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पहली एकल जयपुर यात्रा --1

पिछले वर्ष  इन्हीं दिनों जयपुर यात्रा पर  गई थी ,उन दिनों उपन्यास  पूरा करने के लिए फेसबुक ब्रेक पर थी और फिर इस वर्ष लाहुल स्पीती ट्रिप से लौटी तो उस उपन्यास के प्रकाशन की तैयारियों में व्यस्त रही .दोनों यात्राओं के संस्मरण लिखना रह ही गया जबकि मैं तो एक बार लोकल से यात्रा कर आती हूँ ,वो भी लिख डालती हूँ :).
पहले जयपुर यात्रा संस्मरण जो मेरे जीवन की पहली सोलो ट्रिप थी 
मेरे कॉलेज की  फ्रेंड सीमा की बेटी  की शादी जयपुर में थी . उसने तुरंत ही मुझे फोन कर आमंत्रित किया. आजकल शादी कि डेट तय होते ही लोग बता देते हैं क्यूंकि काफी पहले बता देने पर प्लेन के टिकट बहुत कम कीमत में मिल जाते हैं .सीमा ने मेरे पतिदेव से भी आने का आग्रह किया  और आशा के विपरीत ह्मेशा व्यस्त रहने वाले पतिदेव ने आने के लिए हामी भर  दी . सीमा कटिहार में केन्द्रीय विद्यालय में प्रिंसिपल है. बेटी बैंगलोर में जॉब करती है .लडका भी बैंगलोर में है ,पर उसके सभी रिश्तेदार जयपुर के आस -पास हैं.. इसलिए उनकी इच्छा थी कि जयपुर से ही शादी हो . सीमा ने जयपुर में ही एक रिजॉर्ट बुक किया था और हमें वहीँ शादी अटेंड करनी थी. मेरे पतिदेव ने प्लान बनाय कि हमलोग दो दिन पहले ही जयपुर चलते हैं, जयपुर घूम लेंगे और फिर रिसॉर्ट में शिफ्ट होकर शादी में शामिल  हो जायेंगे . उन्होंने नेट पर ढूंढकर  पूरी  तरह राजस्थान के पारम्परिक साज सज्जा से सुसज्जित  होटल उम्मेद पैलेस बुक कर दिया . दो महीने पहले ही सारी बुकिंग हो गयी .और फिर हम अपने रोजमर्रा के कार्यों में व्यस्त हो गए .

जाने से ठीक एक हफ्ते पहले पता चला, पतिदेव को उन्हीं दिनों कुछ बहुत जरूरी काम है ,जिन्हें टाला नहीं जा सकता .इसलिए वे नहीं जा पायेंगे . टिकट  कैंसल करनी पड़ेगी.पहले तो मैंने सोचा...अपनी टिकट  भी कैंसल करवा देती हूँ .दो दिन बाद जाकर सीधा शादी में ही  सम्मिलित हो जाउंगी .अकेले जाने में कोई समस्या नहीं थी .ज्यादातर अकेले ही ट्रेवल करती हूँ . पर बच्चे पीछे पड़ गए , आजकल छोटी  छोटी  लडकियां यूरोप तक अकेले घूम कर आ रही हैं और तुम दो दिन जयपुर घूमने  से डर रही हो. अपना देश, अपनी भाषा...वे लोग तो अनजान देश में अनजान भाषा के बीच घूम आती हैं और तुमसे उम्र में आधी है .कुछ सोच विचार कर मैंने भी सोचा ,'ये अनुभव भी ले ही लेती हूँ...उम्र जल्द ही दस्तक देने लगेगी और इस तरह के अनुभव से महरूम रह जाउंगी और मैंने टिकट कैंसल नहीं किया .

