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भारत की आजादी का सफ़र | Indian Independence Movement

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भारत में अंग्रेज आने से पहले यहाँ के हालात बेहतर थे। सभी लोग ख़ुशी से रहते थे। सभी धर्म और जाती के लोग साथ मिलकर रहते थे और आपस में भाईचारा बनाये रखते थे। लेकिन बाद में इस देश में अंग्रेज आये और पुरे देश पर धीरे धीरे कब्ज़ा कर लिया। उनके आने के बाद देश की हालत काफी ख़राब हो गयी उन्होंने देश के लोगो के गुलाम बना डाला, उनपर जुल्म करना शुरू किया।

Indian Independence Movement

भारत की आजादी का सफ़र – Indian Independence Movement

लेकिन हमारे देश के लोग भी बहादुर थे उन्होंने अंग्रेजो के इस जुल्म के खिलाफ आवाज उठाना शुरू किया और तभीसे देश को आजाद करने की लड़ाई शुरू हुई। देश की आजादी का सफर काफी लम्बे समय तक चला।

इस सफ़र में देश में क्रांतिकारियों को अंग्रेजो का डटकर सामना करना पड़ा। उसके लिए उन्हें कड़ा संघर्ष करना पड़ा। इस संघर्ष में कितने क्रांतिकारियों को अपने देश के आजादी के लिए जान देनी पड़ी। लाखों की संख्या में लोग शहीद हो गये।

इस स्वतंत्रता आन्दोलन की शुरुवात असल में सन 1857 से हुई। लेकिन यह आजादी का पहला आन्दोलन क्यों हुआ, कैसे हुआ, और किसने किया इन सारे सवालों के जवाब हम आपको देने वाले है। ऐसी क्या बात थी जिसमे सैनिको को ही इसमें सबसे पहले आगे कदम रखना पड़ा और इस लड़ाई के बाद अंग्रेज क्यों डर गए, इसकी सारी जानकारी हम आप तक पहुचाने वाले है।

इस युद्ध के बाद कौन कौन से संगठन बने जिनके चलते हमें सन 1947 में आजादी मिल सकी और किन किन क्रांतिकारियों ने देश की आजादी में क्या क्या योगदान दिया इसकी सारी जानकारी आपको मिलेगी। तो ज्यादा समय बर्बाद ना करते हुए हम आपको देश की आजादी का चुनौतीभरा सफ़र कैसा था इसकी जानकारी देने जा रहे।

इतिहास में कई बार लोगो ने भारत पर आक्रमण किये। भारत पर आक्रमण करने वाले अधिकतर लोगो के इरादे पहले से साफ़ थे, अंग्रेजो ने भी शुरुवात में व्यापार करने के माध्यम से भारत में पाव रखा और धीरे धीरे हमारे देश पर कब्ज़ा किया।

अंग्रेजो ने व्यापार करने के लिए शुरुवात में यहापर ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना की लेकिन धीरे धीरे उन्होंने अपनी इस कंपनी का विस्तार पुरे देश में किया ताकी उनकी ताकत और बढ़ सके और आखिर में वही हुआ जो अंग्रेज चाहते थे उन्होंने पुरे देश पर कब्ज़ा कर लिया।

17 वी सदी की शुरुवात में ही अंग्रेजो ने व्यापार करने के लिए भारत में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना की लेकिन कुछ समय गुजरने के बाद मतलब 1750 के करीब देश के निजी बातो में दखल देना शुरू कर दिया था।

प्लासी की लड़ाई (1757) जितने के बाद तो अंग्रेजो ने व्यापारी कम्पनी की ताकत को और बढाकर उसे हुकूमत करनेवाली संस्था में ही बदल दिया। इसके बाद अंग्रेजो ने देश के खजाने को लुटने की शुरुवात की और यहा के लोगो पर जुल्म करना शुरू कर दिया था। अंग्रेज इस देश पर केवल हुकूमत करना चाहते थे और इसलिए उन्होंने अपनी ताकत को बेहद बढ़ा दिया था।

