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लेखन ,बालू पर लकीरें खींचने जैसा नहीं ,शिलालेख जैसा होना चाहिए ---- अमृतलाल नागर

पुष्पा भारती जी ,धर्मवीर भारती का आलेख पढ़ते हुए
हिंदी की स्थिति ,उसकी लोकप्रियता को लेकर हमेशा चिंता बनी रहती है . पर कल शाम, जिस तरह साहित्य प्रेमियों ने एकाग्र होकर, चार घंटे तक प्रख्यात लेखक ' अमृतलाल नागर ' के जन्म शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में 'चौपाल' द्वारा आयोजित कार्यक्रम का आनंद लिया, वह अविस्मरणीय है. दर्शकों में बहुत सारे युवा चेहरे देख हिंदी के प्रति उम्मीद बंधती है.

कार्यक्रम का संयोजन बहुत ही श्रमपूर्वक और सुरुचिपूर्ण तरीके से किया गया था .अतुल तिवारी जी ने अमृतलाल जी की पौत्री ऋचा नागर (जो अमेरिका के एक कॉलेज में प्राध्यापक हैं )के सहयोग से 'अमृतलाल नागर' से जुड़ी हर छोटी बड़ी सामग्री को एकत्रित कर कार्यक्रम में प्रस्तुत किया . दूरदर्शन द्वारा बनाई एक छोटी फिल्म भी दिखाई गई जिसके अंत में नागर जी कहते हैं ," मुझे छोटे बड़े हर तरह के पुरस्कार मिले पर ये पुरस्कार लेखक को मिले ,व्यक्ति को नहीं .इसलिए व्यक्ति को घमंड नहीं करना चाहिए "इस तरह लेखक को अपने व्यक्तित्व से अलग कर कौन देखता है. हर चित्र में नागर जी बहुत झुककर पुरस्कार ग्रहण करते दिख रहे थे .पुरस्कार के प्रति उनका सम्मान झलक रहा था .आजकल तो पुरस्कार लेते वक़्त गर्व का भाव ही ज्यादा दिखता है.

अचला नागर जी ने बड़े प्यार से अपने बाबूजी को याद किया ,जब वे मथुरा में रेडियो स्टेशन में नौकरी कर रही थीं तो उनके पिताजी उनके पास आकर रहे थे वे सूरदास पर एक किताब लिखना चाह रहे थे पर शुरू नहीं कर पा रहे थे .वे मथुरा की गलियों में भटकते रहते . और आखिर एक दिन कहा, 'मेरे लिखने के स्थान का इंतजाम करो, सूर ने मुझे अपनी ऊँगली पकड़ा दी है ' कोई भी किताब लिखने से पहले वे गहन शोध करते थे . और अनुभवजनित लेखन पर जोर देते थे. उनका कहना था कल्पना भी करो तो उसमे वास्तविकता के पुट होने चाहिए . अचला जी ने अपनी माताश्री 'बा' को भी नम आँखों से याद करते हुए कहा, 'बा' ने उन्हें सारी सांसारिक जिम्मेवारियों से मुक्त कर रखा था . घर का खर्च कैसे चलता है , नागर जी को कोई अहसास नहीं था . वे जब तब किसी के लिए भोजन ,किसी के लिए मिठाइयों की फरमाईश कर देते थे .पर कभी नहीं जान पाए कि इनका इंतजाम कैसे होता है . इसीलिए वे 'बा' को तीन चौथाई अमृतलाल नागर कहा करते थे .

1940 में नागर जी ,मुंबई फिल्म लेखन के लिए आ गए. कई सुपर हिट और प्रयोगधर्मी फ़िल्में लिखीं. पैसे भी बहुत अच्छे मिलते थे पर उनका लेखक मन बेचैन रहता .वे कहते,' ये लेखन बालू पर लकीरें खींचने जैसा है ,जबकि लेखन तो शिलालेख सा होना चाहिए .और वे 1947 में लखनऊ वापस आ गये. 'बा'ने भी उनके इस निर्णय में पूरा साथ दिया और कहा, 'अब तक राम जी चलाते थे आगे भी राम जी चलाएंगे '
'बा' की इच्छा थी कि वे सुहागन ही इस दुनिया से जाएँ पर नागर जी कहते ,'ठीक है ,पर मेरे जाने से पांच मिनट पहले ,क्यूंकि फिर मेरा काम कैसे चलेगा . पर बा दो वर्ष पूर्व ही चली गईं . अचला जी ने लेखकों की बेबसी का भी जिक्र किया कि वे माँ के अंतिम दर्शन नहीं कर सकीं . क्यूंकि ट्रेन की टिकट नहीं मिली और तब वे हवाई जहाज का टिकट अफोर्ड नहीं कर सकती थीं .जबकि उनकी लिखी फिल्म 'निकाह' और कई फ़िल्में सुपर हिट हो चुकी थीं. किसी भी फिल्म की नींव लेखक ही खड़े करते हैं ,पर शोहरत और पैसे अभिनेता/ निर्माता निर्देशक को मिलता है.
पुष्पा भारती जी एवं अचला नागर जी

'बा' की मृत्यु के बाद उनके छोटे बेटे शरद नागर ने उनका सारा लिखा हुआ सहेजा . एक साल पहले उनका देहावसान हो गया. वे अपने अंतिम दिनों में भी बेचैन रहते थे कि बाबूजी की जन्मशती आ रही है, कैसे समारोह के इंतजाम होंगे . अचला जी ने विह्वल होकर कहा, 'छोटे भैया देखिये ,बाबूजी से प्यार करने वालों ने कितना शानदार कार्यक्रम बनाया है'

राजेन्द्र गुप्ता जी ने उनके उपन्यास 'कोठेवालियां' के कुछ अंश पढकर सुनाये . नागर जी इसपर शोध करने के लिए कई गायिकाओं, उनकी माताओं से उनके गाँव जाकर मिले और सामग्री इकठ्ठा की थी.