उसके बाद के दिन तो रोमांच में ही बीते .नया शहर ,बिलकुल अकेले घूमना...सारे अनजान चेहरों के बीच, यह सब सोच थोडा मन सशंकित भी होता पर कुछ बोल नहीं सकती थी . घर में तो सब हंसी उड़ाते कि कौन सी बड़ी बात है., दुनिया भर में लडकियां अकेली घूम रही हैं . राम राम करके वो दिन भी आ पहुंचा , दस बजे की फ्लाइट बदलकर दो बजे की हो गई यानि जयपुर पहुँचते शाम हो जानी  थी और फिर उस दिन कहीं भी घूमना सम्भव नहीं था .थोड़ी निराशा भी हुई  कुछ और समय मिल गया .एयरपोर्ट पर अपनी फ्लाईट का इंतजार करते उत्तर के शहरों से आते लोगों को देख रही थी. सब कोट मफलर, स्वेटर में सजे हुए थे .जिसे  जाते ही उतार देने  वाले थे,मुंबई में तो पंखा चल रहा था . आजकल तो ट्रेन में भी लोग बातें नहीं करते ,प्लेन में तो यूँ भी गर्दन टेढ़ी किये बैठे रहते हैं .मैंने भी एक किताब खोल ली थी .जब स्नैक्स आया तो पाया विंडो सीट पर बैठा लड़का सो रहा था . बीच में एक बड़ा सोफिस्टीकेटेड सा  लड़का बैठा था ,जिसे उसे जगाने में कोई रूचि नहीं दिखी .पर मुझे लग रहा था, बिचारे को अफ़सोस ना हो, उसका नाश्ता छूट गया .मैंने बीचवाले लड़के से आग्रह किया कि उसे जगा दे .बड़ी अनिच्छा से उसने दो बार ऊँगली से ठक ठक कर उसे जगाया . फिर थोड़ी देर बाद मेरी किताब पर कहा कि उसकी पढी हुई है, बड़ी अच्छी किताब है ' .फिर तो बातें होने लगीं और पता चला...मेरा बेटा जिस कम्पनी में काम करता है वो भी उसी में है, पर उस से काफी सीनियर है .बैंगलोर में पोस्टेड है और अब जयपुर में कैम्पस इंटरव्यू लेने जा रहा है . शादी शुदा है और उसका एक बेटा भी है. आजकल सब अपनी उम्र से कम ही दिखते हैं .


जयपुर एयरपोर्ट से बाहर निकल अपने नाम की तखती ढूँढने लगी क्यूंकि होटल से पिक अप बुक किया हुआ था .पर वहां दो तख्ती देख  चौंक गई. एक मेरे नाम की और  एक मेरे पतिदेव  के नाम की .एक बार तो चौंक ही गई ...मुझसे झूठ बोला क्या उन्होंने और किसी दूसरी फ्लाईट से आ रहे हैं  .पर तुरंत ही ये सोच उलटे पैर लौट गया ,ऐसा कुछ करना  उनके वश की बात नहीं .मैं अपने नाम की तख्ती वाले  ड्राइवर की तरफ बढ़ गई और उसके पास खड़े दुसरे ड्राइवर से कहा कि वे नहीं आ रहे . अब वो पूछने लगा...'आप उन्हें जानती हैं ?' इसका क्या उत्तर हो ,जब उसे बताया कि मेरे पतिदेव का नाम है...पर वे नहीं आ रहे तो दोनों ड्राइवर मुस्करा कर कहने लगे , हमलोग बात कर ही रहे थे कि ये दोनों लोग जरूर एक दुसरे को जानते होंगे ,एक ही सरनेम है . मुम्बई से बाहर आते ही सबसे पहले यही बात ध्यान में आती है ,अपरिचित भी बड़े आराम से बातें करते हैं .वरना वहां बिना किसी काम के या काम से अलग अनजान  लोग शायद ही दो बातें करें . अब वे पूछ रहे थे ,"पर  दो गाड़ी क्यूँ बुक की ?"
मैं समझ गई  कि दो महीने पहले होटल की बुकिंग करते हुए भी अपने नाम से पिक अप करने के लिए गाड़ी बुक कर दी होगी और भूल गए .जब मैं अकेले जाने लगी तो फिर से मेरे नाम से गाड़ी बुक कर दी . पर मुझे इस लापरवाही पर इतनी खीझ हो रही थी कि मैंने फोन करके पूछा भी नहीं ,अपने नाम की तख्ती वाले ड्राइवर से कहा, गाड़ी लेकर आइये .वो तो चला गया ...दूसरा ड्राइवर घबराया हुआ था कि अब पैसे कौन देगा .उसने होटल फोन किया .होटल से पतिदेव को फोन गया और फिर उनका फोन मेरे पास आया कि दुसरे ड्राइवर को भी पैसे दे देना . यानि अब एक अकेले मेरे लिए दो दो इनोवा खड़ी  थी :)

