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यथार्थ गीता - धर्म सिद्धान्त - भाग १ (Yatharth Geeta Part 1)

 

धर्म सिद्धान्त

१. सभी प्रभु के पुत्र– ममैवांशो जीवलोके जीवभूत: सनातन:। मन: षष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति।। (गीता, १५/७) 
सभी मानव ईश्वर की सन्तान हैं। 

२. मानव तन की सार्थकता– अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम्।। (गीता, ९/३३) 
सुखरहित, क्षणभंगुर किन्तु दुर्लभ मानव-तन को पाकर मेरा भजन कर अर्थात् भजन का अधिकार मनुष्य-शरीरधारी को है। 

३. मनुष्य की केवल दो जाति– द्वौ भूतसर्गौ  लोकेऽस्मिन्दैव आसुर एव च। दैवो विस्तरश: प्रोक्त आसुरं पार्थ मे शृणु।। (गीता, १६/६) 
मनुष्य केवल दो प्रकार के हैं– देवता और असुर। जिसके हृदय में दैवी सम्पत्ति कार्य करती है वह देवता है तथा जिसके हृदय में आसुरी सम्पत्ति करती है वह असुर है। तीसरी कोई अन्य जाति सृष्टि में नहीं है। 

४. हर कामना ईश्वर से सुलभ– त्रैविद्या मां सोमपा: पूतपापा यज्ञैरिष्ट्वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते। ते पुण्यमासाद्य  सुरेन्द्रलोक- मश्नन्ति दिव्यान्दिवि देवभोगान्।। (गीता, ९/२०)
मुझे भजकर लोग स्वर्ग तक की कामना करते हैं; मैं उन्हें देता हूँ।
अर्थात् सब कुछ एक परमात्मा से सुलभ है।

५. भगवान की शरण से पापों का नाश– अपि चेदसि पापेभ्य: सर्वेभ्य: पापकृत्तम:। सर्वं  ज्ञानप्लवेनैव  वृजिनं  सन्तरिष्यसि।। (गीता, ४/३६)
सम्पूर्ण पापियों से अधिक पाप करनेवाला भी ज्ञानरूपी नौका द्वारा
नि:सन्देह पार हो जायेगा।

६. ज्ञान– अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थ दर्शनम्।
एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोऽन्यथा।। (गीता, १३/११)
आत्मा के आधिपत्य में आचरण, तत्त्व के अर्थरूप मुझ परमात्मा का
प्रत्यक्ष दर्शन ज्ञान है और इसके अतिरिक्त जो कुछ भी है, अज्ञान है।
अत: ईश्वर की प्रत्यक्ष जानकारी ही ज्ञान है।

७. भजन का अधिकार सबको– अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्।
साधुरेव स मन्तव्य: सम्यग्व्यवसितो हि स:।। (गीता, ९/३०)
क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति।
कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्त: प्रणश्यति।। (गीता, ९/३१)
अत्यन्त दुराचारी भी मेरा भजन करके शीघ्र ही धर्मात्मा हो जाता है एवं
सदा रहनेवाली शाश्वत शान्ति को प्राप्त कर लेता है। अत: धर्मात्मा वह है जो एक परमात्मा के प्रति समर्पित है और भजन करने का अधिकार
दुराचारी तक को है।


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