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श्रीराम शर्मा आचार्य जी का जीवन परिचय | Pandit Shriram Sharma Acharya Biography in Hindi

समाज सुधारक और लेखक पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य जी का जीवन परिचय और सुविचार | Pandit Shriram Sharma Acharya Biography and Quotes

भारत के युग पुरुष पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य ने अपना जीवन समाज की सांस्कृतिक नैतिक और चारित्रिक उत्थान के समर्पित किया हैं. ये वही युग ऋषि हैं, जिन्होंने अखिल भारतीय गायत्री परिवार की स्थापना की हैं. इन्होने अपने कार्यो से आधुनिक और प्राचीन भारत का समन्वय किया हैं. वे एक स्वतंत्रता सेनानी के साथ ही वह एक अध्यात्म विज्ञानी, दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक, लेखक, समाज सुधारक भी थे.

पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य जी का जन्म, जीवन और मृत्यु (Pandit Shriram Sharma Acharya Biography)

पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य का जन्म 20 दिसंबर 1911 को उत्तर प्रदेश के आगरा जिले के आँवलखेड़ा गांव में हुआ था. इनके पिताजी का नाम श्री पं रूप किशोर जी शर्मा था. इनके पिताजी जमीदांर घराने के राजघरानो के राजपुरोहित, विद्वान, भागवत कथाकार थे. पंडित जी की माता का नाम दंकुंवारी देवी था. वे एक धार्मिक महिला थी. उनकी पत्नी का नाम भगवती देवी शर्मा था. पंडित जी का बचपन गांव में ही बीता. बचपन से उनका झुकाव अध्यात्म और साधना की ओर अधिक था. एक बार वे हिमालय की ओर भाग गए थे. बाद में पकडे जाने पर उन्होंने कहा कि हिमालय ही उनका घर हैं और वे वही रहना चाहते हैं.

पंडित मदन मोहन मालवीय जी ने उन्हें काशी में “गायत्री मंत्र” की शिक्षा दी. पंडित मदन मोहन बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के संस्थापक हैं. पंडित श्री राम शर्मा नर सेवा को ही नारायण सेवा मानते थे. वे जात- पात में विश्वास नहीं रखते थे. वे कुष्ठ रोगियों की भी सेवा करते थे. पंडित जी ने बेरोजगार युवाओ और नारियो को अपने पैरो पर खड़ा करने के लिए अपने गांव में एक बुनताघर स्थापित किया. 2 जून 1990 को गंगा दशहरे के दिन पंडित जी ब्रम्हलीन हो गए.

भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन में सहभागिता

भारत के परतंत्र होने की पीड़ा उन्हें बहुत सताती थी. वर्ष 1927 से 1933 तक स्वतंत्रता संग्राम आन्दोलन में अपनी सक्रिय भूमिका निभाई. वे घरवालो के विरोध क्वे बावजूद कई समय तक भूमिगत कार्य करते रहे और समय आने पर जेल भी गए. जेल में भी अपने साथियों को शिक्षण दिया करते थे और वे वहां से अंग्रेजी सिखकर लौटे. जेल में उन्हें देवदास गाँधी, मदन मोहन मालवीय, और अहमद किदवई जैसे लोगो का मार्ग दर्शन मिला.

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राजनीतिक जीवन (Pandit Shriram Sharma Acharya Political Career)

श्री गणेशशंकर विद्यार्थी से पंडित जी बहुत प्रभावित हुए थे. इनके ही कारण पंडित जी राजनीति में आये थे. राजनीती में प्रवेश करने के बाद पंडित जी महात्मा गाँधी के अत्यन्त निकट आ गए थे. 1942 में भारत छोड़ो आन्दोलन के समय शर्मा जी को मध्यप्रदेश व उत्तरप्रदेश का प्रभारी नेता नियुक्त किया गया था. इसके पहले मैनपुरी षड़यंत्र में उनकी सहभागिता थी.

शर्मा जी ने 1942 में आगरा षड़यंत्र केस में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. इस केस का नाम king emperor v/s shree ram sharma था. इस मुक़दमे में पंडितजी के बड़े पुत्र रमेश कुमार, उनकी बेटी कमला व उनके बड़े भाई बालाप्रसाद शर्मा भी पकडे गए थे. वर्ष 1945 के अंत में सभी लोग रिहा हो गए थे. इस मुक़दमे के दौरान पंडित जी तीनो पुत्रो की मृत्यु हो गयी थी.

इस दौरान पंडित जी के साथ भी गलत व्यवहार व यातनाये दी गई जिससे उनका कान का पर्दा फट गया था. जेल से छूटने के बाद वे गांधीजी से मिलने गए थे. गांधीजी की हत्या के बाद वे लेखन के कार्य में अधिक रहे. ग्लूकोमा के कारण पंडित जी की दोनों नेत्रों की ज्योति चली गयी थी. जिसके बाद नेत्रहीन अवस्था में पांच पुस्तके बोलकर लिखी.

पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य जी के सुविचार(Pandit Shriram Sharma Acharya Quotes)

1. अवसर तो सभी को जिन्‍दगी में मिलते हैं, किंतु उनका सही वक्‍त पर सही तरीके से इस्‍तेमाल कुछ ही कर पाते हैं.

2. इस संसार में प्यार करने लायक दो वस्तुएँ हैं-एक दुख और दूसरा श्रम. दुख के बिना हृदय निर्मल नहीं होता और श्रम के बिना मनुष्यत्व का विकास नहीं होता.

3. जब हम ऐसा सोचते हैं की अपने स्वार्थ की पूर्ती में कोई आंच न आने दी जाय और दूसरों से अनुचित लाभ उठा लें तो वैसी ही आकांक्षा दूसरे भी हम से क्यों न करेंगे.

4. जीवन में दो ही व्यक्ति असफल होते हैं- एक वे जो सोचते हैं पर करते नहीं, दूसरे जो करते हैं पर सोचते नहीं.

5. विचारों के अन्दर बहुत बड़ी शक्ति होती है . विचार आदमी को गिरा सकतें है और विचार ही आदमी को उठा सकतें है . आदमी कुछ नहीं हैं .

6. लक्ष्य के अनुरूप भाव उदय होता है तथा उसी स्तर का प्रभाव क्रिया में पैदा होता है.

7. लोभी मनुष्य की कामना कभी पूर्ण नहीं होती.

8. मानव के कार्य ही उसके विचारों की सर्वश्रेष्ठ व्याख्या है.

9. अव्यवस्तिथ मस्तिष्क वाला कोई भी व्यक्ति संसार में सफल नहीं हो सकता.

10. जीवन में सफलता पाने के लिए आत्मा विश्वास उतना ही ज़रूरी है ,जितना जीने के लिए भोजन. कोई भी सफलता बिना आत्मविश्वास के मिलना असंभव है.

11. मैं इस संसार का सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति हूँ.

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