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मराठा साम्राज्य के शूरवीर और वीर शासक- संभाजी महाराज

Sambhaji Maharaj

मराठा शासक संभाजी महाराज अपनी वीरता, बलिदान और समर्पण के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने मराठा एवं हिन्दुत्व की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी। अपने पिता छत्रपति शिवाजी महाराज की तरह वे भी अपने संकल्पों के पक्के थे।

इतिहास के सबसे क्रूर शासक औरंगजेब के द्धारा काफी प्रताड़ित, अपमानित किए जाने एवं अमानवीय अत्याचार सहने के बाबजूद भी उन्होंने कभी उनके सामने आत्मसमर्पण नहीं किया।

उनकी शौर्यता और वीरता की गाथा आज भी इतिहास के पन्नों में स्वर्णिम अक्षरों से अंकित है, तो आइए जानते हैं वीर शासक संभाजी महाराज के जीवन से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण तथ्यों के बारे में-

मराठा साम्राज्य के शूरवीर और वीर शासक- संभाजी महाराज – Sambhaji Maharaj History In Hindi

Sambhaji Maharaj

संभाजी महाराज के बारे में एक नजर में- Sambhaji Maharaj Biography

नाम (Name) छत्रपति संभाजी महाराज भोसले
जन्म (Birthday) 14 मई 1657, पुरन्दर के किले में
पिता (Father Name) छत्रपति शिवाजी महाराज
माता (Mother Name) सईबाई
पत्नी (Wife Name) येसूबाई
मृत्यु (Death) 11 मार्च 1689

संभाजी महाराज का जन्म, परिवार – Sambhaji Maharaj Information

छत्रपति संभाजी महाराज 14 मई, 1657 में पुरंदर किले में वीर छत्रपति शिवाजी महाराज और सईबाई की सबसे बड़ी संतान के रुप में जन्में थे। जब वे महज दो साल के हुए, तभी उनके सिर से उनकी मां का साया उठ गया था। जिसके बाद उनका पालन-पोषण उनकी दादी यानी शिवाजी महाराज की मां जीजाबाई ने किया था।

संभाजी महाराज बचपन से ही बेहद बुद्धिमान और बहादुर बालक थे। उन्हें बचपन में छावा यानि कि ”शेर का बच्चा” कहकर बुलाया जाता था।

आपको बता दें कि संभाजी महाराज की मां सईबाई के अलावा दो सौतेली मां सोयराबाई और पुतलाबाई भी थीं। संभाजी के एक भाई राजाराम एवं रणुबाई, कमलाबाई पलकर, दीपा बाई, अम्बिकाबाई, शकुबाई, जाधव नाम की बहनें थी।

छोटी सी उम्र में ही एक राजनैतिक समझौते के तहत उनकी शादी पिलाजीराव शिरके की बेटी येशुबाई (जीवाजीबाई) से कर दी गई थी। शादी के बाद दोनों को शाहू नाम के पुत्र की प्राप्ति हुई। वहीं बाद में उनके पुत्र हिन्दू स्वराज के चौथे शासक बने थे।

आपको बता दें कि संभाजी महाराज ने अपने बचपन में काफी संघर्ष और कठिनाईयों को झेला था। राजनैतिक षणयंत्र के तहत उन्हें मुगलों के दरबार में दरबारी तक बनना पड़ा था। संभाजी महाराज की सौतेली मां सोयराबाई के कारण संभाजी के संबंध अपने पिता से खराब होने लगे।

दरअसल सोयराबाई अपने बेटे राजाराम को उत्तराधिकारी  बनाना चाहती थीं, इसलिए शिवाजी महाराज को उनके खिलाफ भड़काती रहती थीं, जिसके चलते संभाजी महाराज को अपने परिवार का भरोसा जीतने में काफी मुश्किल हुई थी।

यही नहीं संभाजी महाराज ने अपनी वीरता और बहादुरी को कई बार सिद्ध करने की कोशिश भी की लेकिन उन्हें हमेशा निराशा ही हाथ लगी।

