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राजसी शौक पालने वाले कैप्टन दो बार सेना में हुए शामिल

नई दिल्ली: पंजाब के नए मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने आज शपथ लेने के बाद अपना कार्यभार संभाल लिया है. कैप्टन अमरिंदर सिंह सचिवालय में अपने दफतर में जाकर बैठे. वहां पर सब उन्हे मिलने के लिए पहुंच रहे हैं.

कैप्टन अमरिंदर सिंह के बारे में जानिए वो बातें जो उन्हें बनाती है खास.

10 साल बाद करायी कांग्रेस की वापसी
कैप्टन अमरिंदर सिंह की राजनीति 1998 से सूबे की राजनीति की दिशा तय करती रही है. हार हो या जीत पंजाब में कैप्टन को नजरअंदाज करना नामुमिकन है. 2007 की हार और फिर 2012 की हार के बाद अमरिंदर सिंह हाशिये पर चले गए थे. हालांकि 2014 में लोकसभा चुनाव में मोदी लहर के बीच अमृतसर में मौजूदा वित्त मंत्री अरूण जेतली को पछाड़ दिया. 2015 में पार्टी ने उन्हें फिर से प्रदेश अध्यक्ष बनाया. पंजाब में लगातार चौथी बार विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की कमान कैप्टन अमरिंदर सिंह के हाथों में थी औऱ खुद राहुल गांधी ने उन्हें एक रैली में भावी मुख्यमंत्री के तौर पर पेश किया.

विरोधियों से सीधे दो-दो हाथ
कैप्टन अमरिंदर सिंह अकालियों से अकालियों की भाषा में टक्कर लेने में विश्वास रखते हैं और केजरीवाल का जवाब केजरीवाल की भाषा में. जब केजरीवाल पटियाला में चुनाव प्रचार के बाद ट्वीटर पर कहा कि कैप्टन पटियाला में हार रहे हैं तो जवाब में अमरिंदर ने कहा अगर आप मेरी हार को लेकर इतने आश्वस्त हैं तो आकर मेरे खिलाफ चुनाव क्यों नहीं लड़ते. धोखेबाज कहीं के.

राजनीति में राजसी एंट्री
राजनीति में अमरिंदर की एंट्री 1980 में हुई थी .उनकी एंट्री राजसी थी बिना किसी विरोध के. अपने 37 साल के राजनीतिक करियर में अमरिंदर सिंह ने कई उतार चढॉव देखे हैं. महाराजा अमरिंदर सिंह पटियाला रियासत की 16वीं पीढी का प्रतिनिधत्व करते हैं. राजतंत्र छोड़कर लोकतंत्र में कदम रखने वाले अमरिंदर सिंह अपने पिता के बाद दूसरे शख्स हैं.

आपरेशन ब्लू स्टार के विरोध में कांग्रेस छोड़ी
1984 में ना ऑपरेशन ब्लू स्टार के विरोध में संसद की सदस्यता के साथ साथ कॉग्रेस पार्टी भी छोड़ दी थी. ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद अमरिंदर ने कॉग्रेस पार्टी छोड़ी थी. और इसकी वजह से अमरिंदर सिंह को अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता बनाये रखने के लिये काफी मशक्कत करनी पड़ी. वो भी इस हद तक की आज वो जिस पार्टी के खिलाफ मोर्चाबंद हैं उसी पार्टी यानी शिरोमणी अकाली दल में उन्हें शामिल होना पड़ा था.

गांधी परिवार से करीबी रिश्ता
नेहरू-गांधी परिवार से उनके पुराने रिश्ते रहे हैं. उन्हें वापस लाने का पूरा श्रेय श्रेय सोनिया गांधी को जाता है. सोनिया गांधी के सक्रिय राजनीति में आने के साथ ही अमरिंदर की भी कॉग्रेस में वापसी हो गई. पटियाला रियासत से सोनिया गांधी के घरेलू ताल्लुकात ने अमरिंदर सिंह की पार्टी में वापसी को काफी सहज बना दिया था. कैप्टन अमरिंदर औऱ उनके भाई मालविंदर की पढ़ाई भी उसी दून स्कूल से हुई है जहां से राजीव और संजय गांधी पढ़े हैं.

राजसी शौक
कैप्टन अमरिंदर सिंह के शौक भी कम राजसी नहीं रहे हैं. हवाई जहाज उड़ाने के शौकिन अमरिंदर सिंह शूटिंग का भी शौक रखते हैं. अमरिंदर 1963 के जून महिने में भारतीय फौज में शामिल हुये और 1965 आते –आते छोड़ दिया. तभी उनके नाम के आगे कैप्टन लग गया लेकिन 1965 में पाकिस्तान से लड़ाई के दौरान वो फिर से सेना में भर्ती हो गये और युद्द में सक्रिय भूमिका निभाई.



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