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किडनी फेल्योर के मरीजों का आहार विहार खान-पान






हम जानते हैं कि किडनी शरीर के अधिक पानी, नमक और अन्य क्षार को पेशाब द्वारा दूर करके शरीर में इन पदार्थो का संतुलन बनाने का महत्वपूर्ण कार्य करती है। किडनी फेल्योर में यह नियंत्रण का कार्य ठीक तरह से नहीं होता है। परिणामस्वरूप किडनी फेल्योर के मरीजों में पानी, नमक, पोटैशियमयुक्त खाध्य पदार्थ आदि सामान्य मात्र में लेने पर भी कई बार गंभीर समस्या उत्पन्न हो सकती है। किडनी फेल्योर के मरीजों में कम कार्यक्षम किडनी को अधिक बोझ से बचाने के लिए तथा शरीर में पानी, नमक और क्षारयुक्त पदार्थ कि उचित मात्रा बनाये रखने के लिये आहार में जरुरी परिवर्तन करना आवश्यक है। क्रोनिक किडनी फेल्योर के सफल उपचार में आहार के इस महत्व को ध्यान में रखकर यहाँ आहार संबंधी विस्तृत जानकारी और मार्गदर्शन देना उचित समझा गया है। लेकिन आपको अपने डॉक्टर के परामर्श अनुसार आहार निश्चित करना अनिवार्य है।
सी. के. डी. रोगियों में आहार चिकित्सा के क्या लाभ हैं?
क्रोनिक किडनी डिजीज की प्रगति को धीमा करना और स्थगित करना।
डायालिसिस की आवश्यकता को लम्बे समय तक टालना।
रक्त में अतिरिक्त यूरिया के ज़हरीले प्रभाव को कम करना।
उच्च पोषण की स्थिति बनाए रखना और शरीर के द्रव्य के नुकसान को रोकना।
तरल और इलेक्ट्रोलाइट की गड़बड़ी का खतरा कम करना।
ह्रदय रोग का खतरा कम करना।
आहार योजना के सिद्धान्त
क्रोनिक किडनी फेल्योर के अधिकांश मरीजों को सामान्यतः निम्नलिखित आहार लेने कि सलाह दी जाती है
पानी और तरल पदार्थ निर्देशानुसार कम मात्रा में लेना ।
आहार में सोडियम पोटैशियम और फॉस्फोरस कि मात्रा कम होनी चाहिए ।
प्रोटीन कि मात्रा अधिक नहीं होनी चाहिए। सामान्यतः 0.8 से 1.0 ग्राम / किलोग्राम शरीर के वजन के बराबर प्रोटीन प्रतिदिन लेने कि सलाह दी जाती है ।
जो मरीज पहले से ही डायालिसिस पर हों उन्हें प्रोटीन की मात्रा में वृध्दि की आवश्यकता होती है (1.0-1.2 gm/kg body wt/day)। इस प्रतिक्रिया के दौरान जो प्रोटीन का नुकसान होता है, उसकी भरपाई करने के लिए यह आवश्यक है।
कार्बोहाइड्रेट पूरी मात्रा में (35-40 कैलोरी / किलोग्राम शरीर के वजन के बराबर प्रतिदिन ) लेने कि सलाह दी जाती हैं । घी, तेल , मक्खन और चर्बीवाले आहार कम मात्रा में लेने कि सलाह दी जाती है ।
विटामिन्स की आपूर्ति करें और पर्याप्त मात्रा में आवश्यक तत्वों की पूर्ति करें। उच्च मात्रा का फाइबर आहार लेने की सलाह भी दी जाती है।
उच्च कैलोरी का सेवन
शरीर के तापमान, विकास, दैनिक गतिविधियों और शरीर के वजन को बनाये रखने के लिए पर्याप्त कैलोरी की आवश्यकता होती है। मुख्यतः कैलोरी की आपूर्ति वसा और कार्बोहाइड्रेट से की जाती है।
सामान्यतः 35 -40 कैलोरी/किलोग्राम की आवश्यकता क्रोनिक किडनी डिजीज (सी. के. डी.) के मरीज को प्रतिदिन होती है। अगर कैलोरी का सेवन अपर्याप्त हो तो शरीर में कैलोरी प्रदान करने के लिए शरीर द्वारा प्रोटीन का इस्तेमाल किया जाता है। प्रोटीन के इस विघटन से हानिकारक प्रभाव हो सकता है। जैसे कुपोषण और अपशिष्ट उत्पादों का अधिक से अधिक उत्पादन होना। इसलिए सी. के. डी. के रोगियों के लिए कैलोरी की गणना करना महत्वपूर्ण है, साथ ही वर्तमान वजन को ध्यान में रखना चाहिए।