अंग्रेजो ने इस देश को सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और राजनितिक इन सभी क्षेत्रो में देश को बढ़ी क्षति पहुचाई और इस खतरनाक क्षति के कारण ही देश की आम जनता और स्थानीय शासको ने अंग्रेजो के खिलाफ जंग शुरू कर दी थी। किसान, जनजाति के लोग और राजनितिक लोगो ने भी अंग्रेजो के खिलाफ आवाज उठाई। लेकिन 1857 में अंग्रेजो के खिलाफ जो लड़ाई लड़ी गयी वहा से ही भारत के स्वतंत्रता आन्दोलन की नीव रखी गयी।

धीरे धीरे देश के लोगो में जागरूकता फैलने लगी, दुनिया के दुसरो देशो के साथ में बातचीत होने लगी, और सबसे महत्वपूर्ण बात यह की देश के लोगो की अपनी मातृभूमि को आजाद करने की जिद दिन ब दिन बढ़ने लगी और इसका परिणाम यह हुआ की देश के सभी क्रांतिकारी एक साथ मिलकर अंग्रेजो के खिलाफ आन्दोलन करने लगे। 19 वी सदी के आखिरी में यह आन्दोलन और भी उग्र हो गया था जिसकी वजह से जीन अंग्रेजो ने देशपर 200 साल तक राज किया उन्हें आखिरकार सन 1947 में देश को छोड़ना पड़ा और भारत आजाद हो गया।

शुरुवाती दिनों में अंग्रेजो के खिलाफ लड़ी गयी कुछ लडाईया

अपने छोटेसे फायदे के लिए देश के ही कुछ शासको ने अंग्रेजो के उपनिवेशवाद के लिए सहायता की लेकिन कुछ स्थानीय शासको ने इसके खिलाफ आवाज भी उठाई। मगर इसका कुछ उल्टा ही परिणाम हुआ और यहाँ के शासक आपस में ही लड़ने लगे लेकिन इसका भी अंग्रेजो ने पूरा फायदा उठाया।

पुली थेवर, हैदर अली, टीपू सुलतान, पझासी राजा, राणी वेलु नाचियार, वीर्पंदिया कोत्ताबोम्मान, धीरन, चिन्नामलाई, मरूथू पंदियर जैसे कुछ दक्षिण भारत के शासको ने अंग्रेजो का कड़ा विरोध किया और उसके लिए उन्होंने अंग्रेजो के खिलाफ कई सारे युद्ध भी किये।

हैदर अली और धीरन चिन्नामलाई जैसे शासको ने अंग्रेजो के खिलाफ युद्ध करने के लिए मराठा शासको से मदत ली थी और उन्होंने साथ में अंग्रेजो का सामना किया।

सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक रूप से अंग्रेजो ने देश को इतनी हानि पहुचाई की जिसकी वजह से कुछ लोगो को बहुत गुस्सा आया और उन्होंने अकेले ही अंग्रेजो के खिलाफ लड़ाई लड़ी। इस तरहसे अकेले में युद्ध करनेवाले क्रांतिकारको में सिधु मुर्मू, कान्हू मुर्मू और तिलका मांझी ने बहुत ही महत्वपूर्ण योगदान दिया।

अंग्रेजो ने टीपू सुलतान जैसे बड़े शासक को यहाँ के स्थानीय शासको की मदत से ही हरा दिया। जब उन्होंने इतने बड़े शत्रु को बड़ी आसानी से हरा दिया तो उन्हें किसान और जनजाति के लोगो को हराना बहुत छोटा काम था और उसमे वो बड़ी आसानी से सफल भी हुए।

यहाँ के लोगो को हराने के लिए अंग्रेजो ने अच्छे हथियार इस्तेमाल तो किये ही लेकिन साथ में उन्होंने अपने दिमाग का इस्तेमाल करते हुए यहाँ के लोगो को एक दुसरो के खिलाफ भड़काकर अलग अलग कर दिया जिसकी वजह से यहाँ के स्थानीय लोग और भी कमजोर हो गए और अंग्रेज बड़ी आसानी से ताकत और प्रभाव को बढ़ाते गए।

अंग्रेजो ने यहाँ के लोगो की लड़ाईयो को जगहपर ही ख़तम करने की कोशिश की लेकिन लोगो के आन्दोलन बंद नहीं हुए बल्की जैसे जैसे दिन गुजरते गए वैसे वैसे क्रांतिकारियों के आन्दोलन बढ़ते गए। इसके पीछे की सबसे बड़ी वजह थी की अंग्रेज देश को आर्थिक रूप से पूरी तरह से लुट रहे थे।