अस्सी वर्षीया पुष्पा भारती जी ने अपनी ओजस्वी वाणी में धर्मवीर भारती का लिखा ,'उजास की धरोहर' आलेख पढ़ा जिसमे धर्मवीर भारती ने बा को याद करते हुए उनकी शादी में सहबाला ना बन पाने का दुःख जाहिर किया है. अमृतलाल नागर और बा के विवाह की स्वर्ण जयंती पर भारती जी ने उन दोनों की पुनः शादी का प्रस्ताव रखा था और कहा था कि सहबाला मैं बनूँगा .पर किसी कारणवश नहीं जा पाए लेकिन अचला जी के हाथों सुहागा की पिटारी, चूड़ी ,आलता ,सिंदूर आदि और एक शॉल भेजा था .पूरे समारोह में 'बा' वही शॉल ओढ़े रहीं और सबको बतातीं 'मेरे देवर-देवरानी ने बंबई से भेजा है' . पुष्पा जी ने ये भी बताया कि जब भारती जी और उनके विवाह की आलोचना करते हुए सभी साथी दूर हो गए थे तब सिर्फ नागर जी और भगवतीचरण वर्मा जी ने ही उनका साथ दिया और लोगों के मन से उन दोनों के प्रति विद्वेष भी दूर किया .

सूरज प्रकाश जी ने जिक्र किया कि नागर जी जब अपने तख्त पर लिखने बैठते तो 'बा' से कह देते कोई मेरे विषय में पूछे तो उन्हें कह देना ,'मैं कानपुर गया हूँ ' पर जब कोई आत्मीय आ जाते तो वे उन्हें आवाज़ दे बुला लेते. 'बा' खीझ जातीं, 'मुझे झूठा ठहरा दिया' तो वे कहते "तुमने झूठ कहाँ कहा, ये तख्त कानपुर ही तो है, ये लोग कानपुर में ही बैठे हैं "

अमृतलाल नागर जी का परिवार
शेखर सेन ,'अमृतलाल नागर ' को अपना गुरु मानते हैं. उनकी किताब 'मानस का हंस' का कई कई बार पाठ किया है. उनकी किताबों पर आधारित तुलसी और सूरदास नाटक लिखा है. दोनों नाटकों के छोटे मार्मिक अंश प्रस्तुत किये और खूब तालियाँ बटोरीं .

अंत में नागर जी की पौत्री ऋचा नागर ने अपने दादा जी से जुडी कई स्मृतियाँ साझा कीं . बा के जाने के बाद दो साल वे दादा जी के बहुत करीब रहीं .तब नागर जी 'करवट' उपन्यास लिख रहे थे और उन्होंने ऋचा जी को महल्ले की औरतों के घर जाकर उनसे गीतों में प्रयुक्त होनेवाली गालियाँ नोट करने के लिए कहा था . हर उपन्यास पर वे इतनी मेहनत करते थे .
मुम्बई से नागर जी अपने बच्चों को पत्र लिखते थे और बड़े सरल शब्दों में शिक्षाप्रद बातें कह जाते थे .बड़े बेटे कुमुद नागर को लिखा ,तुम्हारी नानी तुम्हारा यज्ञोपवीत करवाना चाहती हैं . जनेऊ के तीन धागे ,गीता, बाइबल और कुरान से हैं और उनमें गाँठ लगाईं जाती है ताकि तीनों धर्मग्रन्थों की शिक्षा ग्रहण की जाए .तुम्हें कौन सा यज्ञोपवीत स्वीकार है .सर मुंडा कर पूजा करने वाला या ये वाला ?"
छोटे पुत्र शरद नागर को लिखा ,' अभिवादन में हमेशा 'जय हिन्द' कहा करो. इस से किसी जाति का बोध नहीं होता"
ऋचा जी ने इस तरह की कई बातों का उल्लेख किया . कार्यक्रम के समापन पर नागर जी का पूरा परिवार स्टेज पर उपस्थित हुआ , उनकी दोनों बेटियाँ ,छोटे भाई के बेटे -बहुएं, पौत्र - पौत्री , नाती नातिनें सब आये थे . अचला जी ने सबका परिचय करवाया .
पुष्प जी के साथ मैं

पुष्पा भारती जी ने अतुल तिवारी जी को बधाई देते हुए मंच से ही कहा ,' इतने साहित्यिक कार्यक्रमों में भाग लिया है. पर यह सबसे बढ़िया कार्यक्रम था '
इतने सुंदर कार्यक्रम के अवलोकन के साथ ही 'पुष्पा भारती' जी से मिलना मेरे लिए बड़ी उपलब्धि रही .धर्मयुग से जुड़ी कई बातें हुईं . अचला जी ने भी कहा ,'अब वैसी पत्रिका कहाँ ' पुष्पा जी ने इतने प्यार से कह डाला, 'घर पर आओ कभी, खूब बातें होंगी ' सहजता से अपना फोन नम्बर भी दे दिया ,जब मैं नम्बर नोट करने लगीं तो बोलीं, ' बेटा, कैसे तुमलोग इतने बड़े फोन हैंडल कर लेती हो ' ऐसा कहतीं वे बिलकुल मेरी चाची-मौसी सी लग उठीं


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