इसके अलावा एक बार तो संभाजी महाराज को उनके पिता शिवाजी महाराज द्वारा दंडित भी किया गया था, जिसके बाद संभाजी महाराज गुस्सा होकर घर छोड़कर चले गए और मुगलों के साथ जाकर मिल गए। वहीं यह समय संभाजी महाराज के लिए सबसे मुश्किल भरा था।

हालांकि बाद में जब उन्होंने मुगलों का हिन्दुओं के प्रति दुर्व्यवहार देखा तब उन्होंने मुगलों का साथ छोड़ दिया और फिर बाद में उन्होंने इसके लिए अपने पिता शिवाजी महाराज से भी माफी मांगी।

संभाजी महाराज की शिक्षा – Sambhaji Maharaj Education

संभाजी महाराज बचपन से ही काफी बुद्धिमान और कुशाग्र बुद्धि के बालक थे। उन्हें संस्कृत समेत कई अन्य भाषाओं का अच्छा ज्ञान था। यही नहीं शास्त्रों समेत वे तलवारबाजी, घुड़सवारी, तीरंदाजी आदि में भी निपुण थे।

संभाजी महाराज द्धारा लिखी गईं रचनाएं – Sambhaji Maharaj Book

संभाजी महाराज एक कुशल और बहादुर शासक होने के साथ-साथ साहित्य और संस्कृत भाषा के अच्छे जानकार भी थे। कवि कलश से मुलाकात के बाद उनकी रुचि साहित्य की तरफ बढ़ने लगी थी।

यही नहीं संभाजी महाराज ने अपने पिता शिवाजी महाराज के सम्मान में संस्कृत में बुधचरित्र भी लिखा था। इसके अलावा संभाजी महाराज ने नखशिखांत, नायिकाभेद, बुधभूषणम, श्रृंगारिका, सातशातक समेत कई संस्कृत ग्रंथ लिखे थे।

सिंहासन पर संभाजी महाराज – King Sambhaji

संभाजी महाराज की सौतेली मां सोयराबाई ने षणयंत्र रच कर अपने 10 साल के बेटे राजाराम को राजगद्दी में बिठा दिया। जब संभाजी महाराज को इस राजनैतिक षणयंत्र का पता चला तो उन्होंने अपनी सौतेली मां सोयराबाई के भाई हम्बीराव मोहिते के साथ हाथ मिला लिया था और उनकी मदत से संभाजी महाराज ने रायगढ़ किले में जीत हासिल की और फिर अपनी सौतेली मां सोयराबाई को कैद कर लिया था।

इसके बाद 16 जनवरी 1681 को उन्होंने मराठा साम्राज्य की जिम्मेदारी संभाली। इसके बाद संभाजी महाराज के खिलाफ शिवाजी महाराज के कुछ मंत्रियों ने फिर साजिश रची और उनके सौतेले भाई राजाराम का राज्याभिषेक करने की योजना बनाई।

लेकिन संभाजी महाराज ने राजनैतिक सूझबूझ और अनुभव के चलते अपने प्रिय मित्र और संस्कृत के प्रकांड विद्वान् कवि कलश को अपना सलाहकार नियुक्त किया और सभी की साजिश को नाकाम कर दिखाया।

हालांकि कवि कलश के गैर मराठी होने की वजह से मराठा अधिकारियों ने इस बात का काफी विरोध किया। इस तरह संभाजी महाराज ने अपने शासनकाल में कुछ ज्यादा उपलब्धियों को हासिल नहीं कर सके।

संभाजी महाराज के शासनकाल के दौरान कठिन संघर्ष एवं लड़ाईयां:

जब संभाजी महाराज ने अपने पिता की मौत के बाद राजगद्दी संभाली थी, उस दौरान मुगल शासक औरंगेजब की शक्ति दक्षिण राज्यों में काफी बढ़ चुकी थी। यह मराठाओं के लिए काफी कठिन दौर था, क्योंकि औरंगेजब, मराठा राज्य पर भी अपना साम्राज्य स्थापित करना चाहता था।

