Get Even More Visitors To Your Blog, Upgrade To A Business Listing >>

उठ मेरी बेटी सुबह हो गई - सर्वेश्वर दयाल सक्सेना

पेड़ों के झुनझुने, बजने लगे; लुढ़कती आ रही है सूरज की लाल गेंद। उठ मेरी बेटी सुबह हो गई। तूने जो छोड़े थे, गैस के गुब्बारे, तारे अब दिखाई नहीं देते, (जाने कितने ऊपर चले गए) चांद देख, अब गिरा, अब...

[यह पोस्ट का एक अंश मात्र है यदि आपको यह लेख या ग़ज़ल/कविता पसंद आई तो लिंक पर जाकर पूरी पोस्ट पढ़े Subscribe our youtube channel https://bit.ly/jakhirayoutube ]



This post first appeared on Jakhira Poetry Collection, please read the originial post: here

Share the post

उठ मेरी बेटी सुबह हो गई - सर्वेश्वर दयाल सक्सेना

×

Subscribe to Jakhira Poetry Collection

Get updates delivered right to your inbox!

Thank you for your subscription

×