, चाहे भारत के अभिन्न अंग जम्मू कश्मीर पर लिए गए फैसले का सम्बन्ध हो, चीन ने हमेशा नकारात्मक रुख ही दिखाया है. 
ऐसे में सवाल उठता है कि अगर पाकिस्तान से हम राष्ट्र हित की खातिर क्रिकेट और दूसरे आर्थिक संबंधों की तिलांजलि दे सकते हैं तो चीन को अब तक रियायत क्यों मिली है? 
आखिर क्यों भारत उसका मजबूत व्यापारिक साझेदार बनने के रास्ते पर आगे ही बढे?
उसने अब तक दूसरे विकल्पों की तलाश क्यों नहीं किया?

पहले की सरकारों की बात छोड़ भी दें तो नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पिछले 6 सालों से एक बेहद मजबूत सरकार केंद्र में है और ऐसा कहीं भी प्रतीत नहीं हुआ कि चीन को लेकर व्यापार और दूसरे मुद्दों पर सजगता दिखलाई गई है या उसका विकल्प तलाशने की कोशिश की गई है. बल्कि इसकी बजाय वर्तमान सरकार चीन की तरफ कुछ ज्यादा ही झुकी नजर आई. 
मीडिया में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के चीनी राष्ट्रपति शी' चिनफिंग से सर्वाधिक बार मिलने की ख़बरों का रोज ही विश्लेषण किया जाता है कि आखिर इन सबसे देश को क्या मिला?

आप गौर करेंगे तो पाएंगे कि खुद चीन ने तमाम अंतरराष्ट्रीय दबावों और दूसरे देशों से द्विपक्षीय संबंधों के बावजूद भी अपने देश में गूगल, ट्विटर फेसबुक जैसे तमाम कंपनियों को पैर नहीं पसारने दिया. उसने ऐसी पॉलिसी का मजबूत निर्माण किया जिससे तमाम अमेरिकी कंपनियां कंफर्टेबल नहीं हुईं और चीन ने इसकी जरा भी परवाह नहीं की. 

आज चीन में गूगल के कंपैरिजन में बैदू है तो ट्विटर की बजाय वहां विवो चलता है. हर चीज पर चीन कड़ाई' से पेश आया, जिसने महाशक्ति बनने के उसके सपने को साकार कर दिया है. 

आखिर, इसी प्रकार से सख्त पॉलिसी का निर्माण भारत ने क्यों नहीं किया?
आज बेशक टिक टॉक समेत कुछ चाइनीस ऐप प्रतिबंधित कर दिए गए हैं, लेकिन दीर्घकालीन रणनीति के बगैर राष्ट्र हित का लक्ष्य हम हासिल कर लेंगे, इसमें बड़ा प्रश्न चिन्ह है!

भारत को तमाम तकनीकी विशेषज्ञों के साथ मिलकर ऐसी नीति बनानी चाहिए जिसमें राष्ट्र प्रथम नजर आए और उसे सख्ती से लागू भी करना चाहिए. बेशक वह कोई चीनी ऐप हो कोई अमेरिका का ही ऐप क्यों ना हो, इससे कोई फर्क नहीं पड़ना चाहिए. 

इसी प्रकार व्यापार और निवेश को लेकर भी अगले 30 सालों यानी 2050 तक को ध्यान में रखकर नियम बनाए जाने की आवश्यकता है. दीर्घकालीन रणनीति ही हमें स्थाई ताकत दे सकती है, इस बात में दो राय नहीं!

चीनी ऐप प्रतिबंधित करना एक संदेश जरूर दे रहा है, लेकिन संदेश प्रभावी और स्थाई कैसे होगा, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि हम देश को किस दिशा में लेकर जा रहे हैं. आत्मनिर्भर भारत का अभियान एक सजग और सटीक अभियान है, किंतु बात वहीं आकर रूकती है कि मेक इन इंडिया, स्टैंड अप इंडिया, स्टार्टअप इंडिया जैसी कई दर्जन परियोजनाएं सफलता के झंडे क्यों नहीं गाड़ सकीं? 

अगर इन प्रश्नों का उत्तर हम ढूंढ लेते हैं तो चीनी मुसीबत का विकल्प भी तलाश पाएंगे और पूरी दुनिया में अपनी ताकत का लोहा भी मनवा लेंगे!

आप इस सम्बन्ध में क्या कहते हैं, कमेन्ट-बॉक्स में ज़रूर बताएं.

- मिथिलेश कुमार सिंह, नई दिल्ली.

Web Title: Long Term Policy Required, After Chinese Apps Ban

YouTube चैनल | समाचार" |  न्यूज वेबसाइट (Need a News Portal ?) बनवाएं. | सूक्तियाँ | छपे लेख |  

मिथिलेश  के अन्य लेखों को यहाँ 'सर्च' करें... Use Any Keyword for More than 1000 Hindi Articles !!)

Disclaimer: इस पोर्टल / ब्लॉग में मिथिलेश के अपने निजी विचार हैं, जिन्हें तथ्यात्मक ढंग से व्यक्त किया गया है. इसके लिए विभिन्न स्थानों पर होने वाली चर्चा, समाज से प्राप्त अनुभव, प्रिंट मीडिया, इन्टरनेट पर उपलब्ध कंटेंट, तस्वीरों की सहायता ली गयी है. यदि कहीं त्रुटि रह गयी हो, कुछ आपत्तिजनक हो, कॉपीराइट का उल्लंघन हो तो हमें लिखित रूप में सूचित करें, ताकि तथ्यों पर संशोधन हेतु पुनर्विचार किया जा सके. मिथिलेश के प्रत्येक लेख के नीचे 'कमेंट बॉक्स' में आपके द्वारा दी गयी 'प्रतिक्रिया' लेखों की क्वालिटी और बेहतर बनाएगी, ऐसा हमें विश्वास है.
इस लेख से जुड़े सर्वाधिकार इस वेबसाइट के संचालक मिथिलेश के पास सुरक्षित हैं. इस लेख के किसी भी हिस्से को लिखित पूर्वानुमति के बिना प्रकाशित नहीं किया जा सकता. इस लेख या उसके किसी हिस्से को उद्धृत किए जाने पर लेख का लिंक और वेबसाइट का पूरा सन्दर्भ (www.mithilesh2020.com) अवश्य दिया जाए, अन्यथा कड़ी कानूनी कार्रवाई की जा सकती है.


This post first appeared on Hindi Daily Editorial - नए लेख | Freelan, please read the originial post: here

Share the post

चीनी ऐप बैन करने के बाद 'दीर्घकालीन पॉलिसी' का निर्माण हो!

×

Subscribe to Hindi Daily Editorial - नए लेख | Freelan

Get updates delivered right to your inbox!

Thank you for your subscription

×