Get Even More Visitors To Your Blog, Upgrade To A Business Listing >>

खाते हैं हम हचकोले इस पागल संसार के बीच - सरस्वती सरन कैफ़

खाते हैं हम हचकोले इस पागल संसार के बीच जैसे कोई टूटी कश्ती फँस जाए मंजधार के बीच उन के आगे घंटों की अर्ज़-ए-वफ़ा और क्या पाया एक तबस्सुम मुबहम सा इक़रार और इंकार के बीच दोनों ही अंधे हैं मगर अपने...

[यह पोस्ट का एक अंश मात्र है यदि आपको यह लेख या ग़ज़ल/कविता पसंद आई तो लिंक पर जाकर पूरी पोस्ट पढ़े Subscribe our youtube channel https://bit.ly/jakhirayoutube ]



This post first appeared on Jakhira Poetry Collection, please read the originial post: here

Share the post

खाते हैं हम हचकोले इस पागल संसार के बीच - सरस्वती सरन कैफ़

×

Subscribe to Jakhira Poetry Collection

Get updates delivered right to your inbox!

Thank you for your subscription

×