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सांस्कृतिक मोर्चे का शक्तिशाली अस्त्र : जनगीत - डॉ राजेश मल्ल

१- सांस्कृतिक मोर्चे का शक्तिशाली अस्त्र : जनगीत

           साहित्य हमें संस्कारित करता है। मानवीय बनाता है, मानव विरोधी विचारों के विरुद्ध संघर्ष के लिए तैयार करता है। गैर बराबरी, शोषण और उत्पीड़न के पीछे तर्कशास्त्र समझने में सहयोग करता है। आज कारपोरेट की लूट (जल, जंगल, जमीन) तथा सत्ता के साथ उसके गठबंधन ने देश के किसानों, मजदूरों, छोटे व्यापारियों, दलितों, आदिवासियों के जीवन को त्रस्त कर दिया है। बहुलतावादी हमारी संस्कृति, सहभाव, साझापन को रौंद दिया है। झूठ फरेब, लूट की संस्कृति को ऐसे अर्ध सत्य बनाकर पेश किया जा रहा है जहाँ महान मानवीय मूल्यों का स्पेश कम हो। साहित्य को भी प्रश्नांकित कर उसे फालतू और बाजारू बनाकर सत्ता के हित साधक के रूप में बदला जा रहा है। यह एक बेहद खौफनाक समय है मनुष्यता विरोधी और जन विरोधी। लेकिन ऐसे ही समय में सबसे ज्यादा साहित्य की जरूरत होती है या है। फर्दाफाश करने वाले, लूट के तर्क को खोलने वाले। बढ़ती निराशा से मुक्त होकर मानवता के पक्ष में खड़ा करने में सहयोग देने वाले। ऐसे साहित्य की जरूरत जो बकौल प्रेमचन्द्र ‘राजनीति के आगे चलने वाले मशाल’ की तरह हो।

               अगर भारत के इतिहास को देखें तो ऐसा साहित्य राष्ट्रीय मुक्ति संग्राम के दौर में खूब लिखा गया, जन-जन तक पहुँचा। काव्य पंक्तियाँ जन संग्रामों का कण्ठ हार बन गइंर्। कई-कई कविताएँ तो आन्दोलनों का केन्द्रीय नारा बन गईं। कहने का तात्पर्य यह है कि जन संघर्ष को पर्याप्त ऊष्मा, ऊर्जा और दिशा साहित्य इस दौर में प्रदान करती रही। शीत युद्ध के दौर में यह क्रम बदला लेकिन आजाद भारत में भी जन संघर्षों के साथ जो साहित्य रचा गया वह अत्यन्त सारवान रहा और जन उपयोगी तथा जनपक्षधर भी।

             इस तरह के आन्दोलनधर्मी तथा जन संघर्षों के गीत-कविताओं के दो रूप हैं। पहला जनता के लिए दूसरा जनता के संघर्ष को संचालित करने वाले हिरावल लोगों के लिए। पहले को हम जनगीत नाम से जानते हैं तथा दूसरे को गंभीर विमर्श वाले सौन्दर्य बोधीय तराने के रूप में। आज बड़े पैमाने पर आन्दोलन चलाए जा रहे हैं छात्रों, नौजवानों, किसानों, मजदूरों, व्यवसायियों के। फिर से एक बार नये जनगीतों की जरूरत है जो जनता के बीच नये समाज का स्वप्न तथा भरोसा बाँट सकें। जन संघर्षों को उद्दीप्त  कर सकें। ऊर्जा प्रदान करें, सत्ता के शोषण कारी चरित्र को उजागर कर सकें।

    जन गीतों की बुनावट जहाँ एक तरफ लोकधर्मी (धुन, लय, भाव) के स्वर पर हो तो दूसरी तरफ जनता के गहरे बिखराव और निराशा के भावों को दर किनार कर नया सौन्दर्य भाव सृजित कर सकें। इस सन्दर्भ में हमें अपने पूर्ववर्ती जनगीतों को याद करना चाहिए। ऐसे जनगीत आज भी हमारे बैठकों, धरनों, गोष्ठियों, मार्चों में गाये जाते हैं।


