Get Even More Visitors To Your Blog, Upgrade To A Business Listing >>

खिंच के महबूब के दामन की तरफ़ - अर्श मलसियानी

खिंच के महबूब के दामन की तरफ़ आ गए और भी उलझन की तरफ़ तुम छुपाते रहो कितना उस को बिजलियाँ आएँगी ख़िर्मन की तरफ़ हर तरफ़ नूर का तड़का देखा कौन आया मिरे आँगन की तरफ़ ऐ चमन वालो रुकूँ या जाऊँ इक धुआँ...

[यह पोस्ट का एक अंश मात्र है यदि आपको यह लेख या ग़ज़ल/कविता पसंद आई तो लिंक पर जाकर पूरी पोस्ट पढ़े Subscribe our youtube channel https://bit.ly/jakhirayoutube ]



This post first appeared on Jakhira Poetry Collection, please read the originial post: here

Share the post

खिंच के महबूब के दामन की तरफ़ - अर्श मलसियानी

×

Subscribe to Jakhira Poetry Collection

Get updates delivered right to your inbox!

Thank you for your subscription

×