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चीनी निवेश और राष्ट्रवाद



देश-प्रेम और राष्ट्र-भक्ति हर किसी को होता है। किसे अपना घर, परिवार, जिला, राज्य और देश नहीं प्यारा होता है। सब को प्यारा होता है। हिंदी की एक कहावत है, "नैहर का कुत्ता भी प्यारा लगता है।" हमें भी अपने देश से प्यार है। हम भी देश की आन-बान-शान पर कुर्बान हैं। लेकिन, एक बात समझ में नहीं आता है कि जब हम कोई फुलझड़ी खरीदकर लाते हैं तो लोग चिल्लाने लगते हैं कि साहब आप तो विदेशी सामान ख़रीद कर ले जा रहे हैं। यह देशद्रोह है, यह राष्ट्रद्रोह है। ऐसे लोग उन विक्रेताओं पर सवालिया क्यों नहीं होते हैं कि जनाब यह सामान मुल्क का नहीं है। इसे बेंचना अपराध है, देशद्रोह है, राष्ट्रदोह है। और असली बात यह कि विक्रेता चीनी सामान लाते क्यों है, किसकी इजाजत से लाते हैं और कैसे लाते हैं? जब परमीशन नहीं है तो ऐसे लोगों को जेल क्यों  नहीं होती है? कौन उन्हें सहायता पहुंचाता है? देशप्रेमियों-राष्ट्रवादियों को सरकार से प्रश्न करना सीखना होगा कि हमारे देश में पूँजीपतियों को चीनी सामान क्रय करने की छूट क्यों देती है?
रवीश कुमार के एक लेख का सहारा लूँ तो 2011 में भारत में विदेशी निवेश करने वाले मुल्कों में चीन का स्थान 35 वां था। 2014 में 28 वां हो गया। 2016 मे चीन भारत में निवेश करने वाला 17 वां बड़ा देश है। विदेश निवेश की रैकिंग में चीन ऊपर आता जा रहा है। बहुत जल्दी चीन भारत में विदेश निवेश करने वाले चोटी के 10 देशों में शामिल हो जाएगा। भारत के लिए राशि बड़ी है मगर चीन अपने विदेश निवेश का मात्र 0.5 प्रतिशत ही भारत में निवेश करता है। (सन्दर्भ:10 अप्रैल, 2017, हिन्दुस्तान टाइम्स ने रेशमा पाटिल इंडिया स्पेंड की रिपोर्ट से)
2011 में चीन ने कुल निवेश 102 मिलियन डॉलर का किया था, 2016 में एक बिलियन का निवेश किया, जो कि एक रिकार्ड है। जबकि इंडस्ट्री के लोग मानते हैं कि 2 बिलियन डॉलर का निवेश किया होगा चीन ने। एक अन्य आंकड़े के अनुसार चीन और चीन की कंपनियों का निवेश 4 बिलियन डॉलर है। (सन्दर्भ:10 अप्रैल,2017, हिंदुस्तान टाइम्स)
कई चीनी कंपिनयों के रीजनल आफिस अहमदाबाद में है। अब महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश और हरियाणा की तरफ़ जाने लगे हैं। फरवरी 2017 के चीनी मीडिया रिपोर्ट के अनुसार चीन की सात बड़ी फोन निर्माता कंपनियां भारत में फैक्ट्री लगाने जा रही हैं। चीन की एक कंपनी है चाइना रेलवे रोलिंग स्टॉक, इसे नागपुर मेंट्रो के लिए 851 करोड़ का ठेका मिला है। चीनी मेट्रो के बहिष्कार को सफ़ल बनाने के लिए नागपुर से अच्छी जगह क्या हो सकती है! ( सन्दर्भ:15 अक्तूबर 2016 के बिजनेस स्टैंडर्ड )
चाइना रोलिंग स्टॉक कंपनी को गांधीनगर-अहमदाबाद लिंक मेट्रो में ठेका नहीं मिला तो इस कंपनी ने मुकदमा कर दिया। सुप्रीम कोर्ट के आदेश से अब इस कंपनी को 10,733 करोड़ का ठेका मिल गया है। यह ठेका इसलिए रद्द किया गया था कि चाइना रोलिंग स्टाक चीन की दो सरकारी कंपनियों के विलय से बनी है। विशेषज्ञों ने कहा है कि जब हम इतनी आसानी से चीन को निर्यात नहीं कर सकते तो उनकी कंपनियों को क्यों इतना खुलकर बुला रहे हैं। (सन्दर्भ:4 जुलाई 2017 के बिजनेस स्टैंडर्ड)
