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समाजसुधारक चत्ताम्पी स्वामिकल | Chattampi Swamikal

Chattampi Swamikal – चत्ताम्पी स्वामिकल दक्षिण भारत के एक हिन्दू ऋषि और प्रसिद्ध समाजसुधारक थे। दक्षिण भारत में सुधारना लाने के लिए उन्होंने जीवनभर प्रयास किये। समाज की उन्नति के लिए उन्होंने कई सारे आन्दोलन भी किये थे। इसके साथ ही अलग अलग जगहों पर विभिन्न संघटना भी स्थापन की थी। इन संघटना की मदत से वो समाज को प्रगतिपथ पर लाने की कोशिश करते थे।

Chattampi Swamikal

समाजसुधारक चत्ताम्पी स्वामिकल – Chattampi Swamikal

उस समय देश में लोग जाती और धर्म के नाम पर भेदभाव करते थे। इस असमानता को मिटाने के लिए उन्होंने अपने पुरे जीवन में कई सारे आन्दोलन भी किये थे। हिन्दू धर्म में मौजूद अनिष्ट प्रथा का उन्होंने कड़ा विरोध भी किया था। चत्ताम्पी स्वामिकल ने अध्यात्म की मदत से समाज को बेहतर बनाने की पूरी कोशिश भी की थी।

चत्ताम्पी स्वामिकल का पूर्वी जीवन – Chattampi Swamikal Biography

चत्ताम्पी स्वामी का जन्म 25 अगस्त 1853 में दक्षिण त्रावनकोर के कोल्लूर में हुआ था। उनके पिताजी वासुदेव नाम्पुथिरी एक मवेलिक्कारा के नम्बूदिरी ब्राह्मण परिवार से थे और उनकी माँ नंगाम्मा’ कन्नामूला के नायर परिवार से थी। अय्यप्पन उनका बचपन का नाम था लेकिन बचपन में उन्हें कुंजन नाम से बुलाया जाता था।

कुंजन नाम का मतलब होता है की छोटा बच्चा। बचपन में उनके माता पिता उन्हें स्कूल भेजने में सक्षम नहीं थे इसीलिए वो उनके पड़ोस के बच्चो की मदत से ही पढना लिखना सिख गए थे। उन्होंने संस्कृत भाषा कुछ इसी तरह से सीखी थी। उनके घर के बाजु में ब्राह्मण परिवार रहता था और उनके यहाँ संस्कृत पढाया जाता था। वो दूर से ही ध्यान देकर संकृत के वचन सुनते थे।

उनकी संस्कृत सिखने की तीव्र इच्छा को देखकर उनके पड़ोस के चाचा पेत्तयिल रमण पिल्लई असन ने उन्हें बिना कोई पैसा लिए मुफ्त में संस्कृत पढाया। वहिसे से उन्होंने अपना चत्ताम्पी नाम कमाना शुरू किया था।

अन्य धर्मो का अभ्यास

सुब्बा जतापदिकल से शिक्षा प्राप्त करने के बाद में उन्होंने ख्रिश्चन पुजारी से काफी लम्बे समय तक शिक्षा ली। दक्षिण तमिलनाडू के पुराने चर्च में वो वहाके ख्रिश्चन पुजारी के हर काम में सहायता करते और उनसे ही ख्रिश्चन धर्म और तत्वज्ञान सिखा करते थे। उसके बाद में वो किसी बुजुर्ग मुस्लीम के साथ में रहते थे, उसकी मदत से उन्होंने कुरान और सूफी रहस्य के बारे में बहुत सारी पढाई की।

मुस्लीम बुजुर्ग के साथ रहकर वो कुरान को बहुत अच्छे तरह से पढना सिख गए थे। दक्षिण तमिलनाडु में वो कई महीनो तक अवदुतो के साथ इधर उधर भटकते रहे और बाद में फिर उन्होंने पुरे भारत में भ्रमण किया। उन दिनों उनके एक बात समज में आयी की सारे धर्मं एक ही बात बताते है।

खुद की अनुभूति

उनका भ्रमण पूरा होने के बाद और उनकी शिक्षा की तृष्णा पूरी होने के बाद मे खुद की खोज करने लगे थे, खुद की अनुभूति उनको चाहिए थी। इसके लिए वो वहा के वादावीस्वरम अवदुत के साथ मे कई महीनो तक थे और उस दौरान उनका बाहरी दुनिया से सम्बन्ध नहीं था। ऐसा माना जाता है की उस समय के अवदुतो के पास में चमत्कारिक शक्तिया थी और भगवान तक पहुचने का वैज्ञानिक तरीका उन्हें पता था। जब वो केरल वापस पहुचे तो वो एक महान संत और विद्वान व्यक्ति बन चुके थे।

मुख्य अनुयायी

नारायण गुरु, नीलकंठ तीर्थपद, और तिर्थपद परमहंस स्वामिकल के मुख्य अनुयायी थे। सन 1882 में वामनपुरम के अनियूर मंदिर में स्वामिकल नानू आसन से मिले थे और बादमे उन्होंने अपना नाम बदलकर नारायण गुरु रख दिया था। आसन केवल 3 साल से स्वामिकल से उम्र में छोटे थे और अध्यात्मिक मार्गदर्शन की खोज कर रहे थे। उस समय स्वामिकल योग और अध्यात्म में पारंगत थे और इसकी वजह से ही नारायण गुरु उनके शिष्य बन गए थे मगर दोनों के स्वभाव बिलकुल अलग थे।

