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Pitru Paksha 2019 : कितने दिन चलते हैं श्राद्ध और क्या है इनका महत्व।

बचपन से ले कर बुढ़ापे तक सिर्फ एक ही रिश्ता है जिससे हम कभी ना टूटने वाली डोर से बंधे रहते हैं – जी हां यह रिश्ता है हमारे माता पिता का। माता पिता ही हमें इस दुनिया में ले कर आते हैं और जीवन की अंतिम श्वास तक हम उनके ऋणी रहते हैं।

हिन्दू धर्म में माता पिता को ईश्वर का स्थान दिया जाता है। जिस प्रकार कोई भी शुभ कार्य करने से पहले हम ईश्वर का आशीर्वाद लेते है, उसी प्रकार माता पिता का आशीर्वाद लेना भी बेहद आवश्यक माना जाता है।

हमारे पूर्वजों के श्रम और बलिदान के कारण ही हम ईश्वर की बनाई इस खूबसूरत दुनिया का आनंद ले पाते हैं। अपने माता पिता, दादा दादी से विरासत में मिले संस्कार और गुण ही हमें जीवन जीने का सही मार्ग दिखाते हैं। 

वैदिक काल से चली आ रही पितृ पक्ष की यह प्रथा , हमारे पूर्वजों के प्रति हमारे आदर और आभार को दर्शाती है। श्राद्ध पक्ष में अपने पूर्वजों का स्मरण करके हम उनके प्रति अपना आभार व्यक्त करते हैं।

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार श्राद्ध के दिनों में हमारे पूर्वज मोक्ष प्राप्ति के लिए हमारे निकट आने का प्रयास करते हैं। उनकी आत्मा की शांति के लिए श्राद्ध के दिनों में पाठ किया जाता है ताकि वह पितृ लोक में भ्रमण करने से मुक्त हो जाएं और उन्हें मोक्ष की प्राप्ति हो जाए ।

हमारा मार्गदर्शन करने वाले हमारे पूर्वजों को श्रद्धांजलि दे कर हम उनके प्रति अपना प्रेम व्यक्त कर सकते हैं ।

कब आते हैं श्राद्ध ?

हिंदू परंपरा के अनुसार श्राद्ध अश्विन मास के कृष्ण पक्ष में पढ़ते हैं। 16 दिन की अवधि वाले यह श्राद्ध पूर्णिमा को आरंभ होते हैं और अमावस्या के दिन समाप्त हो जाते हैं।

जिस तिथि पर माता पिता या आदि परिजनों का निधन होता है उसी तिथि पर इन 16 दिनों में उनका श्राद्ध करने से हमें उनके आशीर्वाद की प्राप्ति होती है। यदि किसी भी व्यक्ति को अपने परिजनों की मृत्यु तिथि का ज्ञान ना हो तो वो इस पर्व के अंतिम दिन अपने पितृों का श्राद्ध कर सकता है।

क्या है पितृ पक्ष करने की सही विधि ?

पितृ पक्ष में पिंड दान करना बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। ब्राह्मणों को घर बुला कर पिंड दान करवाने से हमें अपने पूर्वजों के आशीर्वाद की प्राप्ति होती है। अपने पूर्वजों का मनपसंद भोजन बना कर ब्राह्मणों को खिलाया जाता है।

परम्परा अनुसार दाल – भात, पूरी, खीर, कद्दू की सब्जी बनाना शुभ माना जाता है। ‘ भागवत गीता ‘ और ‘ भागवत पुराण ‘ का पाठ करना भी अनिवार्य  माना जाता है। अंत में दक्षिणा, फल और मिठाई दे कर ब्राह्मणों को प्रसन्न करके विदा किया जाता है।

जिस प्रकार सूर्य और चन्द्र ग्रहण के दौरान कोई भी शुभ कार्य करने की मनाही होती है, उसी प्रकार श्राद्ध के दिनों में भी कोई शुभ कार्य करने पर पाबंदी होती है। कोई भी नई वस्तु या वाहन खरीदने में भी लोग संकोच करते हैं।

श्राद्ध की अवधि के दौरान मास मच्छी खाने पर कड़ी रोक लगा दी जाती है। घर का कोई भी सदस्य इस तरह का भोजन  या और किसी प्रकार के नशे का सेवन नहीं कर सकता । यहां तक कि घर की रसोई में प्याज़ और लहसुन का इस्तेमाल करना भी वर्जित माना जाता है।

इन 16 दिनों के भीतर हमें ईश्वर के प्रति पूरी श्रृद्धा रखते हुए अपने माता पिता या अन्य निधन परिजनों को प्रेम से याद करना चाहिए। पितृों की आत्मा की शांति के लिए पीपल के पेड़ के नीचे शुद्ध घी का दिया जला कर, उनके चारों में पुष्प अर्पित करना भी बेहद शुभ माना जाता है। सच्ची आस्था से की जाने वाली यह प्रचलित विधि हमारे पितृों को मोक्ष की ओर ले जाती है।

क्या है पितृ पक्ष में पक्षियों का महत्व?

पितृ पक्ष में पशु पक्षियों का भी एक ख़ास महत्व है। माना जाता है कि श्राद्ध के दिनों में हमारे पितृ किसी ना किसी रूप में हमारे निकट आने का प्रयास करते हैं। कई बार वह हमारे स्वप्न में आ कर हमें अपने होने का एहसास दिलाते हैं तो कई बार किसी पशु पक्षी के रूप में आ कर हमें अपना आशीर्वाद देते हैं।

इसलिए श्राद्ध की अवधि के दौरान पक्षियों को भोजन का एक हिस्सा देना शुभ माना जाता है। हमारे पितृ पक्षी के रूप में आ कर इस भोजन को ग्रहण करते हैं और अपनी दृष्टि हम पर सदैव बनाए रखते हैं । ख़ास कर कौआ को भोजन खिलाने से श्राद्ध क्रम पूर्ण माना जाता है।

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