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“मासूमीयत”

फासले का उनसे क्या शिकवा कीज़ै
इक रोज़ महरबां हो बस दुआ कीजै

मुकाबला हैं उनके मुँहलगे आईने से
बयाँ ए हुस्न, अब बहुस्न ए बयाँ कीजै

तारों से सिवा, टिमटिमाने की अदा
पलक झपकाए जो कुछ कहा कीजै

इश्क महव ए आतिश फिशानी हैं
शोलों को देते हो हवा, हया कीजै

मसरूफ ए मश्क ए दौड़, कर लिया वादा
कि आएंगे फौरन चले, गर सदा कीजै

रोज न हो सकेगा आना, कहे देती हूँ
ठीक हो जाइये अब या अपनी दवा कीजै

खेंच ए मह उठाए हैं समुन्दर में मौज़
सामने मेरे क्या इतरा के चला कीजै

दूर जाने दे, न पास ही रहने दे
ख्वाहिशों के शहर, किससे रस्ता कीजै

न बैठै यकी, आईन-ए-ईमां पे सागर
कैसे ज़िंदगी की गुजर किया कीजै

Some word meanings

बहुस्न ए बयाँ : Beauty of narration

महवें आतिश फिशानी : Involved in spreading sparks

मसरूफ ए मश्क ए दौड़ : Busy in practice running

खेंच ए मह : Pull of moon

आईन-ए-ईमां : Manners & Morals




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