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सुप्रीम कोर्ट के प्रशासनिक और न्यायिक कार्यों से खुद को अलग नहीं करेंगे चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा

सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाने के लिए कांग्रेस के नेतृत्व में विपक्षी पार्टियां राज्यसभा के चेयरमैन वेंकैया नायडू को नोटिस दे चुकी हैं, लेकिन बड़ी संख्या में वरिष्ठ वकील और न्यायविद उनके साथ खड़े हैं। इस बीच यह जानकारी मिली है कि अभी चीफ जस्टिस खुद को सुप्रीम कोर्ट के प्रशासनिक और न्यायिक कामकाज से दूर नहीं करेंगे।

सुप्रीम कोर्ट के सूत्रों ने बताया कि जस्टिस मिश्रा मानते हैं कि उनको हटाने के लिए लाया जा रहा प्रस्ताव तुच्छ आरोपों पर आधारित, राजनीतिक विचारों से प्रेरित और उन्हें मुख्य न्यायाधीश के रूप में कर्तव्य पूरा करने से रोकने वाला है।

सूत्रों ने कहा कि पूर्व अटॉर्नी जनरल के परासरन और उनके बेटे मोहन, पूर्व सॉलिसिटर जनरल के अलावा पूर्व वरिष्ठ वकील महालक्ष्मी पवानी ने उनका समर्थन किया है। इनका मानना है कि चीफ जस्टिस ने कुछ भी गलत नहीं किया है। परासरन और पवानी के मुताबिक कांग्रेस का महाभियोग प्रस्ताव का राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल बचकाना है।

सुप्रीम कोर्ट के सूत्रों ने कहा कि चीफ जस्टिस का मानना है कि यदि राज्यसभा चेयरमैन प्रस्ताव को स्वीकार करते हैं तो वह अपने स्टैंड पर दोबारा विचार करेंगे अन्यथा वह प्रशासनिक और न्यायिक काम को पहले की तरह अंजाम देते रहेंगे। सूत्रों ने कहा कि कांग्रेस खेल कर रही है, क्योंकि वह पार्टी से जुड़े कुछ वकीलों की एक संवेदनशील केस की सुनवाई टालने की मांग चीफ जस्टिस द्वारा ठुकराए जाने से नाराज है।

आपको बता दें कि राज्यसभा के चेयरमैन को अधिकार है कि यदि वह नोटिस में दिए गए कारणों से संतुष्ट नहीं होते हैं तो प्रस्ताव को खारिज कर सकते हैं। महाभियोग के पिछले मामले में, जोकि सुप्रीम कोर्ट के जज वीरास्वामी रामास्वामी के खिलाफ लाया गया था, तब के चीफ जस्टिस ने उन्हें न्यायिक काम से अलग तभी किया था जब लोकसभा स्पीकर रबी राय ने प्रस्ताव को स्वीकार करते हुए सुप्रीम कोर्ट के जज ओ चिन्नप्पा रेड्डी की अगुआई में जांच समिति का गठन कर दिया था। कमिटी ने जस्टिस रामास्वामी को भ्रष्टाचार के 14 आरोपों में से 11 का दोषी पाया।

चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के खिलाफ नोटिस साइन करने वाले वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने तब लोकसभा में रामास्वामी का बचाव किया था। कांग्रेस ने जस्टिस रामास्वामी के खिलाफ प्रस्ताव को गिरा दिया था और इसके लिए अपने कुछ सदस्यों को वोटिंग से अलग रखा और सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज का समर्थन किया था।



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