उस समय नानू आसन बहुत कम बोलते थे मगर उनके गुरु स्वामिकल अधिक बोलते थे और ज्यादातर खुलकर बोलने में ही विश्वास रखते थे। वो दोनों साथ में कई महीनो एक साथ ही रहते थे और साथ में भ्रमण भी करते थे। स्वामिकल ने उनके शिष्य आसन को सभी तरह की शिक्षा प्रदान की और उन्हें बालसुब्रमान्य का मंत्र भी दिया था। उस समय आसन पूरी शिक्षा धारण कर रहे थे और बाद में वो एक समाजसुधारक बन गए थे।

उसके बाद में स्वामिकल आसन को उनके गुरु अय्यावु स्वामिकल से मिलवाने गए थे। आसन ने कुछ समय तक अय्यावु स्वामिकल के मार्गदर्शन में पढाई की और बाद में फिर तमिलनाडु के कई सारे विद्वान लोगो से मिले। उस समय नारायण गुरु ज्ञान की प्राप्ति और योग के लिए कड़ी मेहनत करते थे। जब वो पहली बार भ्रमण करने निकले तो वो उनके गुरु स्वामिकल के साथ में गए थे। उन्होंने खुद की अनुभूति होने के लिए और ध्यान करने के लिए अरुविप्पुरम का भ्रमण किया था।

इसके बाद ही उन्हें सभी नारायण गुरु कह के बुलाने लगे थे। स्वामिकल वहापर अधिक समय तक नहीं रहे और वो वहासे चले गए लेकिन पुरे जीवन में दोनों एक दुसरे के संपर्क में थे। जब उन्हें समज में आया की उनके स्वामीजी ने समाधी ली तो उन्होंने अपने गुरु के लिए एक कविता भी लिखी थी।

सन 1893 में स्वामिकल उनके दुसरे शिष्य तिर्थपद से मिले थे। उनका यह शिष्य संस्कृत में विद्वान था और साप के काटने पर उसका उपचार करता था। अपने गुरु से प्रेरणा लेकर उसने अद्वैत विषय पर बहुत सारे ग्रंथ लिखे थे। उसने कई सारे धार्मिक और सामाजिक सुधारनाये की और उनसे जुडी एक किताब भी तयार की थी। उनके इस महान शिष्य की मृत्यु सन 1921 में हुई थी, मगर उनके स्वामी के उसके समाधी पीठ के ऊपर एक शिवलिंग की स्थापना भी की थी। स्वामिकल ने केवल इसी मंदिर की निर्मित की थी।

सन 1898 में तिर्थपद परमहंस स्वामी के शिष्य बन गए थे। उन्होंने भी केरल में जाती व्यवस्था को ख़तम करने का काफी प्रयास किया था। उन्होंने वहापर कई सारे आश्रम बनाये थे और वहापर आनेवाले सन्यासियों के लिए तिर्थपद की व्यवस्था की थी। जो भी सन्यासी स्वामी की बताई गयी शिक्षा को ग्रहण करना चाहते थे, वो सभी यहाँ के आश्रम में रहते थे।

स्वामी चिन्मयानन्द, स्वामी अबेदानंद और कई संत बताते है की चत्ताम्पी स्वामिकल की वजह से ही उन्होंने अपने जीवन में अध्यात्मिक ज्ञान की प्राप्ति की। स्वामी के घर गृहस्थी वाले भी कई सारे शिष्य थे जैसे की बोधिस्वरण, पेरुनेल्ली, कृष्णा वैद्यन, वेलुठेरी केसवन, वैद्यन कुम्बलाथ, संकू पिल्लई अदि। उनके कई सारे सन्यासी शिष्य भी थे जैसे की नीलकंठ तिर्थपद और तिर्थपद परमहंस। इन्होने केरल में सुधारना लाने बहुत ही महत्वपूर्ण योगदान दिया है।

चत्ताम्पी स्वामिकल की मृत्यु – Chattampi Swamikal Death

मृत्यु होने से कुछ समय पहले स्वामिकल कोल्लम जिले के पनामाना में रहते थे। आखिरी दिनों में उनकी तबियत काफी ख़राब हो गयी थी और उन्होंने कोई भी दवा लेने से इंकार भी कर दिया था जिसके चलते 5 मई 1924 को उनकी मृत्यु हो गयी। पनामाना में ही उनकी समाधी की गयी थी।

चत्ताम्पी स्वामिकल ने वेदों से जुड़े पुराने हिन्दू धर्मं ग्रंथ में बताये गए विचारो का कड़ा विरोध किया। जिस समय केरल में नारायण गुरु समाज को बेहतर करने की कोशिश कर रहे थे उसी समय चत्ताम्पी स्वामिकल भी हिन्दू धर्मं की अनिष्ट प्रथा और जाती में सुधार लाने के लिए काफी प्रयास कर रहे थे। उन्होंने महिलाओ की उन्नति के लिए के भी कई आन्दोलन किये और उन्हें सभी क्षेत्रो में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया।

स्वामिकल हमेशा शाकाहारी भोजन करने पर ही जोर देते है और वो अहिंसा में ही विश्वास रखते है। स्वामिकल का मानना था की धर्म चाहे कितने भी हो लेकिन वो सभी हम सबको एक ही जगह पर ले जाते है। चत्ताम्पी स्वामिकल ने अपन पुरे अध्यात्मिक जीवन मे केरल के कई सारे लोगो के साथ में अच्छी पहचान बनाई थी, वो हमेशा उनके संपर्क में रहते थे। उन्होंने अध्यात्म, इतिहास और भाषा विषय पर कई सारी क़िताबे लिखी है।

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