औद्योगिक नीति और संवर्धन विभाग (डीआईपीपी) के अनुमान के अनुसार, अप्रैल 2000 और दिसंबर 2016 के बीच चीन से कुल 1.6 अरब डॉलर प्रत्यक्ष विदेशी निवेश आया था। लेकिन भारतीय बाजार विश्लेषकों और मीडिया रिपोर्टों के अनुसार यह आंकड़ा दो अरब डॉलर से भी अधिक है।
अंतर्राष्ट्रीय व्यापार सवंर्धन संबंधित चीनी परिषद को कानूनी सेवाएं प्रदान करने वाले गुड़गांव के ‘लिंक लीगल इंडिया लॉ सर्विस’ के साझेदार संतोष पई ने कहा, “भारत में वास्तविक चीनी निवेश आधिकारिक भारतीय आंकड़े से तीन गुणा अधिक है।” पई ने कहा कि भारतीय आंकड़े चीन के प्रत्यक्ष निवेश पर आधारित होते हैं, लेकिन चीन का अधिकांश प्रत्यक्ष विदेशी निवेश हांगकांग जैसे कर पनाहगाह देशों के रास्ते होता है। पिछले साल चीन के उप वित्तमंत्री शी याओबिन ने कहा था कि चीन ने भारत में कुल 4.07 अरब डॉलर का और भारत ने चीन में 65 करोड़ डॉलर का निवेश किया है। पई ने कहा, “चीन शीघ्र ही भारत के सर्वोच्च 10 निवेशकों में से एक होगा।” हालांकि छह साल पहले स्थिति अलग थी, जब देश की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था से भारत में निवेश करने वाले कम ही थे। आज भारत की सबसे बड़ी डिजिटल भुगतान कंपनी पेटीएम की 40 प्रतिशत हिस्सेदारी चीन की ई-कॉमर्स कंपनी अलीबाबा और उसके सहयोगियों के पास है।
गुजरात सरकार ने चीनी कंपनियों से निवेश के लिए 5 बिलियन डॉलर का क़रार किया है। (सन्दर्भ:22 अक्तजुवर 2016-इंडियन एक्सप्रेस)
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की महती परियोजना 'स्टैच्यू ऑफ यूनिटी' का निर्माण का ठेका गुजरात सरकार द्वारा अग्रणी इंजीनियरिंग कंपनी लार्सन एंड टुब्रो (एलएंडटी), चाइना को दिया गया है। 'स्टैच्यू ऑफ यूनिटी' भारत के पहले गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल की दुनिया की सबसे ऊंची प्रतिमा होगी। सरदार पटेल की 182 मीटर ऊंची प्रतिमा का निर्माण 3000 करोड़ रुपये की लागत से पूरा किया जाएगा। अहमदाबाद में क्या इसका कोई विरोध हुआ, क्या होगा? कभी नहीं।
चीन भारत की बड़ी आईटी कंपनियों की जासूसी कर रहा है। भारत की एक बड़ी कंपनी को 8 मिलियन डॉलर की चपत लग गई क्योंकि जिस कंपनी के बिजनेस डेलिगेशन को भारत आना था, वो चीन चली गई। जब भारतीय कंपनी ने इसका पता किया तो यह बात सामने आई कि चीन की जासूसी के कारण उसके हाथ से ये ठेका चला गया। चीनी हैकरों ने भारतीय कंपनी के सारे डिटेल निकाल लिये थे। उस समय अखबार ने लिखा था कि खुफिया विभाग मामले की पड़ताल कर रहा है? (सन्दर्भ:15 दिसंबर 2008-डीएनए, बंगलुरु, जोसी जोज़फ़ की रिपोर्ट)
कर्नाटक सरकार चीनी कंपनियों के लिए 100 एकड़ ज़मीन देने के लिए सहमत हो गई है। (सन्दर्भ:8 जुलाई 2015-द हिन्दू)।
महाराष्ट्र इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट कारपोरेशन ने चीन की दो मैन्यूफक्चरिंग कंपनी को 75 एकड़ ज़मीन देने का फ़ैसला किया है। ये कंपनियां 450 करोड़ का निवेश लेकर आएंगी। (सन्दर्भ:5 जनवरी 2016-इन्डियन एक्सप्रेस)
हरियाणा सरकार ने चीनी कंपिनयों के साथ 8 सहमति पत्र पर दस्तख़त किये हैं। ये कंपनियां 10 बिलियन का इंडस्ट्रियल पार्क बनाएंगी, स्मार्ट सिटी बनाएंगी। (सन्दर्भ:22 जनवरी 2016-ट्रिब्यून)