        सबसे लोकप्रिय गीतों में कोई विभेद तो नहीं किया जा सकता लेकिन फैज के तराने का कोई सानी नहीं है। लाजिम है कि हम देखेंगे, आज भी हमारे बैठकों का सबसे जरूरी गीत है। गीत की बुनावट कयामत की अवधारणा के रूपक को स्टेप बाई स्टेप फैज ने क्रांति के संभव होने के वक्त में बारीकी से बदल दिया है जो आज भी हमारे लिये मानीखेज है। कयामत के दिन ‘पहाड़ रुई की तरह उड़ने लगेंगे, काबे से बुत उठाये जाएँगे, धरती धड़धड़ धड़केगी, ऐसा पवित्र ग्रंथों में लिखा है वह संभव होगा। लेकिन इसी रूपक में फैज ने तख्त-ताज के गिराने, उछाले जाने, मजलूमों के पाँव तले और अहले हकम के सर ऊपर उपेक्षित हरम के लोगों को मसनद पर बैठने को जोड़कर क्रांति के दिन में बदल दिया है। गीत पढ़ें और कयामत के रूपक को ध्यान में रखें तो इसका आनन्द और बढ़ जाता है। अपने अंतिम बन्द तक रूपक को नया आयाम देते हुए फैज घोषणा करते हैं कि-


उठ्ठेगा अन-अल, हक का नारा

जो मैं भी हूँ और तुम भी हो।

और राज करेगी खल्क-ए-खुदा 

जो मैं भी हूँ और तुम भी हो।

यह इकलौता गीत नहीं है। 


हिन्दी उर्दू बांग्ला, मराठी के बड़े कवियों ने जनगीत लिखे। उनके लय-धुन, भाव-संवेदना को लोक तथा समय के साथ आज नये सिरे से पढ़ने या पाठ करने की जरूरत है। लाउड होना भी एक कला है। अपने भीतर खौलते हुए जज्बात को गीतों में ढालना एक महान सृजन है तथा उसे संयत स्वरों में जन-जन तक पहुँचाना जनगीतों का आन्तरिक धर्म। इस क्रम में शलभ श्रीराम सिंह और शशिप्रकाश के गीतों को याद करना बेहद जरूरी है। शलभ श्रीराम सिंह ने ढेरों गीत लिखे लेकिन उनका गीत ‘घिरे हैं हम सवाल से हमें जवाब चाहिए’ आज भी बेहद लोकप्रिय है। गीत की लय मार्च पास्ट की है और हर बन्द नये रूपक तथा उपमानों से सुसज्जित है अपने समय की विडम्बना को उन्होंने तेजाबी भाषा में रचा है जो वर्षों बाद आज भी प्रासंगिक हैः-

नफस-नफस, कदम-कदम

बस एक फिक्र दम-ब-दम

घिरे हैं हम सवारल से

हमें जवाब चाहिए

जवाब दर सवाल है

कि इन्कबाल चाहिए।

शलभ श्री राम सिंह के इस गीत के प्रत्येक बन्द नये प्रतीकों तथा उपमानों में अपने समय की सत्ता का फर्दाफाश करते हैं।         जहाँ पे लफ्ज-ए-अम्न एक खौफनाक राज हो, जहाँ कबूतरों का सरपरस्त एक बाज हो, उन्हीं की सरहदों में कैद हैं हमारी बोलियाँ, वही हमारी थाल में परस रहे हैं गोलियाँ। इस तरह की पंक्तियाँ जहाँ पर्दाफाश करती हैं वहीं उत्साहित करने, संघर्ष करने की ताकत देती हैं। इनकी झूठी बात पर ना और तू यकीन कर, इस रूप में गीत मात्र नारे बाजी नहीं बल्कि गहरे जनतांत्रिक व्यवस्था को प्रश्नांकित करती हैं। राजनीति के झूठ को बेनकाब करती है।

    इस क्रम में नये लोगों में शशि प्रकाश ने जन गीत खिले हैं। वे परिवर्तन सृजन, संघर्ष का बखूबी एक नया लोक ही रचते हैं उनका प्रसिद्ध गीत जिन्दगी ने एक दिन कहा जिन प्रतीकों, विम्बों से रचा गया है वह हमारे भीतर कहीं गहरे एक नई ऊष्मा ऊर्जा भरता है। जनगीतों को नारा कहने वाले कला आग्रही लोगों को इस गीत को पढ़ना चाहिए। उनके सारे सौन्दर्य बोधीय कलात्मक प्रतिमान टूट जाएँगे। जिन्दगी का कहन खासकर स्वर कैसे एक नये संघर्ष के लिए प्रेरित करता है। कैसे गीत के क्रमशः अगले बन्द नये स्वर सृजन का संधान करते हैं, बेजोड़ है।