वहीं औरंगेजेब की विशाल सेना के सामने संभाजी महाराज की सेना बेहद कम थी। हालांकि इस दौरान संभाजी महाराज और उनकी सेना ने बहादुरी के साथ मुगलों का सामना किया।

इस दौरान मुगल सैनिक रामसेई किले पर अपना अधिकार जमाने में तो नाकामयाब हुए लेकिन 1687 में वाई के युद्द में मराठा सैनिक, मुगलों की शक्ति के सामने कमजोर पड़ गए और इस युद्ध में संभाजी महाराज ने अपने सबसे करीबी एवं वीर सेनापति हम्बिराव मोहिते को भी खो दिया था।

वहीं इसके बाद विश्वासघात के चलते 1689 में संभाजी महाराज मुगलों के कब्जे में आ गए।

संभाजी महाराज के शासनकाल में महत्वपूर्ण उपलब्धियां:

संभाजी महाराज एक शासक रहते हुए अपने पिता जी के स्वराज की स्थापना करने के सपने को तो पूरा नहीं कर सके थे, लेकिन इस दौरान उन्होंने मुगलों को मराठाओं की शक्ति का एहसास दिलवा दिया था।

उन्होंने बहादुरी के साथ न सिर्फ मुगल शासक औरंगजेब की 8 लाख की विशाल सेना का सामना किया, बल्कि कई युद्धों में मुगलों को पराजित भी किया। वहीं महाराष्ट्र में उन्होंने औरंगजेब को कई युद्दों में व्यस्त रखा, जिसके चलते उत्तर भारत समेत कई राज्यों में हिन्दू शासकों को अपना राज्य फिर से स्थापित करने का मौका मिल गया।

यही नहीं संभाजी महाराज ने औरंगजेब द्धारा कई दर्दनाक अत्याचार सहने के बाद ही उसके सामने कभी आत्मसमर्पण नहीं किया और न ही घुटने टेके। जिसका फायदा तमाम लोगों और हिन्दु राजाओं को हुआ, क्योंकि अगर वे औरंगजेब से किसी तरह की संधि कर लेते तो औरंगजेब उत्तर भारत के कई राज्यों पर भी अपना कब्जा जमा लेने में सफल हो जाता।

हालांकि, संभाजी महाराज के अलावा उस दौरान औरंगजेब दक्षिण के कई शासकों के साथ अलग-अलग लड़ाईयों में उलझा रहा। जिसकी वजह से उत्तर भारत में हिन्दुत्व को सुरक्षित रखा जा सका।

इसके अलावा संभाजी महाराज ने अपने पिता शिवाजी महाराज के नक्शे कदम पर चलते हुए हिन्दुओं की घर वापसी और धर्म परिवर्तन के लिए कई सराहनीय कदम उठाए। मुगलों के दबाव में जबरदस्ती हिन्दू से मुस्लिम बने लोगों की फिर से घर वापसी के लिए उन्होंने कई अलग-अलग विभाग बनाए जिससे कई हिन्दू से मुस्लिम बने लोग फिर से अपना धर्म अपना सके।

क्रूर शासक औरंगजेब का संभाजी महाराज पर अत्याचार और उनकी मृत्यु – Sambhaji Maharaj Death

संभाजी महाराज पर छल से मुकर्रब खान ने अचानक आक्रमण कर दिया। जिसके चलते उन्हें और उनके प्रमुख सलाहकार कवि कलश को मुगलों द्धारा बंदी बना लिया गया।

इसके बाद उन्हें के इतिहास के सबसे क्रूर और अत्याचारी शासक औरंगजेब के पास पेश किया गया, जिसके बाद औरंगजेब ने संभाजी महाराज को इस्लाम अपनाने एवं अपनी सेना, संपत्ति एवं किलों को मुगलों के हवाले करने की शर्त रखी।