पिछले साल भारत में चीन के प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में काफी वृद्धि नजर आई, लेकिन पिछले साल विश्व के 164 देशों में चीन के 10 खरब युआन या 170 अरब डॉलर के विदेशी निवेश को देखते हुए यह आंकड़ा नगण्य है। अकेले अमेरिका में चीन ने 45.6 अरब डॉलर निवेश किए थे। हालांकि पिछले दो सालों में भारत और चीन के बीच नए राजनीतिक मतभेद उभरने के बावजूद भारत में चीन का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश बढ़ा है।
महाराष्ट्र के मुख्यमत्री देवेंद्र फड़णवीस की तरह हरियाणा के मुख्यमंत्री एम एल खट्टर भी चीन का दौरा कर चुके हैं. चीन का सबसे अमीर आदमी हरियाणा में साठ हज़ार करोड़ निवेश करेगा। (सन्दर्भ:24 जनवरी 2016-डीएनए)
चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा पिछले साल 46.56 अरब डॉलर पहुंच गया था। दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार भी 2015 के 100 अरब डॉलर के लक्ष्य से नीचे रहा था। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने 2014 में भारत में पांच साल में 20 अरब डॉलर के निवेश का वादा किया था। अगर यह वादा पूरा हो जाता है तो इससे भारत में चीन की आर्थिक उपस्थिति बढ़ जाएगी। लेकिन फिर भी यह शी के सबसे हालिया वादे का छोटा-सा हिस्सा ही होगा, जिसके अनुसार चीन पांच सालों में विदेश में 750 अरब डॉलर निवेश करेगा। समझ नहीं आता है कि एक समय इन्हीं कारोबारी रिश्तों को सरकार और अर्थव्यवस्था की कामयाबी के रूप में पेश किया जाता है और जब विवाद होता है कि इन तथ्यों की जगह लड़ियां-फुलझड़ियां का विरोध शुरू हो जाता है। क्या चीनी सामान का विरोध करने वाले भारत में चीन के निवेश का विरोध करके दिखा देंगे?
खबर है कि अलीबाबा पेटीएम में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाकर 62 प्रतिशत करने जा रहा है। इतना ही नहीं, चीन की चौथी सबसे बड़ी मोबाइल फोन कंपनी जियोमी भारत स्थित एक नए कारखाने में हर सेकंड में एक फोन असेंबल कर रही है।
डीआईपीपी के मुताबिक, फिर भी भारत में कुल प्रत्यक्ष विदेशी निवेश और चीन के वैश्विक विदेशी निवेश दोनों स्तरों पर चीन का भारत में निवेश तुलनात्मक रूप से कम है। विश्व की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होने के बावजूद भारत में चीन का कुल प्रत्यक्ष विदेशी निवेश केवल 0.5 प्रतिशत है। जापान की तुलना में (7.7 प्रतिशत) यह बेहद कम है।
देशभक्ति के सवाल पर आप चीन का विरोध कीजिए, उसमें कुछ ग़लत नहीं है लेकिन जो आपके घर में घुस गया है, उसका विरोध कीजिए। विरोध का लक्ष्य बड़ा होना चाहिए। हमें देश की आर्थिक नीतियों पर गौर करना सीखना होगा। हमें अपने नेताओं की कथनी-करनी के फर्क को समझना होगा। हमें नेताओं के भाषणों के निहितार्थ को समझना होगा कि इससे हमारे आर्थिक व सामाजिक जीवन पर क्या असर पड़ने वाला है।  मैं यह इसलिए लिख रहा हूँ कि ताकी आप सभी अपडेट हो सकें और समाज बहुत बड़ी हिंसक वृत्ति से बच सके। व्हाटसप और फेसबुक पर होने वाले गली-गलौज से भी आप बच सकें।
आर डी आनंद
20.07.2017


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