1857 का स्वतंत्रता संग्राम

1857 के स्वतंत्रता आन्दोलन को ‘देश की आजदी के लिए लड़ा गया पहला स्वतंत्रता संग्राम’ कहा जाता है। इस लड़ाई होने के पीछे कई सारी वजह थी लेकिन इसके पीछे का सबसे अहम कारण था की उस समय बम और हथियारों पर गाय और सूअर का मास लगाया गया था। साथ ही ईस्ट इंडिया कंपनी भारतीय सैनिको के साथ बुरा बर्ताव करती थी और भारतीय और यूरोपियन सैनिको के बिच में भेदभाव करती थी।

भारतीय सैनिको को पता चल गया था की अंग्रेज धर्म और जाती के नाम पर भारतीय सेना में दुरी बढ़ाने की कोशिश कर रहे है और उस समय भारतीय सेना को इस बात का भी पता चल गया था की जो इनफील्ड पी 53 रायफल सेना को दी गयी थी उसमे गाय और सूअर के मास का इस्तेमाल किया जा रहा था जिसके कारण सेना और भी क्रोधित हो गयी और सेना ने अंग्रेजो के खिलाफ जंग शुरू कर दी।

क्यों की जीन कारतुसो को दातो से तोड़कर रायफल में डालना था उनपर गाय और सूअर के मास को लगाया गया था और सभी को पता है की हिन्दू लोग गाय को पवित्र मानते है और मुस्लीम लोग सूअर को पवित्र मानते है और उसे दातो से तोडना दोनों ही धर्म के खिलाफ था, लेकिन अंग्रेजो के ऐसा करने से हिंदु और मुस्लीम लोगो की धार्मिक भावनाओ के साथ खेला गया जिसकी वजह से सेना में आक्रोश और भी बढ़ गया। इससे सेना को एक बात साफ़ समझ में आयी की अंग्रेज लोग भारतीय सेना को ख्रिश्चन बनाना चाहते थे।

कारतूसो के अलावा भी कई सारी बाते थी जिसकी वजह से 1857 का स्वतंत्रता आन्दोलन हुआ था। इस लड़ाई में देश के हर कोने से कई सारे शासको ने अंग्रेजो के खिलाफ लड़ाई लड़ी। लेकिन इस लड़ाई में कम से कम 8 लाख लोग शहीद हो गये जिसमे आम जनता भी शामिल थी। इस लड़ाई का परिणाम कुछ अलग ही हुआ देश का प्रशासन जो इस्ट इंडिया कम्पनी चलाती थी उसे अंग्रेज सरकार ने अपने कब्जे में कर लिया और खुद ही देश को नियंत्रित करना शुरू कर दिया था।

संगठित आन्दोलन

1857 की एक ऐसी लड़ाई थी जो देश में पहली बार अंग्रेजो के खिलाफ लड़ी गयी सबसे बड़ी लड़ाई थी और इसी लड़ाई के कारण ही लोगो को भविष्य में अंग्रेजो के खिलाफ लड़ने की उम्मीद और प्रेरणा मिली। आगे चलकर इस लड़ाई के परिणाम भी अच्छे मिलने लगे थे और कुछ संस्थाए और संगठन भी बनाये गये जिन्होंने आगे चलकर स्वराज और अपने अधिकारों को मांगने की शुरुवात भी की।

सन 1867 में दादाभाई नौरोजी ने ईस्ट इंडिया एसोसिएशन की स्थापना की तो दूसरी और सुरेन्द्रनाथ बनर्जी ने सन 1876 में इंडियन नेशनल एसोसिएशन नाम की नयी संघटना बनायीं।

जैसे जैसे समय बीतता गया वैसे वैसे अधिकतर लोग अपने अधिकारों के प्रति सजग होने लगे जिसका परिणाम हुआ की ज्यादातर लोग एक साथ मिलकर बाते करने लगे और अपने अधिकार और स्वराज की मांग करने लगे। इन सब बातो का अच्छा परिणाम सामने निकालकर आया और सन 1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना की गयी।