लेकिन संभीजी महाराज उसकी एक भी शर्त मानने के लिए तैयार नहीं हुए जिसके चलते गुस्से में आकर क्रूरता के लिए प्रसिद्ध औरंगजेब ने संभाजी महाराज और कवि कलश को काल कोठरी में बंद कर दिया और उन पर अत्याचार करने लगा एवं उन्हें शारीरिक यातनाएं देने लगा।

यहां तक की संभाजी महाराज को ऊंटों से बांधकर घसीटते हुए पूरे नगर और सेना के सामने घुमाया गया, मुसलमानों द्धारा उन पर थूकां गया। यही नहीं संभाजी महाराज द्वारा हिन्दू धर्म का गुणगान करने पर औरंगेजब ने संभाजी महाराज की जीभ काटकर कुत्तों के आगे फेंक दी।

उसकी हैवानियत यही नहीं रुकी उसने संभाजी की आंखे तक निकलवाने के आदेश दे दिए। यही नहीं औरंगेजेब ने धीमे-धीमे संभाजी महाराज के एक-एक कर कई अंग काट दिए और उन्हें दर्दनाक मौत देने के मकसद से उन्हें ऐसे छोड़ दिया लेकिन संभाजी महाराज ने तब भी औरंगजेब के सामने कभी हार नहीं मानी और धैर्यता के साथ उसके अत्याचार सहते रहें एवं मरते दम तक भगवान शिव के का अनुसरण करते रहे।

हालांकि कुछ दिनों बाद क्रूर शासक औरंगेजेब ने निर्दयता से संभाजी महाराज का सिर काटकर अपने किले पर टांग दिया। जिसके बाद मराठाओं ने अपने शासक के अलग-अलग शरीर के अंगों को सिलकर उनका अंतिम संस्कार किया।

इस तरह संभाजी महाराज की दर्दनाक मृत्यु के बाद मराठाओं के अंदर मुगलों के खिलाफ और अधिक आक्रोश बढ़ गया और इसके बाद सभी मराठाओं ने मिलजुल कर एवं एक होकर मुगलों के खिलाफ लड़ने का फैसला लिया।

इस तरह संभाजी महाराज जैसे वीर और पराक्रमी शासक के त्याग और बलिदान के चलते मराठाओं की एकता को बल मिला, मराठाओं की शक्ति मजबूत हुई एवं भारत में लंबे समय तक राज्य करने वाले मुगलों का अंत हुआ और भारत में हिन्दू सम्राज्य की स्थापना हुई। संभाजी महाराज को उनकी वीरता के लिए हमेशा याद किया जाएगा।

Powada (Sambhuji) Sambhaji Maharaj

देश धरम पर मिटने वाला। शेर शिवा का छावा था ।।

महापराक्रमी परम प्रतापी। एक ही शंभू राजा था ।।

तेज:पुंज तेजस्वी आँखें। निकलगयीं पर झुकी नहीं ।।

दृष्टि गयी पर राष्ट्रोन्नति का। दिव्य स्वप्न तो मिटा नहीं ।।

दोनो पैर कटे शंभू के। ध्येय मार्ग से हटा नहीं ।।

हाथ कटे तो क्या हुआ?। सत्कर्म कभी छुटा नहीं ।।

जिव्हा कटी, खून बहाया। धरम का सौदा किया नहीं ।।

शिवाजी का बेटा था वह। गलत राह पर चला नहीं ।।

वर्ष तीन सौ बीत गये अब। शंभू के बलिदान को ।।

कौन जीता, कौन हारा। पूछ लो संसार को ।।

कोटि कोटि कंठो में तेरा। आज जयजयकार है ।।

अमर शंभू तू अमर हो गया। तेरी जयजयकार है ।।

मातृभूमि के चरण कमलपर। जीवन पुष्प चढाया था ।।

है दुजा दुनिया में कोई। जैसा शंभू राजा था? ।।

                                        ~ शाहीर योगेश

“छत्रपती संभाजी महाराज की जय “

और अधिक लेख:

  • श्रीमंत थोरले बाजीराव पेशवे

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