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kavi



कवि 


kavi



कवि हूँ , मैं देश दुनिया की छवि हूँ मैं
 हर युग को गाता हूँ मै , हर युग में जाता हूँ मैं
मुहब्बत का पैगाम देता,रवि हूँ मै

मैंने देखे है खून से सने मैदानों को
मैंने देखे है मरते वीर जवानो को
मैंने देखा है बिलखती माँओं को
मैंने देखा है विपदा की घनघोर घटाओ को
कविता में जब इन छणो को पिरोता हूँ
मैंने देखा है रोते श्रोताओ को


त्रेता से लेकर कलियुग तक

और राम के उस सतयुग तक
स्त्री को बिलखते देखा है
उस युग की द्रोपती से लेकर
इस युग की निर्भया तक को तड़पते देखा है

मैंने देखा है राजाओ के अहंकारो को 
और उन्ही राजाओ की जलती चिताओ को 
मैंने देखा है आम्भी और जयचंद जैसे गद्दारो को 
और प्रताप से लेकर भगत सिंह जैसे शूरमाओं को 

अग्नि में समाहित सती को भी देखा है 
और सावित्री जैसी हठी को भी देखा है 
मैंने देखा है झाँसी की मर्दानी को 
और सिंघनी जैसी दुर्गावती रानी को 


हर युग की अपनी एक कहानी है 


कभी गाँधी कभी जयप्रकाश की आंधी है 
तस्वीरें बनती है और बिगड़ती 
सब कवि की कविता में झलकती है 

लिखता वही हूँ जो सही होता है 
हर काल को 
चंद पंक्तियों में 
पिरोने वाला ही कवि होता है। ..... 





इन्हे भी पढ़े - कलियुग 



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