कांग्रेस ने जो बाते अंग्रेजो के सामने रखी थी वो भी अंग्रेजो ने देने से इंकार कर दिया लेकिन कांग्रेस ने जो छोटी छोटी और आम मांगे रखी थी और उसे अंग्रेजो द्वारा ठुकराया जा रहा देख कई लोगो ने कांग्रेस के नेताओ के सामने कई सारे सवाल खड़े किये और उन लोगो ने एक नया रास्ता अपनाने की शुरुवात की। उनकी नयी सोच काफी आक्रामक विचारोवाली थी जिसके कारण आगे चलकर उन लोगो ने कई सारे क्रांतिकारी संगठन स्थापन किये जो केवल हिंसा और जोर जबरदस्ती पर पूरा विश्वास रखते थे।

भारतीय लोगो में जागरूकता फ़ैलाने का काम ब्राह्मो समाज और आर्य समाज जैसे सामाजिक धार्मिक संगठन ने बहुत ही अच्छे तरीके से निभाया। भारतीय लोगो के दिल में राष्ट्रवाद को जगाने का काम स्वामी विवेकानंद, रबिन्द्रनाथ टैगोर, वी। ओ। चिदंबरम पिल्लई और सुब्रमन्य भारती जैसे समाज सुधारको ने बहुत ही प्रभावशाली तरीके से किया।

राष्ट्रवाद की शुरुवात

बाल गंगाधर तिलक जैसे कट्टरपंथी नेताओ ने हमेशा भारतीयों के लिए स्वराज की मांग की। बाल गंगाधर तिलक अंग्रेजो की शिक्षा व्यवस्था को लेकर भी नाखुश थे क्यों की अंग्रेजी की शिक्षा प्रणाली भारतीय इतिहास और संस्कृति को सकारात्मक तरीके से दिखाती नहीं थी। तिलक हमेशा पूर्ण रूप से आजादी यानि स्वराज की मांग करते थे।

तिलक हमेशा कहते थे की,

“स्वराज मेरा जन्म्सिद्ध अधिकार है और मै उसे लेकर ही रहूँगा”

उनके इस विचार से देश के सभी लोग और क्रांतिकारी प्रेरित होते थे। बिपिन चन्द्र पाल और लाला लजपत राय जैसे नेताओ की सोच भी बाल गंगाधर तिलक की सोच से पूरी मिलती थी इसीलिए वो दोनों भी तिलक के साथ में मिलकर काम करते थे।

लोग इन तीनो को “लाल-बाल-पाल” नाम से बुलाते थे लेकिन कुछ समय गुजरने के बाद इन तीनो को कांग्रेस में से निकाल दिया गया था क्यों तीनो क्रांतिकारी हिंसा के जरिये ही देश को आजाद करना चाहते थे। लेकिन इन तीनो क्रांतिकारियों ने देश के लोगो के दिमाग को पूरी तरह से राष्ट्रवाद से भर दिया था।

बंगाल का विभाजन

आजादी मिलने से पहले जो बंगाल था वह फ्रांस देश के इतना बढ़ा था इसिलए सन 1905 में तत्कालीन वाइसराय और गवर्नर जनरल लार्ड कर्जन ने बंगाल का विभाजन करने का आदेश दिया था। विभाजन को सही ठहराने के लिए उसने कहा की ऐसा करने से बंगाल का प्रशासन चलाने में आसानी होगी और हिन्दू मुस्लीम लोगो में तनाव भी कम हो जाएगा।

लेकिन भारतीय क्रांतिकारियों को पूरा विश्वास था की राष्ट्रीय आन्दोलन की तीव्रता को कम करने के लिए और उनकी ताकत को कमजोर करने के लिए ही बंगाल का विभाजन किया गया। क्रांतिकारियों को इस बात का भी पता था की अंग्रेज हिन्दू और मुस्लीम लोगो के बिच दरार पैदा करना चाहता थे जिससे की हिंदु और मुसलमान हमेशा के लिए अलग हो जाए।

अंग्रेजो के इस फैसले का कड़ा विरोध करते हुए लोगो ने अंग्रेजो के कई सारे उत्पाद और अखबारों का बहिष्कार किया। लोगो ने अंग्रेजो के इस फैलसा का इतना कड़ा विरोध किया की उन्हें इस फैसले को रद्द करना पड़ा और सन 1911 में बंगाल को फिर से एक बार एक कर दिया गया।