कार्बोहाइड्रेट-

कार्बोहाइड्रेट शरीर के लिए कैलोरी का प्राथमिक स्त्रोत है। गेहूँ, दाल, चावल, आलू, फल, सब्जी, शक्कर, मधु, केक, बिस्कुट, मिठाई और पेय पदार्थ से कार्बोहाइड्रेट मिलता है। इसलिए मधुमेह और मोटापे से ग्रस्त मरीज को कार्बोहाइड्रेट का सीमित मात्रा में सेवन करना चाहिए। अच्छा हो यदि मरीज चोकर युक्त गेहूँ, बिना पोलिश किया गया चावल, जैसे जटिल कार्बोहाइड्रेट का उपयोग करे क्योंकि इससे फाइबर (रेशयुक्त) आहार मिलता है। यह शरीर के लिए लाभदायक होता है। कार्बोहाइड्रेट के लिए इन खाघ पदार्थों का एक बड़ा हिस्सा आहार में होना चाहिए। विशेष रूप से मधुमेह के रोगियों में अन्य सभी साधारण चीनी युक्त पदार्थों का कुल 20% से अधिक का सेवन नहीं होना चाहिए। जिन मरीजों में मधुमेह नहीं हैं वे अपने आहार में कैलोरी की मात्रा उन प्रोटीन युक्त खाद्य पदार्थों से ले सकते हैं जिसमें कार्बोहाइड्रेट है, जैसे फल, केक, कुकीज, जेली, मधु सीमित मात्रा में चाकलेट, बादाम, केला, मिठाई आदि।

फैट/वसा -

वसा शरीर के लिए कैलोरी का महत्वपूर्ण स्त्रोत है। प्रोटीन और कार्बोहाइड्रेट की तुलना में वसा दुगनी मात्रा में कैलोरी प्रदान करती है। असंतृप्त या अच्छी वसा, के कुछ स्त्रोत है जैतून के तेल, मूंगफली का तेल, कनोला तेल, कुसुम तेल, मछली और बादाम का तेल आदि। संतृप्त या बुरी वसा के कुछ स्त्रोत है लाल मांस, अंडा, दूध्र, मक्खन, गहि, पनीर, और चर्बी की तुलना में बेहतर है। सी. के. डी. के मरीज को अपने आहार में संतृप्त या बुरी वसा और कोलेस्ट्रॉल की मात्रा कम रखनी चाहिए क्योंकि यह ह्रदय रोग पैदा कर सकती है।

असंतृप्त वसा (Unsaturated) -

इस दौरान मोनोअनसेचुरेटेड और पॉली अनसेचुरेटेड के अनुपात को ध्यान में रखना जरुरी है। ज्यादा मात्रा में ओमेगा 6 पॉलीअनसेचुरेटेड फैटी एसिड (वसा अम्ल) लेने और ज्यादा ओमेगा 6 : ओमेगा 3 का अनुपात भी हानिकारक होता है, जबकि कम मात्रा का ओमेगा 6 : ओमेगा 3 का अनुपात लाभकारी प्रभाव डालता है। एकल तेल के उपयोग के बजाय अलग-अलग वनस्पति तेल का उपयोग करने से उस उद्देश्य को प्राप्त करना संभव है। आलू के चिप्स, डोनट्स, व्यवसाहिक तौर पर तैयार कुकीज और केक जैसे वसा के खाघ पदार्थ संभावित हानिकारक है और उनका कम से कम इस्तेमाल करना चाहिए या उपयोग में लाने से बचना चाहिए।
प्रोटीन की मात्रा को सीमित रखना