    जिन्दगी ने कहा-क्या, क्या, क्या, तुम लड़ां कि चह-चहा उठे हवा के परिन्दे, आसमान चूम ले जमीन को, जिन्दगी महक उठे.....। तुम उठो- कि उठ पडं़े असंख्य हाथ, चलो कि चल पड़ें असंख्य पैर साथ मुस्करा उठे क्षितिज पर भोर की किरन। जिन्दगी ने एक दिन कहा.... क्या कि तुम बहो, रुधिर की तरह, जिन्दगी ने एक दिन कहा तुम जलो कि रौशनी के पंख झिलमिला उठें, जिन्दगी ने एक दिन कहा तुम रचो हवा पहाड़ रोशनी नई, महान आत्मा नई गीत लड़ने, उठने, जलने, कहने और रचने का आह्वान करती है। कैसे रुधिर प्रवाह की तरह नये जीवन के रचने की लड़ने की उठने की, कि दुनिया बदल जाए। भाव तथा रूप की ऐसी गहरी एकता विरल है।

    यहाँ लगभग तीन जन गीतकार फैज, शलभ श्रीराम सिंह तथा शशिकांत के तीन गीतों की ओर मैंने आपका ध्यान दिलाया है। ऐसे हजारां जनगीत हैं जो लाखों करोड़ों की जुबान पर आज भी मौजूद हैं, लेकिन जैसे प्रत्येक समय अपने संघर्ष आन्दोलन पैदा करता है उसी प्रकार वह अपने गीत जन गीत पैदा करता है। विरासत को संभाले हमें आज के नये गीत रचने और गाने होंगे जो हमें इस सदी के लिये नये संघर्षों को वाणी दे सकें। लिखा तो आज भी जा रहा है, लेकिन उसे अभी जन कण्ठ तक पहुँचने में थोड़ा वक्त लगेगा। 

२-जनगीतों का विजन : हर नारे में महाकाव्य सृजन की प्रतिश्रुति

कविता के वितान में महाकाव्य को सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। हालाँकि बदलते जीवन सन्दर्भ तथा गद्य के विकास के साथ अब महाकाव्य का स्थान उपन्यास ने ले लिया है। रैल फॉक्स ने लिखा है कि ‘‘उपन्यास आधुनिक युग का महाकाव्य  है।’’ बावजूद इसके महाकाव्य की सर्वश्रेष्ठता के भाव पर कोई खास फर्क नहीं पड़ा। अपने उदात्त भावों तथा बड़े विजन के कारण महाकाव्य की महत्ता यथार्थ रूप में न सही भावरूप में अभी भी बनी हुई है। मुक्तिबोध अपनी कविता ‘‘मुझे कदम कदम पर चौराहे मिलते हैं’’ में कहते हैं- 


मुझे भ्रम होता है कि 

प्रत्येक पत्थर में चमकता हीरा है, 

हर एक छाती में आत्मा अधीरा है, 

प्रत्येक सुस्मित में विमल सदानीरा है, 

मुझे भ्रम होता है कि 

प्रत्येक वाणी में महाकाव्य की पीड़ा है। 


     प्रतीक रूप में ही सही मुक्तिबोध महाकाव्य की सर्वश्रेष्ठता स्वीकार करते हैं हालाँकि उन्होंने स्वयं कोई महाकाव्य नहीं रचा। इसी तरह तुर्की के प्रसिद्ध कवि नाजिम हिकमत अपनी कविता में महाकाव्य का प्रतीक रूप में प्रयोग करते हैं- 


पढ़ना किसी महाकाव्य की तरह, 

सुनना किसी प्रेमगीत की तरह, 


लेकिन ठीक इसके उलट अपनी छोटी सी रचना विधान में जनगीतों ने बड़े विजन और उदात्त भावों को सृजित किया है। स्वप्न, यथार्थ, परिवर्तनकामी चेतना, पीड़ा-दुख, संघर्ष, उत्साह, उल्लास का जो सन्दर्भ जनगीतों में है वह महाकाव्यों के विस्तृत कलेवर के बावजूद कमतर दृष्टिगत होता है। माहेश्वर के चर्चित गीत की पंक्तियाँ हैं- 