लेकिन कुछ समय गुजरने के बाद ही बंगाल को भाषा के आधार पर विभाजित किया गया। बंगाल की आम जनता और राजनितिक दृष्टि से बंगाल का विभाजन वहा के लोगो के लिए एक तरह से अमिट हो गया था जिसे कभी भी भुलाया नहीं जा सकता।

मुस्लीम लीग का जन्म

सन 1886 में इस्लामी सुधारवादी और दार्शनिक सय्यद अहमद खान ने अखिल भारतीय मुस्लीम शैक्षणिक सम्मलेन की स्थापना की थी। भारतीय मुस्लिमो को अच्छी शिक्षा मिल सके इस उद्देश्य से संस्था की स्थापना की गयी थी। शिक्षा को और बेहतर बनाने के लिए यह संस्था साल में कुछ सम्मलेन भी आयोजित करती थी ताकी उनपर बातचीत हो सके।

सन 1906 में जब इस संस्था ने एक सम्मेलन आयोजित किया तो उसमे एक आल इंडिया मुस्लीम लीग नाम की राजनितिक पार्टी बनाने का फैसला लिया गया। मुस्लीम लीग पार्टी बनने के बाद में इस पार्टी ने देश के सभी मुस्लीम लोगो के अधिकारों की मांग करना शुरू कर दिया।

आगे चलकर धीरे धीरे मुस्लीम लीग भी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (इंडियन नेशनल कांग्रेस) के उद्देश को पूरा करने के लिए काम करने लगी। लेकिन उन्हें बाद में समझ आया की कांग्रेस केवल हिन्दू लोगो के लिए ही काम कर रही है मुस्लीम लोगो के लिए काम करने में नाकाम हो रही है।

धीरे धीरे बहुत सारे मुस्लीम लोग मुस्लीम लीग की बातो पर विश्वास करने लगे मुस्लिमो के लिए एक और नयी पार्टी बनाने पर सोचने लगे जिस पार्टी में मुस्लीम लोगो की संख्या अधिक हो।

राष्ट्रीय आन्दोलन और पहला विश्व युद्धउन्नीसवी सदी के आखिर तक राष्ट्रीय आन्दोलन काफी तीव्र हो चूका था और बीसवी सदी में इस आन्दोलन में लोग बड़ी संख्या में जुड़ने लगे थे। स्वराज हासिल करने के लिए लोग अधिक संख्या में राष्ट्रीय नेता और कांग्रेस में शामिल होने लगे थे। अंग्रेज सरकार के खिलाफ आवाज उठान के लिए इन राष्ट्रीय आन्दोलन का नेतृत्व लाला लजपत राय, बाल गंगाधर तिलक, बिपिन चन्द्र पाल और वी ओ चिदंबरम पिल्लई जैसे महान नेताओ ने किया।

लेकिन लोगो का आन्दोलन इतना तीव्र होने के बाद भी उस समय इंडियन नेशनल कांग्रेस अंग्रेज सरकार को ही महत्व दे रहा था, लेकिन लोगो की आन्दोलन में बढती संख्या को देखकर दुसरे लोग भी प्रभावित होने लगे थे।

पहला विश्व युद्ध शुरू होने से पहले ही अंग्रेज सरकार ने कहा था की अगर भारत के लोग पहले विश्व युद्ध में अंग्रेज सरकार की मदत करेंगे तो वो भारत के लोगो के फायदे के लिए बहुत कुछ करेंगे। इस युद्ध में भारत के 1.3 मिलियन सैनिको ने हिस्सा लिया था और उन्हें अंग्रेजो की तरफ़ से लड़ने के लिए मिडिल ईस्ट, यूरोप और अफ्रीका में भेजा गया था।

इस युद्ध में अंग्रेजो की मदत करने के लिए देश के कुछ रियासत के शासको ने युद्ध में सेना के लिए पैसा, खाने के लिए भोजन और गोलाबारूद देकर मदत की थी।

महात्मा गांधी का आगमन

महात्मा गांधी जब दक्षिण अफ्रीका में रहते थे तो वे अहिंसा के रास्ते पर ही चलते थे इसी अहिंसा के बलबूते पर उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में कई सारे आन्दोलन भी किये थे औ

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