शरीर के उतकों की मरम्मत और रख रखाव के लिए प्रोटीन आवश्यक है। यह संक्रमण से लड़ने और घाव भरने में भी सहायता करता है। सी. के. डी. के रोगी जो डायालिसिस पर नहीं हैं उन्हें 20.8 gm/ kg शरीर के वजन/दिन के हिसाब से प्रोटीन लेना चाहिए। यह किडनी के कार्यों में गिरावट की दर और किडनी प्रत्यारोपण की जरूरत को आगे टाल देता है। प्रोटीन पर तीव्र प्रतिबंध से बचना चाहिए, क्योंकि इससे कुपोषण का खतरा हो सकता है।
सी. के. डी. के मरीज में अपर्याप्त भूख का होना आम बात हैं। अपर्याप्त भूख और प्रोटीन सख्त प्रतिबंध, दोनों के कारण रोगी में कुपोषण, वजन घटना, शरीर में उर्जा की कमी और शरीर में प्रतिरोधक क्षमता में कमी हो जाती है, जो भविष्य में मृत्यु के खतरे को बढ़ा सकता है। वे प्रोटीन जिनमें जैविक मूल्यों की मात्रा ज्यादा होती हैं जैसे पशु प्रोटीन (मांस, अंडा, मछली) ऐसे खाघ पदार्थों को प्राथमिकता दी जाती है। सी. के. डी. मरीज को उच्च प्रोटीन आहार जैसे अटकिन्स आहार (Atkins Diet) से परहेज करना चाहिए। इसी तरह उन प्रोटीन की खुराक एवं वे दवाइयाँ जो मांसपेशियों के विकास के लिए इस्तेमाल की जाती हैं उनसे परहेज करना चाहिए और उनका सेवन चिकित्सक या आहार विशेषज्ञ की सलाह पर ही करना चाहिए। किन्तु यदि एक बार मरीज डायलिसिस पर चला जाता हैं तो प्रोटीन की मात्रा में 1.0-1.2 ग्राम प्रतिकिलो शरीर का वजन प्रतिदिन के हिसाब से बढ़ा देना चाहिए जिससे इस प्रक्रिया के दौरान जो प्रोटीन में आती है उसकी भरपाई हो सके।
पानी तथा पेय पदार्थ
किडनी फेल्योर के मरीजों को पानी या अन्य पेय पदार्थ ( द्रव ) लेने में सावधानी क्यों जरुरी हैं ?
किडनी की कार्यक्षमता कम होने के साथ साथ अधिकतर मरीजों में पेशाब कि मात्रा भी कम होने लगती हैं। इस अवस्था में अगर पानी का खुलकर प्रयोग किया जाये, तो शरीर में पानी की मात्रा बढ़ने से सूजन और साँस लेने की तकलीफ हो सकती हैं, जो ज्यादा बढ़ने से प्राणघातक भी हो सकती हैं
शरीर में पानी की मात्रा बढ़ गई हैं, यह कैसे जाना जा सकता हैं?
सूजन आना, पेट फूलना, साँस चढ़ना, खून का दबाव बढ़ना, कम समय में वजन में वृद्धि होना इत्यादि लक्षणों की मदद से शरीर में पानी की मात्रा बढ़ गई हैं, यह जाना जा सकता हैं ।
किडनी फेल्योर के मरीजों को कितना पानी लेना चाहिए?
किडनी फेल्योर के मरीजों को कितना पानी लेना हैं , यह मरीज को होनेवाली पेशाब और शरीर में आई सूजन को ध्यान में रखते हुए तय किया जाता है। जिस मरीज को पेशाब पूरी मात्रा में होता है, एवं शरीर में सूजन भी नहीं आ रही हो , तो ऐसे मरीजों को उनकी इच्छा के अनुसार पानी - पय पदार्थ की छूट दी जाती है .
जिन मरीजों को पेशाब कम मात्रा में होता हो, साथ ही शरीर में सूजन भी आ रही हो, ऐसे मरीजों को पानी कम लेने की सलाह दी जाती हैं । सामान्यतः 24 घंटे में होनेवाले कुल पेशाब के मात्रा के बराबर पानी लेने की छूट देने से सूजन को बढ़ने से रोका जा सकता है।

सी. के. डी. के रोगियों को क्यों अपने दैनिक वजन का रिकार्ड बना कर रखना चाहिए?