‘‘सृष्टि बीज का नाश न हो हर मौसम की तैयारी है। हर नारे में महाकाव्य के सृजन कर्म को बारी है।’’ नारा वैसे भी गंभीर आचार्यों का जनगीतों के लिए आरोपित शब्द है। कविता नहीं है, यह तो नारे बाजी है। दूसरी तरफ महाकाव्य सृजित करने की प्रतिश्रुति है, न विडम्बना, लेकिन हजारों कण्ठों में रचे बसे नारे इतिहास के खास मुकाम पर जो रोल अदा करते हैं या किए हैं बड़ी से बड़ी कविता, महान कविता ईर्ष्या करे। कवि की सार्थकता जनता की जुबान पर चढ़ना और नारे बनने में है। यह अलग बात है कि आपके लिए कविता समाज बदलने का उपकरण हो। मात्र सौन्दर्य 

बोधी तराने न हों। जब भी आप साहित्य को बड़े तथा मानवीय सरोकारों से जोड़कर देखेंगे तो सहज ही आपके निष्कर्ष जनगीतों में मौजूद नारों तथा उसमें निहित महा काव्यात्मक औदात्य के पक्ष में होंगे। 

माहेश्वर के गीत को पहले देखा जाए। अपने लघु कलेवर में बड़ा विजन, शाश्वत संघर्षों के मूल्य तथा परिवर्तन कारी चेतना को अद्भुत तरीके से माहेश्वर ने पिरोया है। परत-दर परत गीत महान मानवता के पक्ष में क्रमशः नई जमीन और नये भाव विन्यासों से मेल करता है। पहली ही पंक्ति नये समाज सृजन की बुनियाद रखती है :- 

सृष्टि बीज का नाश न हो हर मौसम की तैयारी है, 

कल का गीत लिये होठों पर आज लड़ाई जारी है। 


‘सृष्टि बीज’ एक तरह से गीत की आधार रेखा है और कल का स्वप्न तथा आज का संघर्ष परिवर्तनकारी चेतना की प्रतिश्रुति। गीत के अगले चरण पर पहुँचने से पहले सृष्टि बीज शब्द तथा भाव की अर्थ व्याप्ति पर गौर करना चाहिए। यही वह सूत्र है जो गीत को बड़े विजन के साथ जोड़ देता है। बेहतर कल के लिए आज का संघर्ष, सृष्टि बीज को बचाते हुए। हैं न अद्भुत भाव तथा सोच। गीत के अगले बंद में माहेश्वर इस संघर्ष को शाश्वत संघर्ष, बेहतर दुनिया के लिए जोड़ देते हैं। ध्वंस और निर्माण जवानी की निश्छल किलकारी। ध्वंस और निर्माण शाश्वत सत्य हैं। इसलिए यह समझ संघर्ष में उतरने की प्ररेणा भी देता है वहीं इस बात की ओर संकेत भी करता है कि सिर्फ ध्वंस ही काम्य नहीं है बल्कि ध्वंस के बाद निर्माण भी हमारा ही कार्यभार है। लेकिन जवानी, युवा, निश्छलता, किलकारी, हताशा तो एक साथ निराशा के विरुद्ध समाज परिवर्तन में लगे लोगों के लिए बेहद जरूरी उपकरण हैं। जवानी की निश्छल किलकारी और परचम, परचम चमकता बूढ़ा सूरज। एक तरफ युवा जोश तो दूसरी तरफ ज्ञान अनुभव की थाती। दोनों के समवेत संघर्ष से ही नये समाज का निर्माण संभव है। 

जंजीरों से क्षुब्ध युगों के प्रणयगीत ही रणभेरी पंक्ति तो निश्चय ही गीत को महाकाव्यात्मक औदात्य प्रदान करती है। शायद माहेश्वर इसीलिए लिखते हैं कि हर नारे में महाकाव्य के सृजनकर्म की बारी है। इस रूप में जनगीत अपनी छोटी सी रचना विधान में बड़े विजन का सृजन करते हैं। निश्चय ही यह महाकाव्य तो नहीं लेकिन महाकाव्यात्मक तो है ही। 


इसीक्रम में शंकर शैलेन्द्र की प्रसिद्ध और चर्चित रचना ‘तू जिंदा है तो जिंदगी की जीत में यकीन कर’, के विजन स्वर्ग को धरती पर उतारने की बात होनी चाहिए। हजारों लोग आज भी इस गीत को गुनगुनाते रहते हैं। स्कूलों कालेजों में चर्चित समूहगान है यह गीत। स्वर्ग एक मिथकीय परिकल्पना है। बकौल गालिब-हमको मालूम है जन्नत की हकीकत लेकिन दिल को खुश रखने को ‘गालिब’ ये खयाल अच्छा है।

