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'दुनियादारी'


खुद से जो खफा हैं उन्हें क्या मनाए कोई
बहार के फरेब में काँटों से निभाए कोई

उदास हूँ रहबर के लिए कैसे लूटेगा मुझे
इस राह नहीं पड़ती, देखा तो सराए कोई

मुश्किलों से सीखे लड़ना, फिर क्यूँ रहूँ सोचता
होते रकीब काश की अपनों की बजाए कोई

इत्र की बोतल बन करा गए ऐसा रियाज़
आते हैं याद वो ही, कहीं खुशबू आए कोई

गिनना नागवार, करना फतह इनपे आशिकी
हिज्र का नया अदब, सितारों को समझाए कोई

जिन्दा सब हैं पर जीने को जागना जरूरी
गेसू ए महबूब का पेचओखम सुलझाए कोई

आगोश ए हकीकत उठाना पड़े दुनिया का नमक
बा हलक रखे इसे, जुबाँ न लगाए कोई

कर ज़ुल्म न होने ही दे, मर्द बन मर्द
खेंच दायरे इज़्जत के लाँघ न पाए कोई

सोच में जिसकी न निकले गुंज़ाइश सागर
ऐसे नज़रबन्द बेचारे की ज़मानत कराए कोई.
 
 


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