रोगियों को अपने शरीर के तरल पदार्थ की मात्रा पर नजर रखने के लिए और तरल पदार्थ के लाभ या नुकसान का पता लगाने के लिए अपने दैनिक वजन का एक रिकार्ड रखना चाहिए। जब तरल पदार्थ के सेवन के बारे में दिए गए निर्देशों का सख्ती से पालन किया जाता है तब शरीर का वजन लगातार सही बना रहता है। अचानक वजन में वृध्दि रोगी को चेतावनी है की द्रव पर अधिक प्रतिबंध की आवश्यकता है। आमतौर पर वजन का घटना, तरल पदार्थ पर प्रतिबंध और अधिक पेशाब निष्कासन का संयुक्त प्रभाव होता है।

पानी कम मात्रा में लेने के लिए सहायक उपाय:
प्रतिदिन वजन नापना: निर्देशानुसार कम पानी लेने से , वजन स्थिर रहता है । यदि वजन में अचानक वृद्धि होने लगे तो यह दर्शाता है की पानी ज्यादा मात्र में लिया गया है । ऐसे मरीजों को पानी कम लेने की सलाह दी जाती है।
जब बहुत ज्यादा प्यास लगे तब भी कम मात्रा में पानी पीना चाहिए अथवा मुह में बर्फ का छोटा टुकड़ा रखकर उसे चूसना चाहिए । जितना पानी रोज पिने की छूट दी गई हो, उतनी मात्रा में बर्फ के छोटे टुकड़े चूसने से प्यास को बहुत संतुष्टि मिलती है।
आहार में नमक की मात्रा कम करने से प्यास घटाई जा सकती है। जब मुँह सूखने लगे, तब पानी के कुल्ले करके मुँह को गीला करना चाहिए एवं पानी नहीं पीना चाहिए। च्युइंगम चबाकर मुँह का सूखना कम किया जा सकता है।
चाय पीने के लिए छोटा कप तथा पानी पीने के लिए छोटा गिलास उपयोग में लेना चाहिये।
भोजन के बाद जब पानी पिया जाये, तभी दवा ले लेनी चाहिए, जिससे दवा लेते समय अलग से पानी नहीं पीना पड़े।
डॉक्टरों द्वारा 24 घंटे में कुल कितना तरल पदार्थ (द्रव) लेना चाहिए, इसकी सुचना भी मरीज को दी जाती है। यह मात्रा केवल पानी की नहीं है। इसमें पानी के अलावा चाय, दूध, दही, मट्ठा (छाछ), जूस, बर्फ, आइसक्रीम, शरबत, दाल का पानी इत्यादि सभी पेय पदार्थों का समावेश होता है। 24 घंटे में लिये जानेवाले पेय की गणना उपरोक्त सभी तरल पदार्थ एवं पानी की मात्रा को जोड़कर किया जाता है।
मरीज को किसी न किसी कार्य में संलग्न रहना चाहिए। खाली निकम्मे बैठने से प्यास की इच्छा ज्यादा एवं बार-बार होती है।
डायाबिटीज के मरीजों के खून में ग्लूकोज (शर्करा ) की मात्रा ज्यादा होने से प्यास ज्यादा लगती है। इसलिए डायाबिटीज के मरीजों में ग्लूकोज की मात्रा को नियंत्रण में रखने से प्यास कम लगती है, जो पानी कम लेने में सहायक होती है।
गर्मी के मौसम में प्यास बढ़ जाती है, अतः मरीज को ए.सी. या कूलर में रहना आवश्यक होता है।
सी. के. डी. के रोगी को तरल पदार्थों के सेवन को नियंत्रित करने के लिए क्या सावधानियाँ रखनी चाहिए?
तरल पदार्थ की कमी से बचने के लिए तरल पदार्थ की मात्रा दर्ज करनी चाहिए और डॉक्टर की सलाह के अनुसार उसका पालन करना चाहिए। हर सी. के. डी. के मरीज के लिए तरल पदार्थ की मात्रा भिन्न-भिन्न हो सकती है और यह प्रत्येक रोग के पेशाब उत्पादन और तरल पदार्थ की स्थिति के आधार पर तय की जाती है।