इंटरनेट से होटल तो बुक कर लेते हैं .पर दूरी का अंदाजा नहीं होता . ये उम्मेद पैलेस ,शहर के बिलकुल दूसरे छोर पर है. यानि पहले ही दिन मैंने एक छोर से दूसरे छोर तक शहर को नाप लिया. मुंबई की  बेहिसाब ट्रैफिक और जनसमुद्र के सामने तो कोई भी शहर शांत ही प्रतीत होता है.  खूब चटख रंग की साड़ियाँ,सलवार कुरते में सजी महिलायें अच्छी लग रही थीं . होटल पहुँचते शाम हो गई थी .
होटल बहुत खुबसूरत था . पीतल जड़े किले के दरवाजे सा गेट .अंदर की साज सज्जा भी कुछ रजवाड़े सी  . बड़े बड़े शीशे, पीतल के गागर , दीवारों पर उकेरे भित्तिचित्र , जालीदार झरोखे .कमरे में एंटीक फर्नीचर . सोफे टी वी के साथ एक कोने में नक्काशीदार कुर्सी के साथ एक राइटिंग टेबल भी और टेबल पर पुराने चलन  का एक लैम्प. अब तो हाथ से लिखना छूट  ही गया है, वरना वहाँ लेखन का पूरा माहौल  था .
शाम हो चुकी थी ,होटल एक रिहाईशी  इलाके में था ,बाज़ार के बीच में नहीं कि निकल कर एक चक्कर लगा लिया जाए .घर से फोन पर सबने कहा ,'क्या होटल में रहने के लिए गई हो...बाहर निकल कर थोडा घूम आओ कहीं. पर मैंने सोच लिया था , कल सुबह ही जाउंगी .ऊपर रूफ टॉप रेस्टोरेंट था ,बस सोचा खुली छत पर डिनर का आनन्द लिया जाएगा . एक चाय और एक प्लेट भजिया ऑर्डर किया और अकेले घूमने में सबसे बड़ी मुसीबत  खाने  पीने  की ही  होती  है.  .इतना सारा भजिया था कि मेरा तो डिनर ही हो जाता .अब मैंने सोचा ,सफर में बाल बिलकुल बिखर गए थे ,जरा कंघी कर लूँ .और बस हो गई मुसीबत . सामान में कंघी मिले ही ना .अब तो मैं बुरी तरह घबरा गई .कल सुबह घूमने जाना है और बिना कंघी किये कैसे जाउंगी . सारा बैग उलट  पुलट कर देख लिया पर कंघी नहीं मिली .

अब मुझे बाहर जाना ही पड़ा . रिसेप्शन पर पूछा तो  बताया गया ,बस पास में ही एक जनरल स्टोर है,वहां सब कुछ मिल जाएगा .उस अनजान  शहर में हलके ह्ल्के घिरते अंधियारे में घूमना एक अलग ही अनुभव था . उंघती हुई सी कॉलोनी थी . सुंदर लॉन वाले बड़े  खुले खुले प्राइवेट मकान और उनके बंद गेट . कॉलोनी की  सडक पर इक्का दुक्का कोई आता -जाता दिख जाता . कभी कोई गाड़ी आती दिखती , बड़ा सा गेट मुंह खोल गाड़ी को लील जाता और फिर गेट का मुंह बंद .थोडा रोमांच और हलकी सी सिहरन भी हो रही थी पर खुद को अजनबी भी नहीं दिखाना था ,इसलिए थोड़ी लापरवाही ओढ़े  चारों तरफ देखते चलती जा रही थी. किसी दूकान के कोई आसार नजर नहीं आ रहे थे . काफी दूर जाने पर बाईं  तरफ एक बैनर दिखा, "यहाँ फ्रेश ड्राई फ्रूट्स मिलता है" .ऐसा लग रहा था किसी गैराज में कोई दूकान है. मैंने सोचा वहां पूछने पर पता चल जाएगा .जब जाकर देखा तो वो एक छोटा मोटा सुपर स्टोर सा ही था .जरूरत का हर समान मौजूद था .चाहे कितनी भी आभिजात्य कॉलोनी हो पर सामान्य चीज़ों की  दरकार तो सभी को होती है. मैंने उसे बोल भी दिया , ये दूकान के बाहर 'यहाँ ड्राई  फ्रूट्स मिलता है', ऐसा बैनर क्यूँ लगाया हुआ है? ,लोगों को धोखा  हो सकता है . बोला, 'नहीं जी यहाँ सबको पता है ' .हाँ उसे कहाँ अंदाजा होगा कि मुम्बई से कोई उसके यहाँ कंघी खरीदने आ जाएगा :) ( दूसरे दिन पता नहीं कहाँ से कूद कर  कंघी बिलकुल सामने आ  गई ,मानो घर वालों के संग मुझे बाहर भेजने की साजिश में शामिल थी )

जाते  वक्त  जो  बेचैनी और हल्का सा डर था वो गायब हो  चुका था और अब मैं वो शांत ,धूसर अँधेरा  एन्जॉय  कर रही थी .पर होटल कुछ जल्दी ही  आ गया . 


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