  जो भी हो लेकिन स्वर्ग, दुख विहीन समाज तथा जीवन का बड़ विजन है। शंकर शैलेन्द्र पहले ही साफ कर दे रहे हैं अगर कही हो स्वर्ग तो। इसलिए स्वर्ग को धरती पर उतार लाने का विजन धरती को स्वर्ग जैसा बनाने का स्वप्न मात्र है। समस्याहीन तथा दुखहीन जीवन। दरअसल जन गीतों में वर्णित चित्रित जीवन संधर्ष तथा लक्ष्य स्पष्ट रूप से आजादी समानता से लैस महान मानवीय समाज की रचना है। इस क्रम में स्वर्ग जैसा विजन  सहज भी है और शानदार भी। शंकर शैलेन्द्र इसे धरती पर उतार लाने का अह्वान करते हैं। गम और सितम के चार दिनों से पार जाने की शदियों से चली आ रही जद्दो जहद को वह स्वर देते हैं। 

बड़े स्वप्न-विजन और उसके लिए सतत् संघर्ष। नाउम्मीदी के दुश्चक्र से बाहर आना, एक जुटता उत्साह, उल्लास तथा प्रयत्न जनगीतों की महत्वपूर्ण विशेषता है। यही कारण है कि ये गीत आज भी हमारे कण्ठहार बने हुए हैं। ऐसा नहीं है कि जन गीतों में अपने समय के कटु यथार्थ का चित्रण नहीं है या गीतकार यथार्थ से मुंह चुराते हैं बल्कि अन्य कविताओं के मुकाबले यहाँ यथार्थ की तीव्रता कहीं ज्यादा ही है। श्ांकर शैलेन्द्र स्पष्ट शब्दों में लिखते हैं कि- 

बुरी है आग पेट की बुरे हैं दिल के दाग ये। या ‘जुल्म के महल’, ‘भूख और रोग के स्वराज’ तो असामानता और उत्पीड़न का कटु सत्य और यथार्थ है। जिसके लिये वे स्वर्ग को जमीन पर उतारने के संघर्ष का एहसास करते हैं। इस रूप में जीवन का भयावह शोषण उत्पीड़न से भरा मंजर और इससे मुक्ति के लिए धरती को स्वर्ग में बदलने की तीव्र आकांक्षा। जनगीत का यही काव्य सौन्दर्य है। शंकर शैलेन्द्र ने अत्यन्त कुशलता से रचा है। यथार्थ और स्वप्न-विजन का द्वन्द्व। बेहतरी के लिए संघर्ष गीत का केन्द्रीय भाव है। 

राष्ट्रीय मुक्ति संग्राम के दौर में लिखे साहिर लुधियानवी के चर्चित गीत का उल्लेख इस सन्दर्भ में बेहद महत्वपूर्ण है। साहिर बड़े शायर हैं। उनकी परिकल्पना और विजन महान है। भयावह यथार्थ और परिकल्पित स्वप्न के द्वन्द्व पर रचा गया उनका गीत यह सुबह कभी तो आएगी, अपने सम्पूर्ण रचना विधान में महाकाव्यात्मक है। साहिर आश्वस्त हैं कि यह सुबह कभी तो आएगी और यह भी कि यह सुबह हमी से आयेगी हम अर्थात शोषित पीड़ित जन। वे एक तरफ अपने समय के भयावह यथार्थ तथा दुख को याद करते हैं, भयानक शोषण उत्पीड़न की रात को रखते हैं दूसरी तरफ यह विश्वास भी व्यक्त करते हैं कि सुबह आएगी कभी तो आएगी। उनको यकीन है कि जब दुख के बादल पिघलेंगे और जब एक अनोखी दुनिया की बुनियाद उठाई जाएगी और यह संघर्षों से एक दिन संभव होगा। 

साहिर अनोखी दुनिया की बुनियाद उठाने से पहले अपने समय के भयावह यथार्थ को रखते हैं। यही वह संदर्भ है जहाँ से नई दुनिया के रचना की जरूरत बनती है। यथार्थ चित्रण के क्रम में वे सारा ध्यान पीड़ित मानवता पर रखते हैं। खासकर मजदूरों, किसानों स्त्रियों की स्थिति



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