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मदर्स डे और मित्र प्रशांत श्रोत्रीय की कलम


मैं सुबह से देख ही रहा था - तमाम आये हुए संदेशों को ,वाट्सअप और फेसबुक पर -
तमाम दूसरे लोगों और समूहों को फॉरवर्ड कर हम समारोहपूर्वक मदर्स डे मना रहे
थे। ये हमारे फॉरवर्ड होने की निशानी भी कही जा सकती है। पर ऐसा करने में कोई
बुराई भी नहीं है। -- यहाँ  मेरा सवाल दूसरा है।  माँ के प्रति श्रद्धा व्यक्त
करने के लिए हमें ' दिवस विशेष ' की आवश्यकता कब से पड़ने लग गयी ? -- और अगर
पड़ने लग गयी है तो मान लीजिए , हमने माँ की ममता और प्यार को कमतर आंकना शुरू
कर दिया है। ये लगभग - लगभग उस प्रेम और वात्सल्य का अपमान है ,  जिसका
स्तुतिगान हमने अलसुबह से शुरू किया है और मध्यरात्रि तक जारी रखेंगे। मुझे एक
माँ और याद आ रही है , क्यों कि उनके बच्चे विश्व विद्यालयों में भूख हड़ताल पर
हैं। वो हमारे बच्चे नहीं हैं , इसलिए हम उस तकलीफ को उस  तरह से नहीं समझ
पाएंगे। सिर्फ उनकी माँ समझेगी। --- पहले नहीं थी , पर अब तो सरकार में
बाकायदा ' स्मृति ' है। तो कम से कम बे मन से सही , बच्चों से बात तो की जानी
चाहिए  थी - आज के दिन तो ।  पर नहीं।  ये राजनीति का गर्वीला स्वभाव है।  --
ये अजीब बात है कि लगातार बढ़ती शक्ति , सुनने की शक्ति को कमज़ोर कर देती है।
अगर ऐसा नहीं है , तो महज गाड़ी ओवरटेक कर लेने  पर किसी माँ को अपने बेटे की
लाश पर बिलखना नहीं पड़ता। मगर वो गाड़ी जिसे ओवरटेक किया गया - विधायक की थी।
भले ही बिहार में हो - विधायक के बेटे के पास राजनीतिक दम्भ था , गर्व था।
ये गर्वीली राजनीति हमें कहाँ ले कर  जा रही है , कि हमने भूखे बच्चों की
बातें सुनना भी बंद कर  दिया है।.... ये अजीब सी बात है कि माँ रोटी की बातें
तुरंत सुन लेती है।  जब चूल्हे अकाल और सूखे में भरभराकर निष्प्राण होने लगते
हैं, मां रोटी ढूंढती है।  मां और रोटी गहरे से जुड़े हैं। एक अकेली मेरी ही
मां तो नहीं जो चिंतित हो! प्रकृति की सारी माएं रोटी जुटाने के लिए प्रतिबद्ध
हैं।  अली सरदार जाफरी याद आ रहे हैं -- "चांद से दूध नहीं बहता है -  तारे
चावल हैं न गेंहू न ज्वार - वरना मैं तेरे लिए चाँद सितारे लाती - मेरे नन्हे,
मिरे मासूम - आ,कि मां अपने कलेजे से लगा ले तुझको - अपनी आगोश-ए-मुहब्बत में
सुला ले तुझको।  ----- प्रशांत श्रोत्रिय


my post about mother's day 6 years ago.

http://chetna-ujala.blogspot.in/2010/05/maan-ke-charno-me.html


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