मरीज नापकर उचित मात्रा में ही पानी/तरल पदार्थ ले सके इसके लिये कौन सी पध्दति अपनाने की सलाह दी जाती है?
मरीज को जितना पानी लेने की सलाह दी गई हो, उतना पानी एक जग में रोज भर लेना चाहिए।
जितनी मात्रा में मरीज कप, गिलास या कटोरी में पानी पिए उतना ही पानी जग में से उसी बर्तन की सहायता से निकालकर फेंक देना चाहिए।
दूसरे दिन फिर माप के अनुसार जग में पानी भर कर उतनी ही मात्रा में पानी लेने की छूट दी जाती है।
इस प्रकार मरीज सरलता से डॉक्टर द्वारा बताई गई मात्रा में पानी और पेय पदार्थ ले सकता है।
कम नमक (सोडियम) वाला आहार :
किडनी फेल्योर के मरीजों को आहार में कम मात्रा में नमक (सोडियम) लेने की सलाह क्यों दी जाती है?
शरीर में सोडियम (नमक) पानी को और खून के दबाव को उचित मात्रा में कायम रखने में सहायक होता है। शरीर में सोडियम की उचित मात्रा का नियमन किडनी करती है। जब किडनी की कार्यक्षमता में कमी होती है, तब शरीर से, किडनी द्वारा ज्यादा सोडियम निकलना बंद हो जाता है और इसलिए शरीर में सोडियम की मात्रा बढ़ने लगती है।
शरीर में ज्यादा सोडियम के कारण होनेवाली समस्याओं में प्यास ज्यादा लगना, सूजन बढ़ना, साँस फूलना, खून का दबाव बढ़ना इत्यादि का समावेश होता है। इन समस्याओं को रोकने अथवा कम करने के लिए किडनी फेल्योर के मरीजों को नमक का उपयोग कम करना अनिवार्य है।
सोडियम और नमक में क्या अंतर है?
सोडियम और नमक दोनों को नियमित रूप से समानार्थ शब्द के रूप से इस्तेमाल किया जाता हैं। साधारण नमक या टेबल नमक सोडियम क्लोराइड है और इसमें 40 प्रतिशत सोडियम रहता है। हमारे आहार में सोडियम का प्रमुख स्त्रोत नमक है। लेकिन नमक, सोडियम का एकमात्र स्त्रोत नहीं है। उपर वर्णित कई खाघ पदार्थों में सोडियम शामिल होता है पर वे स्वाद में खारे नहीं होते है। सोडियम इन यौगिकों में छुपा रहता है।
आहार में कितनी मात्रा में नमक लेना चाहिए?
अपने देश में सामन्य व्यक्ति के आहार में पुरे दिन के लिये जानेवाले नमक की मात्रा 6 से 8 ग्राम तक होती है। किडनी फेल्योर के मरीजों को, डॉक्टर की सलाह के अनुसार नमक लेना चाहिए। अधिकांश उच्च रक्तचाप और सूजन वाले किडनी फेल्योर के मरीजों को रोज 3 ग्राम नमक लेने की सलाह दी जाती है।

किस आहार में नमक (सोडियम) की मात्रा ज्यादा होती है?

ज्यादा नमक (सोडियम) युक्त वाले आहार का विवरण
नमक, खाने का सोडा, चाट मसाला
पापड़, आचार, कचूमर, चटनी
खाने का सोडा या बेकिंग पाउडर वाले खाध्य पदार्थ जैसे बिस्कुट, ब्रेड, केक, पिज़्ज़ा, गांठिया, पकौड़ा, ढोकला, हांडवा इत्यादि
तैयार नास्ते जैसे नमकीन ( सेव, चेवड़ा, चक्री, मठरी, इत्यादि ) वेफर्स , पॉपकॉर्न, नमक लगा मूंगफली का दाना, चना, काजू, पिस्ता वगैरह
तैयार मिलने वाला नमकीन मक्खन और चीज़
सॉस, कोर्नफ्लेक्स, स्पेगेटी, मैक्रोनी वगैरह
साग सब्जी में मेथी, पालक, हरा धनिया, बंदगोभी,


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