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अब घर बैठे करें असली और नकली दवा की पहचान, भारतीय छात्रों ने बनाया ऐप

Students Make Identify Fake Drugs App : माइक्रोसॉफ्ट ने दिया 10 लाख का इनाम

Students Make Identify Fake Drugs App : अमेरिकी टेक कंपनी माइक्रोसॉफ्ट ने अपनी वैश्विक प्रतियोगिता ‘इमेजिन कप 2018‘ में बिग डेटा कैटेगरी में तीन भारतीय छात्रों को पुरस्कार से सम्मानित किया है.
दरअसल बेंगलुरू के आरवी कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग में पढ़ने वाले इन तीन छात्रों ने एक ऐसा ऐप बनाया है जिसकी मदद से कोई भी आसानी से पहचान कर सकेगा कि उनके द्वारा खरीदी गई दवाइयां असली हैं या नकली.
Drugsafe‘ नाम के इस ऐप को बनाने वाले इन छात्रों का नाम चिदरुप आई, प्रतीक महापात्रा और श्रीहरि एचएस है.
बता दें कि माइक्रोसॉफ्ट की तरफ से मिले पुरस्कार में इन छात्रों को 15,000 डॉलर (करीब 10 लाख रुपये) की ईनामी राशि मिली है. हालांकि इस प्रतियोगिता के विजेता रोबोटिक प्रोस्थेटिक आर्म बनाने वाले कनाडाई छात्र रहे.
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कैसे आया ऐप बनाने का आइडिया
बतौर रिपोर्ट्स, इन तीनों छात्रों का एक दोस्त बीमार हो गया था और उसकी सेहत में सुधार नहीं हो रहा था.
फिर इन्होंने इसकी जांच करी तो पता चला कि उनके दोस्त को दी जाने वाली दवा नकली थी तब इन्हें मार्केट में फर्ज़ी दवाओं के बारे में पता चला और उससे होने वाली परेशानियों का भी एहसास हुआ.
इसके बाद उन्होंने अपने स्तर पर नकली दवाइयों के कारोबार का डाटा खंगाला तो पता चला कि भारत में मिलने वाली सभी दवाइयों में से करीब आधी फर्ज़ी होती हैं.
इसके बाद इन छात्रों ने तय किया कि वह ऐसा ऐप बनाएंगे जो बाज़ार में मिलने वाली नकली दवाओं की पहचान कर सकेगा.
कैसे काम करता है यह ऐप
Drugsafe ऐप में ऑप्टिकल कैरेक्टर रिकॉग्निशन (OCR) तकनीक का इस्तेमाल किया गया है जो तीन स्तरों पर नकली दवाइयों की पहचान करता है.
यह ऐप दवाइयों के डिज़ाइन और पैकेजिंग की तुलना असली निर्माताओं के पेटेंट और ट्रेडमार्क से करता है और साथ ही दवाइयों के कंपोज़िशन के अलावा बैच, लोकेशन, ब्लूप्रिंट और विश्वसनीयता की भी जांच करता है.
इस ऐप के ज़रिए लोग नकली दवाओं से जुड़ी शिकायत भी कर सकते हैं. आम जनता इस ऐप को आसानी से इस्तेमाल कर सके इसको ध्यान में रखते हुए छात्रों ने इस ऐप का इंटरफेस सिंपल व आसान रखा है.
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भारत में बड़ी समस्या है नकली दवा
गौरतलब है कि भारत जैसे बड़े देश में नकली दवाओं का कारोबार आसानी से हो जाता है क्योंकी यहां हर गली नुक्कड में तो डॉक्टर अपनी दुकान खोले बैठे हैं.
यही छोटे -छोटे डॉक्टर पैसे कमाने की लालच में मरीज को नकली दवाएं देते हैं या मेडिकल स्टोर से साठगांठ करके उन्हें वहां से इसे खरीदने के लिए कहते हैं.
हालांकि ये कहना पूरी तरह सही नहीं होगा कि इसमें सिर्फ छोटे डॉक्टर या मेडिकल स्टोर वाले ही शामिल हैं बल्कि कई बड़े बड़े डॉक्टर भी अपनी जेब ज्यादा  भरने के लिए  इस तरह का कारोबार करने वाले व्यापारियों से हाथ मिला लेते हैं.
ऐसे में इन युवा छात्रों द्वारा बनाया गए ऐप काफी हद तक भविष्य में मरीजों के असली और नकली का अंतर पहचानने में काम आएगा.

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